Sunday, September 30, 2012

जीवन एक बहुत ही ख़ूबसूरत उपहार है....

जीवन की सच्चाईयां कितनी निर्मम होतीं हैं और इनसे पलायन कितना आसान । आज की भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में तनाव और चिंता के इतने कारण होते हैं हमारे पास, कि हम ऐसी दुनिया में भाग जाना चाहते हैं, जहाँ इतना अँधेरा न हो। जहाँ सबकुछ हमारे हिसाब से हो रहा हो। बिलकुल किसी ख्वाब की तरह।

यह एक विशिष्ट स्थिति है जिससे हममें से कई अक्सर दो-चार होते ही रहते हैं। , जी हाँ मैं बात कर रही हूँ oversleeping की। अक्सर हम तनाव से दूर भागने के लिए,  पहले तो दिवास्वप्न में खो जाते हैं, फिर सोते हैं और फिर और ज्यादा सोते हैं। oversleeping वास्तव में,  जीवन में असंतोष का परिचायक है। दिवास्वप्न से हम खुद को ऐसी जगह भगा ले जाते हैं, जहाँ चीज़ें उतनी उदास नहीं होतीं, हर बात हमारे मन अनुसार होता है, कहीं कोई बंधन नहीं, सपने और सोच की कोई सीमा नहीं होती। दिवास्वप्न के बाद, हम सो जाते हैं फिर हम सोते ही जाते हैं।

अगर आप अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट हैं, तो क्या सचमुच आप oversleep करेंगे ? क्या आप सोकर जब उठेंगे तो खुद को थका हुआ पायेंगे ? ज़रा सोचिये .... !

जब हम खुश होते हैं, या ख़ुशी का अतिरेक हो तो, नींद या ना नींद कोई फर्क नहीं पड़ता, और तब अगर हम सो भी जाते हैं, तो सुबह में हमारे चेहरे पर एक मुस्कान होती है, चेहरे पर लावण्य  होता है। जब आप अपने जीवन में खुश होते हैं, तो आप जागते रहना चाहते हैं, अपने जीवन के हर पल को आप भरपूर जीना चाहते हैं। थकान आपको छू कर भी नहीं जाती।

हम तो यही कहेंगे, जीवन एक बहुत ही ख़ूबसूरत उपहार है, इसका आनंद लीजिये, जी भर कर इसे जीईए, oversleeping से खुद को हर हाल में दूर रखें। oversleeping के लिए आपके पास पर्याप्त समय होगा, जब आप सचमुच चिरनिंद्रा में चले जायेंगे। 




Tuesday, September 25, 2012

रिटर्न ऑफ़ काव्य मञ्जूषा

इधर दो-चार दिन हमरा बिलाग अदृश्य रहा कारण नीचे है।
हम जो अपने बिलाग के बैक ग्राउंड में फूल-पत्ती लगाए थे शायद ऊ कॉपीराईट का उल्लंघन कर गया था।
खैर अब सब ठीक है। इसलिए काव्य मञ्जूषा वापिस आगया है। आपलोग भी मेरी इस गलती से कुछ सीख लीजिये। इसीलिए ई सब लिख रहे हैं।

जितने लोगों ने ईमेल से मुझे मेरे ब्लॉग के गायब होने के लिए अवगत कराया था उन सबका बहुत धन्यवाद। 

सभार,
'अदा'

Hello,

This is a follow up to the DMCA takedown notice we sent you regarding
http://swapnamanjusha.blogspot.com/.
Blogger has been notified, according to the terms of the Digital
Millennium Copyright Act (DMCA), that certain content (the blog background
image at
http://themes.googleusercontent.com/image?id=15WpXezK_EJnbLiccWkVt3W0zzf1TQraiKrJPyDvVmnulsEaS7pxD4ot0icoA44nu-xTv
)
in your blog is alleged to infringe upon the copyrights of others. As a
result, we have removed the image in question (If we did not do so, we
would be subject to a claim of copyright infringement, regardless of its
merits.

A bit of background: the DMCA is a United States copyright law that
provides guidelines for online service provider liability in case of
copyright infringement. If you believe you have the rights to post the
content at issue here, you can file a counter-claim with us. For more
information on our DMCA policy, including how to file a counter-claim,
please see
http://www.google.com/support/bin/request.py?contact_type=lr_counternotice&product=blogger.

