समीर जी, साधना जी, आशू (छोटा बेटा)
टोरोंटो का सफ़र....४ घंटे का रहा...
पहुंचना था हमें समीर जी के घर १ से २ के बीच लेकिन पहुंचे हम लगभग ४ बजे...और जैसी उम्मीद थी कहाँ रुक पाए हमारे लिए ..खा-पीकर डकार मार कर बैठे थे...साइज़-वाइज़ नहीं देखा है...:)
खैर हमारा क्या हम पहुँच गए...वो तो भला हो "अन्नपूर्णा" साधना जी का, बाकायदा उन्होंने हमें भोजन कराया ....बात-बात में पता चला कि मुर्गी हलाल तो कहीं और हुई थी लेकिन देगची में जलवा नशीन समीर जी ने ही किया है उसे...इतनी लज़ीज़ वो जीते जी भला कहाँ होती....!!
रोटी, चावल, आलू गोभी की सब्जी, बंद गोभी की सूखी सब्जी, लोबिया की दाल, चिकेन, रायता, अचार, सलाद इत्यादि-इत्यादि ...भूख के मारे वैसे भी दम निकला जा रहा था और खुशबू यूँ भी जान लेने को तुली हुई थी...बस जी हमने तो भोजन पर धावा बोल दिया....
लम्बा सफ़र, अच्छा भोजन, दिलकश वातावरण, दिलनशीं मौसम, दिलदार साधना जी और दिलेर समीर जी...फिर क्या था..हम भी सोफे में धंसे हुए जो बातों की पिटारी खोल कर बैठे तो यूँ समझिये कि एक से एक, धमाकों और फुलझड़ियों का ज़िक्र होता गया...कभी ताऊ जी की ब्लॉगबस्टर शोले, तो कभी खुशदीप जी के मक्खन की बात, कभी महफूज़ मियाँ का ग़ायब होना, फिर जबलपुर में पाया जाना, उनकी टी-शर्ट, और अमेरिका में सम्मान, तो कभी झा जी की टंकी, कभी दाराल साहेब का दराल्नामा, कभी पाबला जी का वो मेरी खिड़की से झांकना, कभी ललित जी की मूंछें, कभी वाणी और मैं एक हैं इसपर शक, कभी गिरिजेश जी की वर्तनी सुधार, कभी संगीता जी का ज्योतिष और कभी फुरसतिया जी के लेखन की तारीफ, मतलब ये कि बस अविरल ब्लॉग धारा बहती रही....इतनी कि याद ही नहीं रहा मेहमानों के आने का समय भी हो गया था, और हमें अपना साज सामान भी लगाना था...महफ़िल जो थी रात की ...खैर सबकुछ समय से हो गया और शाम-ए-महफ़िल सज गयी,
मुझे और संतोष जी को तो गाना ही था, समीर जी ने अपनी कविता स-स्वर सुनाई, कविता तो बहुत-बहुत अच्छी थी... और सुर..!! ठीके-ठाक है.....सुर में थोड़ी बहुत टंकण त्रुटि हैं.....लेकिन झेलनीय है ....सो झेल लिए खुदा भी आसमान में जब सुनता होगा, तो अब ख़ुश होके सुन लेता होगा..... :)
साधना जी ने भी समीर जी की कविता सुर के साथ सुनाई....जिसे सबने दिल खोल कर पसंद किया...बहुत ही सुन्दर गाया साधना जी ने....ये तो उस कविता कि खुशकिस्मती कहेंगे कि उसे साधना जी का स्वर मिला...वर्ना...आप समझ ही रहे होंगे मैं क्या कहना चाहती हूँ ...:)
मैंने भी अपनी कवितायेँ सुनाई...जब मैं सुना रही थी और लोग वाह-वाह कर रहे थे...तब कहीं किसी को कुछ हो रहा था, लेकिन मैंने ध्यान नहीं देना ही उचित समझा ...:) अब ऐसा है कि मेरे साथ ये होता ही रहता है....हाँ नहीं तो...!!
ये महफ़िल रात २ बजे तक चली...
और हम रात ३ बजे के करीब बिस्तर के हवाले हुए...
सुबह जब उठ कर नहा-धो कर मैं नीचे पहुंची तो देखती हूँ कि ब्लॉग टाइकून हरी मिर्च काट रहे है....मैं उनका यह रूप देख फट से वहीँ नत-मस्तक हो गयी... सर्वश्रेष्ठ ब्लाग्गर आभा मंडल अपने चारों ओर लिए हुए और करछुल भांजते हुए जो उन्होंने लेमन चवाल बनाया ...उसके लिए सारे उपमा-उपमेय तेल लेने चले गए....अगर ये लेमन चावल पोस्ट हो जाती तो निःसंदेह २०० टिप्पणियों और २०-३० चटकों के साथ टॉप पर आ ही जाती...हम उस वक्त चटके नहीं लगा पाए लेकिन चटखारे तो लगा ही आये....आहा आहा ...
हम तो बस ये रूप देखते जाते और सारे गुर अंटी में बाँधते जाते थे...कि क्या पता कौन सा नुस्खा ब्लॉग्गिंग में कब काम आ जाए....
फिर ब्लॉग गोड फादर विराजमान हुए अपने सिंहासन पर ...और उसी मुस्तैदी से जिस मुस्तैदी से ऊ करछुल भाँज रहे थे अब माउस भांजने लगे....हमने BUZZ की बात की, हिंदी के विकास के लिए अपने resources मिलाने की बात की, न जाने कितने आइदिआस पर बातें होती रहीं समीरजी और संतोष जी के बीच ....और ये वादा लिया-दिया गया कि आगे भी इन बातों पर अमल किया जाएगा... कुछ करना ही होगा, जो सार्थक होगा...
लगे हाथों समीर जी के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेर की बात भी खुल कर सामने आ गयी...हम दांतों तले ऊँगली दबाने ही लगे थे ...कि वो खुशनसीब छम से सामने ही आ गयी....देखा तो श्याम वरण, चपल-चंचल, बड़ी-बड़ी आँखों वाली गिलहरी थी जिससे समीर जी रोज आँख मटका किया करते हैं...और मूंगफली बतौर पटाने के लिए दिया करते हैं...साधना जी ने बताया कि आज कल उन दोनों
में नहीं बन रही है....बने कि न बने हमरे दिल में काहे को साँप लोटेगा भला...!!
थोड़ी देर में हमने brunch किया और वो ही कहावत चरितार्थ करते हुए वहां से ओट्टावा के लिए रवानगी की राय ले लिए....गंजेड़ी यार किसके खाए पिए खिसके....
घर आकर सोच रही हूँ....साधना जी और समीर जी से क्या सचमुच हम पहली बार मिले...ऐसा तो कुछ भी नहीं था जो पहली बार मिलने में होता है, अगर कुछ था तो बस ढेर सारा अपनापन, छटका भर-भर सम्मान और अंचरा भर-भर प्यार...
समीर लाल...सचमुच....ठंडी हवा का झोंका....हाँ नहीं तो...!!!