Thursday, July 8, 2010

हॉलीवुड अगर नहीं होता तो बॉलीवुड का क्या होता .....?


घर में हम सभी एक साथ बैठ कर फिल्म्स देखते हैं...अच्छा लगता है...फैमिली रूम में ज़मीन पर बिस्तर बिछाना...गरम-गरम पॉपकॉर्न बनाना, बड़े-बड़े डब्बों में लेकर,  और फिर सबका एक ही जगह लेट कर फिल्म का आनंद उठाना ...इसी बीच बच्चों का मेरी गोद में लेटने के लिए लड़ना...मेरे दो हाथ हैं और बच्चे तीन...कोई कहता कि मेरी पीठ खुजाओ, कोई कहता मेरा सिर सहलाओ, और किसी की फरमाईश कि बस मेरा हाथ थामे रहो....इस चिल्ल-पों का अपना ही एक आनंद होता है...थियेटर का माहौल बनाना, सराउंड साउंड और लाइटिंग परफेक्ट बनाना फिर फिल्म चलाना, चलती फिल्म में और अगर कोई उठकर बाथरूम भी जाए तो सबका एक साथ चिल्लाना और फिल्म को रोक देना...तब-तक जबतक कि वो वापिस नहीं आ जाता....और अगर कोई 'ऐसा वैसा' सीन आए तो सेंसर कि कैंची लिए किसी न किसी बालक का मुस्तैद रहना ..कहने की भी ज़रुरत नहीं होती अब तो...बस झट से फास्ट-फॉरवर्ड का बटन दबा देना ...सब कुछ बड़ा automatic है..सबको एक-दूसरे की पसंद-नापसंद का पता है..और सच पूछिए तो परिवार का अर्थ भी यही है..एक-दूसरे को पूरी तरह समझना..

हे भगवान् !!! हम तो कुछ और कहने आए थे आउर कुछ का कुछ कहने लगे ...अजी आए थे हरिभजन को ओटन लगे कपास...बात हम कर रहे थे हिंदी फिल्मों की...बात ई है कि आज कल हम ज़रा खिस्केली हुए पड़े हैं ..आएँ-बाएँ कर रहे हों तो माफ़ कीजियेगा...

हाँ तो हम कह रहे थे ...जब भी आज कल कोई हिंदी फिल्म देखने लगते हैं तो लगता है इसे पहले देखा 
है...जबकि वो बिल्कुल नई फिल्म होती है...और तब बच्चे फटाफट बता देते हैं...अरे मम्मी ये तो फलाने Hollywood मूवी की कॉपी है ...तब दिल करता है चम्मच में पानी लेवें और बस गोता लगा जावें...और जनाब एक बार पता लग जाए ये कौन सी मूवी है फिर देखो मृगांक तो पूरी कहानी बता देता है....और हम फिल्म बनाने वालों से बस इतना सा शिष्टाचार की उम्मीद करते रह जाते हैं..कम से कम जहाँ से नक़ल की है उसका नाम तो बता दो.... हाँ नहीं तो...!!


पता नहीं क्यों हम हिन्दुस्तानी नक़ल करने में बहुत होशियार हैं (इन्क्लुडिंग मी)...चलिए कोई बात नहीं..बॉलीवुड नक़ल करने से बाज़ तो नहीं आएगा, लेकिन पता तो होना ही चाहिए कि ये सारी फिल्में नक़ल हैं..हमारे लेखक, निर्देशक के दीमाग की उपज नहीं है...कितनी आसानी से सारा क्रेडिट हमारे बॉलीवुड के कर्ता-धर्ता ले जाते हैं...आज तक कहीं नहीं देखा है, न ही सुना है कि हमने यह फिल्म फलाने हॉलीवुड फिल्म से प्रेरित होकर बनाई है...या फिर हमें इसकी कहानी अच्छी लगी तो सोचा चलो हम भी इसे अपने हिसाब से भारतीय लोगों के लिए बना कर देखें...न जी न ....!!  यकीन कीजिये ऐसी फिल्मों की संख्या बहुत ज्यादा है..