The notice that we received, with any personally identifying information
removed, will be posted online by a service called Chilling Effects at
http://www.chillingeffects.org. You can search for the DMCA notice
associated with the removal of your content by going to the Chilling
Effects search page at http://www.chillingeffects.org/search.cgi, and
entering in the URL of the blog.

If it is brought to our attention that you have republished the image in
question, then we will count it as a
violation on your account. Repeated violations of our Terms of Service may
result in further action taken against your Blogger account including
deleting your blog and/or terminating your account. If you have legal
questions about this notification, you should retain your own legal
counsel.

Regards,

The Google Team


Hello Swapna,

We reviewed the URL in question, verified that it has been removed and
have reinstated the following URL(s):

http://swapnamanjusha.blogspot.com/

Regards,

The Google Team

Monday, September 17, 2012

बईठल-बईठल गोड़ो टटाने लगा है...(Monologue)



आज तो भिन्सरिये से, जब से गोड़ भुईयां में धरे हैं, अनठेकाने माथा ख़राब हो गया है। बाहरे अभी अन्हारे है..बैठे हैं ओसारा में और देख रहे हैं टुकुर-टुकुर। आसरा में हैं कब इंजोर होवे, साथे-साथे सोच रहे हैं, काहे मनवा में ऐसे बुझा रहा है, हमरा तो फुल राज है घर पर (कौनो गलतफैमिली में मत रहिएगा, हम निरीह राष्ट्रपति हूँ, प्रधानमन्त्री नहीं), हाँ तो हम कह रहे थे, फुल राज है हमरा घर पर, न सास न ससुर, न कनियां, न पुतोह, न गोतनी, न भैंसुर, न देवर-भौजाई, बस दू गो छौंड़ा और एगो छौड़ी है हमर । पतियो तो नहीं हैं हियाँ, जे नरेट्टी पर सवार होवे कोई। ऊ हीयाँ नहीं हैं, माने ई मत समझिये कि, हमको फुल पावर है। अरे अईसन खडूस हैं, कि रिमोटे से, कोई न कोई बात हमरे माथा पर बजड़बे करते हैं। साँवर, पतरसुक्खा आदमी बहुते खतरनाक होता है...हम कह दे रहे हैं। :)

हाँ.. तो तखनिए से हम सोच रहे हैं कि, काहे हम खिसियाये हुए हैं। अरे ! आप हमको बुड़बक मत न समझिये, तनी कनफुजिया जानते हैं और नर्भसाईयो जाते हैं। हाँ ! अब इयाद आ गया, कल्हे बोले थे, बचवन को, बाबू लोग गाड़ी थोडा हुलचुल कर रहा है, देखवा लो, कुछ कमी-बेसी होवे तो, बनवा लो, आज एतवार है, हमको कहीं जाना पड़ सकता है, कहीं बीच बाजार में ई टर्टरावे लगेगा तो बेफजूल में माथा ख़राब होवेगा। लेकिन ऊ लोग तो हमरा सब बात टरका देता है न, अभी कुछो apple का टीम-टाम कीनना होगा उनका, तो सब आएगा हमरा खोसामद करने, तब सब लबड़-लबड़, निम्मन-निम्मन बात करेगा, यही बात पर तो हमको खीस लगता है | सब बचवन एक लम्बर का खच्चड़, लतखोर और थेथर हो गया है, बड़का तो महा बकलोल, बुड़बक, और भीतरी भितरघुन्ना है, काम कहो तो करता नहीं है, यही में मन करता है, सोंटा निकाल लेवें |

जब बियाह होगा, आउर आवेगी कोई गोरकी-पतरकी, तब सब एक टंगड़ी पर खड़ा रहेगा लोग, ठीके है वही लोग सरियावेगी ई सब को, सबको बहुते फिरफिरी छुटता है..खाना परोसो तो सौ किसिम का नखरा, कलेवा होवे कि बियालु किचिर किचिर होबे करेगा, कोई को रामतोराई नहीं पसीन्द, तो कोई बाबू साहेब को कोंहड़ा नहीं पसीन्द, कोई का पेट गोंगरा, पेचकी, बईगन, बचका से ऐंठता है, कोई भात से दूर भागता है, तो कोई रोटी देखिये के रोता है, हाँ चोखा सब मन से खाता है, आउर फास्ट फ़ूड, पीजा परात भर के रख देवें तो सब भकोस लेगा लोग। एगो हमरे बाबा थे, पहिला कौर मुंह में डाले के पहिले ही चालू हो जाते थे। खाना बढियाँ बना है, खाली धनिया तनी ठीक से नहीं भुन्जाया है, सीझा नहीं है आलू, तनी महक आ रहा है जीरा का। हाँ तो ई बचवन अब काहे को पीछे रहेगा भाई, खाना में मीन-मेख निकाना सब अपने नाना का कौउलेज में सीखा है ना।

