Sunday, May 6, 2012

तजुर्बों के रास्तों से, उम्र का गुज़रना....


तजुर्बों के रास्तों से 
उम्र का गुज़रना,
फिर
आड़ी-तिरछी पगडंडियों 
का चेहरे पे जमना, 
चाहत, वफ़ा, उल्फत का 
एक-एक कर
उदास होना,
हकीक़त के जिस्म से
हर लिबास का उतरना ,
डरा तो देता है 
लेकिन,
दिल के तन्हा गोशे में,
गौहर-ए-जन्नत
झिलमिलाता है !
जहाँ 
मन का फ़रिश्ता 
मुस्कुराता है !!
और, 
एक और ज़िन्दगी जीने को 
उकसाता है...!

और अब एक गीत ...हर दिल  जो  प्यार करेगा...'आवाज़ 'अदा' की...


गौहर-ए-जन्नत=जन्नत का मोती
गोशे=कोना 
लिबास=कपड़ा

Saturday, May 5, 2012

आज मुझे कंस की बहुत याद आई है ...


आज मुझे कंस की बहुत याद आई है 
वही कंस जो देवकी का प्रिय भाई है
इतिहास ने जिसे बहुत क्रूर और कपटी बताया है
बुराई का अवतार बना, अच्छाइयों को नकारा है 
कहते हैं वो दुष्ट था, मैं भी यही समझ पायी हूँ 
पर कुछ तो अच्छाई थी उसमें, यही कहने आई हूँ
वो प्यारी बहन देवकी को, सासुरे छोड़ने जाता था 
आकाशवाणी हुई थी तभी, और कोई उसे बताता था
देवकी का आठवां पुत्र, उसका काल बन जाएगा 
रे दुष्ट उसके जन्मते ही, तू जीवित नहीं रह पायेगा
ऐसी बात कहकर नियति ने, पहाड़ तोड़ा था
तभी तो उसने अपना रथ, उसी जगह से मोड़ा था 
कारागाह में अपनी बहन, और जीजा को छोड़ा था
बहन-जीजा को जीवित रखना, उसकी राह का रोड़ा था
वह राजा था बलशाली था, कुछ भी कर सकता था 
पलक झपकते देवकी-वासुदेव के, प्राण हर सकता था  
लेकिन धैर्य से बैठा वह, काल की प्रतीक्षा करता रहा 
भगिनी के प्रेम में, घात पर घात सहता रहा 
देवकी कंस के लिए बस, मौत ही जनती रही
भाई के लिए पाप के, कई कारण बुनती रही
जानती थी देवकी, बच्चों की मृत्यु हो जायेगी
फिर भला क्यों कोई माँ, बच्चे ही जनती जायेगी ?
देवकी की हर प्रसूति, उसे हिला कर जाती थी 
हर बच्चे में मृत्यु-भय, घोर पाप करवाती थी
देवकी भी कंस के संग, पाप की भागी बनी है
ये न सोचे वो कि उसके, पाप में कोई कमी है
क्या बहन को भाई के लिए, काल जनना चाहिए ?
या बहन को भाई का, कल्याण सोचना चाहिए  
कंस का भगिनी प्रेम, किसी ने नहीं स्वीकारा है
और मैं कहती हूँ कुछ भी कहिये, कंस भगिनी प्रेम से हारा है..

अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो।..आवाज़ 'अदा' की...

पथिक, स्वीकार करो प्रणाम...!!


मैं नहीं ! 
अंतिम वृक्ष,
इस प्रीत के मरुस्थल में,
आते हैं अनेक
चिर अजातरिपु,
कर्मयोगी,
इस कुरुक्षेत्र में,
परन्तु...
इस अनंत पथ के
एक किनारे,
मेरी विस्मृत सी छाँव तक
तुम जाने कैसे 
आ पहुँचे हो,
ले लो तनिक विश्राम, 
तत्पश्चात,
संचित कर लो हृदय में
पारिजात सी छवि,
और चन्दन सी स्मृति,
आगे...
नूतन लक्ष्य का,
प्रथम दिवस दे रहा
आह्वान ...
तुम्हें जाना है, पथिक,
स्वीकार करो प्रणाम...!!

वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें....आवाज़ 'अदा' की...

Friday, May 4, 2012

अनावश्यक और अतिरिक्त....!!