चलिए कुछ फिल्मों की बात करते हैं यहाँ पर ...


एक बहुत ही पुरानी फिल्म आ रही थी टी वी पर It Happened One Night उसे देख कर लगा कि इससे मिलता जुलता सीन देखा है मैंने ...कहीं तो देखा है इसे ...फिर याद आया इसकी हू-ब-हू नक़ल है राज कपूर नर्गिस की फिल्म चोरी-चोरी,  फिर याद आया कि आमिर खान और पूजा भट्ट की फिल्म 'दिल है कि मानता नहीं' शाट बाई शाट 'चोरी-चोरी' की नक़ल है...वो बस के अन्दर वाला सीन...भुट्टे की जगह तरबूज खाने का सीन...तो जनाब नक़ल करने की बीमारी आज की नहीं है ...बस ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है...

फिर याद आया अनु अग्रवाल की फिल्म 'खलनायिका ' वो नक़ल थी अंग्रेजी फिल्म 'The hand that rocks the cradle' की..
बचपन में एक फिल्म देखी थी 'The Sound of Music' बड़े हुए तो देखा 'परिचय',जीतेंद्र और जया भादुरी  ..

मेरी एक बहुत ही पसंदीदा हॉलीवुड की फिल्म है 'The Shawshank Redemption ' उससे मिलती जुलती फिल्म बनी 'तीन दीवारें' फिर एक फिल्म देखा था 'Changing Lanes' उसकी नक़ल बनी 'Taxi नंबर ९२११'
Michael Douglas और Debbi Moor की फिल्म आई थी 'Disclosure '  और इसी की कॉपी बनी है फिल्म 'एतराज़' अक्षय कुमार, प्रियंका चोपड़ा और करीना कपूर जो बहुत हिट रही है....
'The Usual Suspects ' से बनी Chocholate , मेरी एक और बहुत ही पसंदीदा फिल्म है जूलिया रोबेर्स की 'Sleeping with the Enemy', ये एक ऐसी फिल्म है जिसे मैं कई बार देख सकती हूँ, इसकी नक़ल बनी नाना पाटेकर और मनीषा कोईराला की 'अग्निसाक्षी ' 
Mrs. Doubtfire से बनी चाची ४२०, और MURDER बनी थी फिल्म UNFAITHFUL से.... 


कुछ ऐसी ही फिल्मों की लिस्ट दे रही हूँ आपको याद आए तो आप भी नाम जोड़ दीजियेगा....

मैं हूँ न – Never Been Kissed
क्यूंकि मैं झूठ नहीं बोलता – Liar Liar
आपकी ख़ातिर  – The Wedding Date
दीवाने हुए पागल – There’s Something About Mary
राज़ – What Lies Beneath
ज़हर  – Out of Time
मैं ऐसा ही हूँ  – I Am Sam
हे बेबी  – Three Men and a Baby
धमाल  – Rat Race
अकेले हम अकेले तुम - Kramer vs Kramer
ब्लैक  – The Miracle Worker
सलाम नमस्ते  – Nine Months 
गज़नी – Memento
सरकार- God father
गोद तुस्सी ग्रेट हो  - Bruce Almighty
अंगूर  – Comedy of Errors
इत्यादि ...
अभी तो बहुत सारी फिल्में हैं..कुछ आपका भी सहयोग चाहिए...आप भी दिमाग लगाइए कुछ और इस लिस्ट में जोड़ने की कोशिश कीजिये...


Wednesday, July 7, 2010

नींद ...

एक वो  !!
रेशमी चादर में लिपट
गुदगुदे गद्दे पे पसर
अनगिनत तकियों में दुबक
करवट बदलते रहे 
 

और ये !!
फुटपाथ के पत्थर से लिपट 
धूल-गरदे में लिथड़ 
केंहुनी को गाव बना
ठाठ से सोते रहे


Tuesday, July 6, 2010

अवरुद्ध-रुद्ध हुआ कंठ मेरा आपका जो प्यार देखा...