देख लीजियेगा, बियाह बाद सब छौडन लोग छूछे भात खायेगा, भिंजाया हुआ बूट भी ऐसन चभर-चभर खायेगा जैसे पोलाव खा रहा है...काहे ? काहे कि उनकी कनियाँ  बना के देवेगी न.! तखनी हम पूछेंगे सबको।

हमको बढियाँ से मालूम है, सब एक पार्टी हो जावेगा, हमरे ई तो अभिये से कहते रहते हैं, जेतना टर्टराना है टर्टरा लो, मेहराना तो तुमको हईये है, सब पतोहू लोग को हम बतावेंगे तुम हमको केतना नाच नचाई हो।  फोनवा पर उनसे रोज़-रोज़ हमरा बतकही होईये जाता है, अब का बात पर होता है, का-का बतावें, गोइंठा में घी कौन डाले। हमको कहे ऊ एक दिन तुम तो ट्यूबलाईट हो कुछो नहीं समझती हो, हमहूँ कह दिए आप तो ढिबरी हैं, बस बमकिये गए आउर फोनवे बीग दिए। जाए देवो हम कौनो डरते हैं का किसी से। :)

कल्हे ठेकुआ, निमकी और पुरुकिया बनाए थे, आधा घंटा में सब चट कर दिया बचवन, अब हमको छूछे चाय पीना पड़ेगा,

चलिए सूरज भगवान् दरसन देवे लगे हैं अब, और सामने अंगना में एगो खरगोस दीस रहा है, रोज़ आ जाता है ई सब, एक बार तो घर के भीतरे ढुकने का कोसिस भी किया था, हम धरने गए तो बकोट-भभोड़ दिया था हमको, बढ़नी से मारे तो भागिए गया...हाँ नहीं तो...!

दू-चार गो हुलचुलिया बेंग तो रोजे देख लेते हैं, अरे, उनका ठोर देखके अंग्रेजी फिलिम याद आ जाता है, कौनो देस की राजकुमारी थी, जो बेंग का ठोर पर चुम्मा कर दी, और बेंगवा राजकुमार बन गया। राम-राम केतनो कोई बड़का राजकुमार बन जावे, बेंग का ठोर पर तो हम मरियो जावेंगे, तईयो चुम्मा नहीं करेंगे...

चलिए अब सूरज देवता परकट होइए गए, दू गो मौगी दौड़ने निकल गई है, हमहूँ अब कौनो काम-ऊम कर लेवें, अब हियाँ खेत-खलिहान तो है नहीं कि, दौनी, निकौनी, कियारी-कदवा, पटवन-छिट्टा करें, न हमरे पास कोई गाय-गरु है कि दर्रा-चुन्नी सान के दे देवें...अभी तो हम भीतरे जावेंगे, फट से इस्टोव जलावेंगे, अउर अपना लेमन टी बनावेंगे..फिन आराम से पोस्ट-उस्ट पढेंगे, बचवन को हाँक लगावेंगे, सब उठेगा धडफड़ईले :) तो चलिए फिर मिलते हैं, काहे से कि अब बईठल-बईठल गोड़ो टटाने लगा है , एक कुंटल वोजन जो हो गया है हमरा .....हाँ नहीं तो..!

जब से तेरे नैना मेरे नैनों से लागे रे ...आवाज़ 'अदा की 

Saturday, September 15, 2012

सौम्य शिव...!



