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Sunday, December 27, 2009

दहेज़ बनाम स्त्रीधन....


दराल साहब की एक पोस्ट पढ़ी.....http://tsdaral.blogspot.com/2009/12/blog-post_26.html प्रभावित हुए बिना नहीं रह पायी, अफ़सोस कि मैं इस चर्चा में शामिल नहीं हो पायी...लेकिन मुद्दा तो हमारे ही काम का था, तो सोचा उनका शुक्रया भी अदा कर दूँ और अपनी बात भी कह दूँ...क्यूंकि मुझे मालूम था इस टोपिक पर मुझे इतना कुछ कहना है कि वही बोलेंगे इसकी टिप्पणी मेरी पोस्ट से लम्बी कैसे भला ?? इसलिए सोचा चलो आम के आम और गुठलियों के दाम, टिप्पणी की टिप्पणी और पोस्ट की पोस्ट। बात है जी बहुत प्यारी, रोमांटिक और सनसनीखेज़ भी अर्थात ये बात चंद्रमुखी सरीखी भी है, सूर्यमुखी सरीखी भी और ज्वालामुखी सरीखी भी, अरे बाबा ये सारे गुण एक ही रिश्ते में होते हैं......शादी में ...


खैर, हमरी भी शादी हुई थी, हमरे बाबा को चप्पल घिसने की ज़रूरत ही नहीं हुई (भले बाद में हमरी चप्पल तो छोडो एडी घिस गयी) लड़का(उस समय तो यही कहा जाता है) का मालूम कहाँ हमको देखा और सीधा बाबा के पास पहुँच गया और हिम्मत देखिये...बोलिए दिया हिंदी फ़िल्मी का इश्टाइल में मैं आपकी लड़की का हाथ माँगने आया हूँ जब की अपना हाथ गोड़ का कौनो ठेकाना नहीं था...हाँ नहीं तो हमरे बाबा कौन से कम थे हिंदी फिल्म उ भी खूब देखते हैं, सामने हीरो सरीखा लड़का देखे...खूब गोर नार.....बस रीझ गए .....और सबसे बड़ी बात.....जो उन्खा लुभा गयी....अरे बाप रे !! लड़का हमसे बात किया है ..बहुत बहादुर है......मूंछ में ताव देकर फ़िल्मी ठाकुर जैसन बोल दिए ......बच्चा दिया......

बस जी शादी हो गयी हमरी अब ई लीगल है कि इललीगल ई हमको नहीं मालूम ...पर हुई थी और हाँ शादी बाकायदा चंदा करके हुई थी.....हा हा हा....घबडाईए नहीं सौंसे परिवार भिक्षाटन पर नहीं निकला था जब भी कि हमरा हक है ब्राह्मण जो ठहरे हुआ यूँ कि मेरे ५ मामा और ३ चाचा, ३ मौसी और ५ फूफू, और हम ठहरे सबकी लाडली (अब अपने मुंह से अपनी का तारीफ करें :))....बस होड़ लग गयी सबमें हम इ देंगे और हम उ देंगे.....कोई अलमारी दे गया तो कोई पलंग.....कोई गगरा...तो कोई डनलप......इसलिए ड्रेसिंग टेबुल का मुंह इधर है और पलंग का मुंह उधर अरे उनके बीच मेल-मिलाप कभी नहीं हुआ ही नहीं न ! साफ़-साफ़ दीखते हैं......एक ठो गम्हार हैं तो एक ठो टीक ......हाँ नहीं तो ! इहाँ तक कि खस्सी भी चंदा में ही आया जब भी कि शादी में नॉन-वेज नहीं बनता है लेकिन लड़के वाले पूरे खाधुड निकले बोल दिए कि भैया हम तो खैबे करेंगे.....तो जी बारात दूसरे दिन भी आई....अब ई अलग बात है कि सबलोग ख़ुशी-ख़ुशी खिलाने को तैयार थे..... माँ-बाबू जी का भला का जाता था ...थे ना सुदर्शन मामू.....सब समहार लिए....

काफी कम उम्र थी हमरी भी और इनकी भी नौकरी चाकरी की बात छोडिये पढाई भी पूरी नहीं हुई थी हमदोनो की हमरी शादी बस हो गयी थी। बिना नौकरी के शादी होना हम तो तब लिपस्टिक भी नहीं लगाते थे। अगर जो कहीं लगाते होते तो उहो खरीदने का औकात नहीं था। कुछ दिन बहुत कठिन रहा पढाई और बच्चे साथ-साथ, जीवन कुरुक्षेत्र बन गया था ऐसे में अगर स्त्रीधन होता तो मनोबल ऊँचा होता और अगर पति भी काम ना करे तो ससुराल में जो वाट लगती है सुबह-दोपहरिया और शाम ;);) लेकिन कुल मिला कर सब निपट गया रोते-गाते सब लोग साथ दिया.....

भाई !!! एक बात हम बता देते हैं ...नौकरीशुदा लड़कियों की समस्या कम होती है ...लेकिन अगर लड़की नौकरी नहीं कर रही है तो उसे परेशानी ज्यादा होती है.... इसीलिए नौकरी बहुत ज़रूरी है...

कोई हमको ई बतावे कि दहेज़ और स्त्री-धन एक ही बात है का ?? काहे कि हम हर हाल में स्त्री-धन के पक्ष में हैं। हम दहेज़ के डिमांड के विरोधी हैं लेकिन इस बात से हम पूरा समर्थन करते हैं कि लड़की को स्त्रीधन मिलना चाहिए। माँ-बाप को यह ज़रूर सोचना चाहिए कि चाहे कुछ भी हो लड़की पराये घर जा रही है। उस घर को अपनाते-अपनाते उसे समय लगता है और ससुरालवालों को उसे भी अपनाने में समय लगता है। नए लोग नया परिवेश लेकिन नित-प्रतिदिन कि ज़रूरतें तो नहीं रूकती हैं। कहीं कोई आदत ही हो किसी को कभी कुछ खाने कि ही इच्छा हो। कभी कुछ शौक हो, मुंह खोल कर नहीं कह पाती है। यहाँ तक की अपने पति तक से नहीं कह पाती है। अपनी छोटी से छोटी ज़रुरत के लिए ऐसे में कम से कम अपने पैसों से अपनी चीज़ें तो ले सकती है। उसकी अपनी ज़रुरत की चीज़ें अगर उसकी अपनी हों तो ससुराल में मान बना रहता है। सबके साथ नहीं तो ज्यादातर लड़कियों के साथ टीका-टिप्पणी ज़रूर होती है, अगर वो कुछ लेकर ना जाए तो। फिर यह तो लड़की का हक भी है और माँ-बाप का फ़र्ज़ भी कि वो अपनी सुविधा और हैसियत के हिसाब से बेटी की मदद करें। बेटा तो घर में माँ-बाप के साथ ही रह जाता है। माँ-बाप बेटेके हर सुख-दुःख में साथ होते हैं। लेकिन बेटी ?? उसे तो ना जाने क्या-क्या और कितना adjust करना पड़ता है। माँ-बाप की तरफ से की गयी थोड़ी सी भी मदद कितना सम्मान, कितना धैर्य और कितना आत्मविश्वास देती है यह एक स्त्री ही समझ पाएगी और अपने माँ-बाप से इस मदद की अपेक्षा करने में कैसी शर्म ??? ....