पुनर्प्रस्तुति..
अवरुद्ध-रुद्ध हुआ कंठ मेरा आपका जो प्यार देखा
झाँझ झंकृत हो गया मन हृदयंगम जो दुलार देखा
प्रणय तूलिका से भाव रचना स्नेह अपरम्पार देखा
सजल दृष्टि छलक छलकी प्रेम गौरव अपार देखा
प्राण-प्राण बसी श्वास-सरगम यही जीवनाधार देखा
मोहपाश में है गात-गात, मन नेह नेह निहार देखा

और अब एक गीत ....

अरुण यह मधुमय देश

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।

- जयशंकर प्रसाद

शायद ..आप में से कुछ ने इस गीत को पहले भी सुना हो....मुझे नया गीत रिकॉर्ड करने का समय नहीं मिला...सोचा श्री जयशंकर प्रसाद जी की अमर कृति को भी सुन लीजिये...इस गीत को हिंद-युग्म द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था....

आवाज़ : स्वप्न मंजूषा 'अदा'
संगीत : श्री संतोष शैल

Monday, July 5, 2010

बिन लोगों की ये महफ़िल है मेरा दिल घबराए ....


वहशत है हंगामों से ख़ामोशी मुझको आँख न भाये
क्या जानो क्या होता है जब भी कोई याद सताए 

इक चेहरा बे-चेहरा सा वो इक रिश्ता बे-रिश्ता सा  
चमके कभी बिजली बनकर कभी बादल सा वो उड़-उड़ जाए

आँखे घूमें आगे-पीछे, भेद की कितनी गांठें खोले 
दीवाने से हम फ़िरते हैं बात-बात पर ठोकर खाए 

दर्पण से क्या बातें करना झूठमूठ मुझको बहकाए  
बिन लोगों की महफ़िल देखूँ तभी तो मेरा मन घबराए

कोई हो दमसाज़ 'अदा' कोई तो हो मेरे संग-संग 
इस तूफ़ानी आलम में वो काश मेरी कश्ती बन जाए 

Sunday, July 4, 2010

कनाडा की राजधानी ओट्टावा में ट्यूलिप फेस्टिवल.....


कनाडियन ट्यूलिप फेस्टिवल की बात ही निराली है...कनाडा की राजधानी ओट्टावा में ट्यूलिप फेस्टिवल पिछले ५८ वर्षों से मनाया जा रहा है...ट्यूलिप फूल को अंतर्राष्ट्रीय मित्रता का प्रतीक माना जाता है तथा  ट्यूलिप फेस्टिवल को बसंत के आगमन की ख़ुशी में मनाया जाता है...ओट्टावा शहर में ट्यूलिप फेस्टिवल की धूम-धाम देखते ही बनती है...इस समय बहुत सारे  स्थानीय कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने का भरपूर मौका मिलता है...इस त्यौहार को मनाने के पीछे शांति और प्रेम की अनोखी कहानी जुडी हुई है...
दूसरे विश्वमहायुद्ध के दौरान डच राज परिवार को कनाडा ने प्रश्रय दिया था...यहीं नेदरलैंड की राजकुमारी मार्गरेट का जन्म कनाडियन सिविक हॉस्पिटल में हुआ था...आज भी हॉस्पिटल का वो कमरा नेदरलैंड की भूमि माना जाता है और वहां नेदरलैंड का ही झंडा लहराता है....इस अपनत्व को आज तक नेदरलैंड भूल नहीं पाया है और यह दोस्ती आज भी कायम है.....