स्मृतियों की,
अमावसी, बेजान मूर्तियाँ,
समय के प्रवाह में,
कब की,
विसर्जित हो चुकीं हैं,
फिर भी... 
मेरे पीछे-पीछे,
क्यों लक्ष्यहीन सी,
ये धीरे-धीरे, 
डग भरतीं हैं ?
जबकि, 
उनके साथ बंधीं,
फ़ालतू सी गांठें, 
शिथिल हो, 
खुल चुकी हैं ।
मेरे...
सामने अब,
वृहत प्रकाश है,
दिन का उजास है,
हर्ष और उल्लास के,
कंकड़-पत्थर,
लुढ़कते-लुढ़कते,
अब गोल हो गए हैं,
और..
स्थापित हो गए,
मेरे मन-मंदिर में,
सौम्य शिव की तरह ..!!

वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें ...आवाज़ 'अदा' की ..

Friday, August 31, 2012

'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा' या 'ज़िन्दगी मिल गयी दोबारा'

जयपुर, होटल मोसाइक 

उर्सुला, मैं, माधुरी (उदयपुर)

कुछ समय पहले एक फिल्म देखी थी, 'ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा', बड़ी अच्छी लगी थी फिल्म। हालाँकि इस थेओरी से बहुतों को इत्तेफाक नहीं होगा । कारण हिन्दू सनातन धर्म में पुनर्जनम अवश्यम्भावी है, कहते हैं हमारे कर्म एक खाते में जमा होते जाते हैं और अगले जनम में अच्छे-बुरे कर्मों के अनुसार ही आपको योनी प्राप्त होती है। क्योंकि आत्मा तो अजर-अमर है, बस शरीर ही मरता है। अगर आपने अच्छे कर्म किये हैं, तो अच्छा शरीर, अच्छा जन्म  और अच्छी योनी मिलती है। दिल तो करता है मान लूँ ये बातें लेकिन फिर दिमाग ऊंह-पोंह में लग जाता है। 

आपने केंचुआ तो देखा ही होगा, आत्मा उनमें भी होती ही होगी, एक केंचुवे में एक ही आत्मा होती होगी, लेकिन अगर आप उसे दो हिस्सों में काट दें तो, दोनों केंचुवे जिंदा रहते हैं और जी भी जाते हैं। शरीर के दो टुकड़े हो जाने पर उसकी आत्मा का क्या होता है, यही सोचती हूँ। क्या वो भी दो हो जाती है ???
बस इसी चक्कर में हम भी सोच ही बैठे, क्या पता फिर मौका मिले ना मिले। बस जी, हम तीन सहेलियाँ ऐसे किसी रिस्क के मूड में नहीं थीं, सो निकल पड़ीं अपने मन की करने। कुनकुरी, जयपुर, उदयपुर, अजमेर शरीफ, माउन्ट आबू और कलकत्ता हो आये हैं हम । शनिवार को भुवनेश्वर की रवानगी की राय है।

वैसे अब तक अपना रिकॉर्ड सोलिड रहा है, जंह-जंह पाँव पड़े संतन के तँह-तँह बंटाधार। जयपुर में सुनामी आते-आते रह गई , हमारे पाँव धरने भर से। हमने शहर छोड़ा और मौसम सुहाना हो गया।

सिटी पैलेस 

बात जब 'सुहाने' पर आ ही गयी है तो, अपने कलकत्ते से रांची तक के सफ़र को भला हम कैसे भुला दें। हमका भी ऐसा लागा झुलनिया का धक्का कि हम कलकत्ता पहुँच गए। बस लौटती बारी हमरी जैसन ऊँट पर चढ़ल बौनी को भी, पागल कुत्ते ने काट लिया था, जो हम अपना सब टिकस-उकस कैंसिल करवा कर सोचे, बहुत उड़ लिए पिलेन में और कर लिए सफ़र टिरेन में, तनी बस का भी आनन्द उठाना चाही, और फट दनी ले लिए टिकस बस का । ख़ैर ज़नाब हम बसवा का टिकसवा लेइये लिए। अरे रुकिए टिकसवा लेवे से पहिले ही उन महान बसों के सब रिश्तेदार साम-दाम, दंड, भेद में जुट गए कि उनकी बस से बढियाँ बस न कभी बनी है और न कभी बनेगी, बस न हुई विवाह योग्य कन्या हो गयी, जिसकी तारीफ में इतने कसीदे काढ़े गए कि आखिर हम एक बस पर लट्टू होइए गए। बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाती भला। 