चीकट हुई रजाई से,
झाँकती चीकट रूई ।
बिना खोल के,
चीकट तकिया,
बरसों पुरानी,
चीकट चादर ।
भूरे से धब्बे,
कितना गंधाते हैं,
अपनी विवशता बताते हैं ।
सामने दीर्खा पर,
अंग-भंग शंकर की मूर्ति,
टंगा है अलने पर,
मैला-कुचैला,
खद्दर का कुरता ।
ज़ेब में थोड़ी सी रेजगारी,    
टूल पर रखा,
टूटा सा चश्मा,
एक 'अनावश्यक' व्यक्ति
का कमरा,
कुछ ऐसा ही नज़र आता है । 
हर वक्त बताता है,
महसूस कराता है,
तुम, 'अतिरिक्त' हो ...!

भरी दुनिया में आखिर दिल को समझाने कहाँ जाएँ...आवाज़ 'अदा' की ..

Wednesday, May 2, 2012

ज़रुरत है हिंदी साहित्य के विकास के लिए....

'पुरानी प्रविष्टि'
ज़रुरत है हिंदी पुरस्कारों के लिए,
कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की,
एक कवयित्री चाहिए,
जिसका रंग गोरा, 
कद ५ फीट ३ इंच
और बायें गाल पर तिल हो,
जिसने ख़ूब ख़ूबसूरती पाई हो,
और अपनी हर कविता में
मर्दों की, की धुनाई हो,
ऐसा हो तो और अच्छा हो 
कि उसके हर लेख में
नारी शक्ति की ही चर्चा हो,
एक युवा कवि चाहिए
जो लगभग ५५ का हो,
जो भी उसने लिखा हो  
कोई समझ न पाया हो,
चाहे पहले कुछ भी लिखा हो,
पर अब क्षेत्रीयता विरोध अपनाया हो,
साथ ही यह पक्का कर लेना
वो यू.पी., बिहार का जाया हो, 
दलित वर्ग का भी कवि देखो
वह पैदायशी दलित होना चाहिए, 
मोटा-ताज़ा ना हो
दलित ही दिखना चाहिए,
एक और कैटेगोरी आई है
जो धर्म निरपेक्षता कहलाएगी,
इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ 
मुसलमान कवि ही आएगा,
जो अलीगढ़ के आस-पास 
ही पाया जाएगा, 
कैसे भी पकड़ कर लाओ 
उसको हमारे पास,
बस हिन्दू-विरोधी न हो
यह बात होनी है ख़ास,
बाल कवियों की भी श्रेणी है
यह कवि उस जगह पाओगे, 
जहाँ बच्चे ग़ायब होते ज्यादा 
ढूँढने का बस तुम कर लो इरादा,
मझोले कद का हो और शक्ल से
शरीफ लगता हो,
अन्दर से चाहे घाघ हो,
पर ऊपर से ख़ूब जंचता हो,
इतने से ही हमारा सारा काम
अजी चल जाएगा,
वर्ना हिंदी-विकास का कोटा
साफ़-साफ़ रुल जाएगा, 
अरे जल्दी कुछ करो भाई
वर्ना समझो कि शामत आई,
फण्ड अलोकेशन समाप्त होने का 
महीना आया है,
और ट्रेजरी ने भी 
जम कर याद दिलाया है
अगर ये राशि नहीं खर्ची तो,
वो सारे पैसे ले जायेगी
और हिंदी साहित्य पुरस्कार की
नैयाँ ऐवें ही डूब जायेगी,
हिंदी विकास का धंधा 
फिर मंदा हो जाएगा,
और जाने कितनों के 
घर का चूल्हा,
फिर ठंडा हो जाएगा ...

और अब एक गीत 'आपके हसीं रुख पर आज नया नूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है'


Tuesday, May 1, 2012

हर फिकराकस की एक औक़ात होती है.....




मसक जातीं हैं,
अस्मतें,
किसी के फ़िकरों
की चुभन से,
बसते हैं मुझमें भी
हया में सिमटे
आदम और हव्वा,
जो झुकी नज़रों से

देखते हैं,

खुल्द के फल का असर |
दिखाती हैं

सही फ़ितरत, 

इन्सानों की,
उनकी तहज़ीब-ओ-बोलियाँ,
वर्ना पैरहन के नीचे 

सबका सच एक ही होता है ,
मानों...या न मानों
फ़िकरों की भी, ज़ात होती है,
और हर फिकराकस की 
एक औक़ात होती है.....



इतना तो याद है मुझे.....'अदा' की आवाज़...