१९४५ में अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए डच राज परिवार ने ओट्टावा को १,००००० ट्यूलिप बल्ब भेजे...यह उपहार था कनाडा वासियों के लिए हालैंड राज परिवार की तरफ से जिसे द्वितीय विश्वमहायुद्ध के समय, कनाडा की भूमि में सुरक्षा मिली थी ....यह प्रेम का उपहार कनाडा की जनता को बहुत -बहुत पसंद आया ...एक लाख फूलों ने ओट्टावा शहर की खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए थे... लेकिन कृतज्ञता और प्रेम का यह सम्बन्ध वहीं ख़त्म नहीं हुआ ...तब से लेकर आज तक यह सिलसिला चलता आ रहा है लगातार ...
                      डच राजकुमारी मार्गरेट गोद में                   पहली तैयारी ट्यूलिप फेस्टिवल की

ओट्टावा ट्यूलिप फेस्टिवल दुनिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप फेस्टिवल माना जाता है ...अब हर साल हालैंड से ३० लाख ट्यूलिप बल्ब आते हैं...पूरा शहर देखते बनता है....इस प्रेम और शान्ति के त्यौहार ने अपना रूप और भी प्रेममय और विस्तृत बना लिया है ...लाखों सैलानी दुनिया के कोने कोने से हर साल आते हैं...अप्रैल के महीने में यह त्यौहार १८ दिनों तक चलता है....देश-विदेश के राजनीतिज्ञ यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए, प्रेम और शान्ति का पैगाम खुल कर देते हैं....जगह-जगह पर अनेक देशों के पविलियन बने होते हैं...वो अपनी संस्कृति, भोजन और कला को सैलानियों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं... जगह जगह पर स्थानीय कलाकारों के गीत संगीत का कर्यक्रम होता रहता है....सबकुछ फ्री होता....किसी तरह का कोई शुल्क नहीं होता....खूबसूरती अपनी पराकाष्ठा पर होती है...यूँ लगता है जैसे स्वर्ग धरती पर ही उतर आया है...रंगों का समन्वय देखते ही बनता है....

अगले वर्ष समीर जी भी आयेंगे इस त्यौहार में शामिल होने, मुस्कुरा कर वो हमसे वादा कर ही चुके हैं :):) ....उसवक्त और बेहतर रिपोर्ट प्रस्तुत करुँगी.... फिलहाल आप ट्यूलिप की रंगीन छटा पर मोहित होते हुए, उस शहर के दर्शन कीजिये, जहाँ मेरा भी घर है....!!

Saturday, July 3, 2010

कल जो टूटे थे रिश्ते आज वो लगते झूठे हैं ....



ये फोटो ओट्टावा में टूलिप फेस्टिवल का है....

कल जो टूटे थे रिश्ते, आज वो लगते झूठे हैं
प्रीत डगर के काँटों से, मेरे पाँव के छाले फूटे हैं

शिकवों का दस्तूर नहीं, ना है गिलों का कोई रिवाज़ 
नेह की वो सारी कोंपल, बस कागज़ के गुल-बूटे हैं

कई रतजगे काटे हैं, हर ख़्वाब को दिल से पाला है 
पल भर को मेरी आँख लगी, कोई ख़्वाब का लश्कर लूटे है

सोच लिया था तेरे नाम की, सारी निशानी मिटा देंगे
पर दिल के पत्थर पर आकर, तेरी याद के खंज़र टूटे हैं

झीनी सी वो ख़ामोशी 'अदा', और पाँव से लिपटी तन्हाई
मुझे गुमसुम से कुछ राह मिले, पर जाने क्यूँ वो रूठे हैं


फिल्म  : अभिलाषा
संगीतकार : राहुल देव बर्मन.
गीतकार : मजरूह  सुल्तानपुरी
आवाज़ : लता

लेकिन यहाँ ...स्वप्न मंजूषा 'अदा'

वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें
जाओ मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे
वादियाँ मेरा दामन ...

जब  हँसेगी कली रंग वाली कोई 2
और झुक जायेगी तुमपे डाली कोई
सर झुकाए हुए तुम मुझे पाओगे
वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें
जाओ मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे
वादियाँ मेरा दामन ...

चल रहे जहाँ इस नज़र से परे २
वो डगर तो गुज़रती है दिल से मेरे
डगमगाते हुए तुम यही आओगे
वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें
जाओ मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे
वादियाँ मेरा दामन ...