जयपुर पैलेस का प्रवेश द्वार 

अब हमको का मालूम था कि परिवहन निगम वाले ख़ाली बस चलावे ख़ातिर परमिट दे देते हैं। रोड-ऊड है कि नहीं इससे उनका कोई लेना देना नहीं होता है। ई सब ज़िम्मेवारी चाहे तो बस वालन की है या फिर पसिंजर की। बस ई बहुत छोटी सी बात, बताना भूल गए बस वाले हमको कि , मईडम बस तो है, परमिट भी है, और हम ले भी जावेंगे आपको, बाकी एक ही कमी है, रोड नहीं है, परिवहन निगम वाले रोडवा बनाना भूल गए हैं। चाहें तो यात्रा से पहिले रोड बनवा लेवें आप, नहीं तो बस राम जी के हाथ में अपने जीवन की बस दे देवें, ऊ पार लगाईये देवेंगे,  और एक और ऑप्शन हैं ही है हमरे पास, एक अदद सनकी  खेवन्हार भी हैं जिनको हम डराईवर साहेब भी कहते हैं। 

हमरा सुहाना सफ़र शुरू हो गया,  सबसे पाहिले तो हम ई देख कर हैरान हुए कि, ई पसिंजर बस है कि गुड्स बस है, एतना सामान ठूंसा हुआ था कि सचमुच पाँव धरने की जगह नहीं थी वाली कहावत चरितार्थ हो गयी।  खैर जैसे तैसे हम अपना स्थान ग्रहण कर ही लिए। बस के लछन शुरू से सही नहीं दिख रहे थे। बस अपने टाईम से पहले ही चल पड़ी, ई देख कर हम खुद को लात मारने लगे, कितनी बुरी बात है हमेशा शक करती हो, कितने अच्छे लोग हैं ये और तुम इनपर शक कर रही थी, छी छी बहुत बुरी बात है। 

ख़ैर जिस रफ़्तार से बस चली थी, उसी रफ़्तार से थोड़ी दूर आकर रुक गयी। हम समझे शायद बेचारे कुछ भूल-भाल गए होंगे, या फिर कोई इनका अपना प्रोसेस होगा, काहे को ख़म-ख्वाह बाल की खाल निकालना। ऊ तो बाद में पता चला कि पहले आकर उस जगह रुकने से उनकी बची हुई सीट्स के लिए पसिंजर मिल जाते हैं। 

बस अब भर चुकी थी और चल भी पड़ी, लेकिन कुछ दूर आकर फिर रुक गयी। अब यहाँ इस बात का इंतज़ार होने लगा कि बाकी जितनी भी बसें हैं, वो भी अब आ जाएँ फिर सारी  सहेली बसें एक साथ चलेंगीं काहे से कि नक्सलियों का नियम है, ऊ लोग बस अकेले का ही शिकार करते हैं, सब साथ हों तो हिम्मत नहीं करते हैं। सारी बसों को एक साथ आने में वक्त लग ही गया। 

अब हमारी बस भी चल निकली, लेकिन वाह री किस्मत, उसकी रफ़्तार, माशाल्लाह, कहीं भूले से अगर जो नक्सली टकर  जाते तो, अगर वो नींद ले-ले कर भी बसों को पकड़ते तो कसम से एक भी पसिंजर मिस नहीं करते वो। पूरा रास्ता एक-दो फीट गढ़ों से भरा हुआ था। बारिश का पानी उन गढ़ों में भरा हुआ था। सवा तीन सौ किलोमीटर लम्बा रास्ता कहीं से भी रास्ता नहीं था। 

दोनों राज्य सरकारों को डूब मरना चाहिए उन्हीं गढ़ों के पानी में, क्योंकि दोनों राजधानियों को जोड़ने वाली इस सड़क, जिस पर प्रतिदिन लाखों इंसानी जीवन सफ़र करते हैं, उनकी जान के साथ बेरहमी से खिलवाड़ किया जा रहा है, इसका हक़ किसी को भी नहीं है, करोड़ो रुपयों के असबाब रोज़ इसी रास्ते से आते जाते रहते हैं, जो नागालैंड तक जाते हैं, और जिनकी सुरक्षा का कहीं कोई इंतज़ाम नहीं है। 

इन राज्यों के मंत्रियों को भी, उनके परिवार समेत,  इस रास्ते से बाँध कर ले जाना चाहिए, ताकि उनको भी तो पता चले भारतीयों का जीवन कितना सस्ता है, और मज़े की बात ये होगी कि कलकत्ता से राँची तक की दूरी तय करने में उनके दिल का स्ट्रेस टेस्ट हो जाएगा, बहुत दिनों से ऊ लोग हेलिकोप्टर का हवा खा रहे हैं। हम सच कहते हैं एक बार इन महामहिम मंत्रियों को परिवार के साथ इस रास्ते से उन्हीं बसों में भेजा जाए, फिर देखिये कैसे उनका भेजा फ्राय होता है और जब एक बार अपने घर वालों की आँखों में दहशत देख लेंगे सारे के सारे मंत्री दूसरों के जीवन की कदर करने लगेंगे। इस सड़क से जो भी एक बार गुजर जाएगा उसे इंसानी जीवन का सही मूल्य समझ में आ जाएगा। 

बहुत ज़रूरी है, इस सड़क की सही हालत, लोगों को बताना, इसे सरकार की नज़र में लाना, सरकार को मजबूर करना कि अब वो जनता की ज़िन्दगी से खेलना बंद करे, टैक्स-पेयर्स को उनके पैसों की सही कीमत मिले, हर हाल में यह रास्ता दुरुस्त किया जाए, इस पर टोल-बूथ बैठाये जाएँ, ताकि ये अपने रख रखाव के लिए यह स्वयं अर्जन कर सके। यह सड़क व्यावसायिक दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण सड़क है, इतना ही नहीं यह दो राज्यों के न सिर्फ बहुत ही महत्वपूर्ण स्थानों को जोडती है बल्कि इन जगहों में रहने वाले लोगों के दिलों को भी जोडती है। 

वैसे इस सड़क ने कल हमारा दिमाग बहुत ख़राब किया था, एक बार जब घर पहुँच गए तो यूँ लगा था जैसे 'ज़िन्दगी मिल गयी दोबारा 'शायद इसलिए कि हम तीनों बचपन की सहेलियाँ (उर्सुला, माधुरी और मैं) साथ थीं। 
वोई तो :):)
   



Tuesday, August 14, 2012

आधी रात का सवेरा ...


दिल्ली ने !
अतीत के 
अनगिनत उत्सव देखे हैं,
चक्रवर्ती सम्राटों के राजतिलक देखे हैं,
शत्रुओं की पराजय देखी,
विजय का विलास देखा,
अपूर्व उल्लास देखा,
परन्तु...
ऐसी एक घड़ी आई 
जब...
सूर्योदय और सूर्यास्त का 
अंतर मिटते देखा,
बड़े-बड़े महोत्सवों 
और महान पर्वों को 
फीका पड़ते देखा,
उस रात... 
मतवारे, दिल्ली की सड़कों पर झूम रहे थे,
कितने ही सपने, 
लाखों रंग लिए
बूढी आँखों में घूम रहे थे,
दिल्ली की धमनियों में 
स्वतंत्रता
यूँ अवतरित हुई थी,
जैसे...
धरती पर 
स्वर्ग से गंगोत्री उतर आई हो,
आधी रात को तीन लाख ने
सुर मिलाया था,
'जन-गण-मन', 'वन्दे मातरम्' 
का जयघोष लगाया था,
पहली बार...
'शस्य-श्यामला'
'बहुबल-धारिणी'
'रिपुदल-वारिणी'
शब्दों ने...
स्वयं ही पुकार कर
अपना सही अर्थ
इस दुनिया को बताया था,
ललित लय में 
हिलते हुए वो अनगिनत सिर,
क्या सोच रहे थे 
ये इतिहास में नहीं लिखा गया, 
मगर वो तारीख़ 
दर्ज हो गयी आने वाली 
अनगिनत शताब्दियों के लिए,
जब...
आधी रात के सवेरे ने
१५ अगस्त १९४७ को,
आँख खुलते ही
सलामी दी थी
नवीन, अभूतपूर्व 
तिरंगे को,
जयघोष के नाद से 
जनसमूह की नाड़ियाँ,
युद्धगान से धमक उठीं,
माँ भारती ने अपनी बाहें फैला दी
अपने बच्चों के लिए, 
क्योंकि अब !
कोई बंधन नहीं था...!
जय हिंद...!!



सभी चित्र गूगल से साभार...