Friday, February 12, 2010

पर वो लड़की ?



माँ -
ने समझाया,
बचपन छूट चुका है
ये भी बताया
बड़ी हो गयी हो,
हाथ पांव समेट कर
ढंग से रहा करो,
इस बात को बार बार
भेजे में घुसाया
उसने आँखें गोल गोल घुमाई
अंगूठा दिखया, जीभ निकाली
और पैर पटक कर बैठ गयी



सास-
ने फटकारा
कुलच्छिनी बताया
भाग फूट जाने का
अंदेशा लगाया
छाती पर मूँग दलने
की भीषण पीड़ा से भी
बार बार उसको
अवगत कराया
उसने आँखे झुका ली
मन ही मन गोल गोल घुमाई
मन ही मन अंगूठा दिखाया
मन ही मन जीभ निकाली
पैर पटक कर,
मन ही मन बैठ गयी
बेटी से बहू तक की
सारी सीढियाँ
मैं तो तय कर गयी
पर वो लड़की ?
वो तो बस
आँख, अंगूठा, जीभ
और पाँव में ही सिमट
कर रह गयी

Thursday, February 11, 2010

हमारी दिल्ली .......


 जामी मस्जिद
चौदहवीं शताब्दी के मध्य में भारत की सल्तनत फ़िरोज़ शाह तुगलक (१३५१-१३८८) के कुशल हाथों में रही ...इस्लाम के आगमन से लगभग डेढ़ शताब्दी तक देश का माहौल बड़ा ही अनिश्चित और हिंसा पूर्ण रहा ...लेकिन फ़िरोज़ शाह तुगलक के सैतीस वर्ष का शासनकाल अपेक्षाकृत शांतिमय था....फ़िरोज़ शाह ने यह शासन प्रखर बुद्धिवाले मोहम्मद बिन तुगल से प्राप्त किया था ...१३२७ में दिल्ली की आबादी दौलताबाद में... जो अब महाराष्ट्र में है...स्थान्तरित कर दी गई थी लेकिन...इस समय लोग दिल्ली वापिस आ गए थे... 

फ़िरोज़ अत्यंत ही धर्मपरायण व्यक्ति था ...लेकिन मदिरापान का शौक रखता था ...उसे शिकार का बहुत शौक था और निर्माण के काम के प्रति रुझान भी...फ़िरोज़ ने किसी भी तरह की यंत्रणा पर प्रतिबन्ध लगाया हुआ था ...परन्तु धर्म-परिवर्तन को उनकी मान्यता थी...बल्कि धर्म-परिवर्तन करवाने वालों, और करने वालों को वो जज़िया कर से मुक्ति दे दिया करता था....इससे धर्म-परिवर्तन को प्रोत्साहन ही मिला था....इस्लाम के प्रति आगाध निष्ठा ने ही फ़िरोज़ को मंदिरों के स्थान पर मस्जिदों का निर्माण करने के लिए प्रेरित किया....उसकी शिक्षा और उसके परिवेश ने उसे धार्मिक असहिष्णुता से उबरने नहीं दिया....हिन्दुओं और मुसलामानों को सामान दृष्टि से देखने का अवसर २०० वर्ष बाद ही आया... जब शहंशाह अकबर ने गद्दी सम्हाली...

 हौज़ ख़ास
फ़िरोज़ शाह को वास्तुकला से बहुत प्रेम था ...और उसके ही शासनकाल में प्राचीन निर्माणों का जीर्णोद्धार हुआ ...फ़िरोज़ ने नए निर्माणों की अपेक्षा पुराने निर्माणों को ठीक करने को वरीयता दी...

खलजी काल के जलाशय 'हौज़-ए-अलाई' का जीर्णोद्धार किया गया ..औए इसे 'हौज़ ख़ास' कहा गया...जो फ़िरोज़ शाह की कब्रगाह बना.... 



जामी मस्जिद का प्रवेश द्वार

एक नया नगर ..दिल्ली का पांचवा शहर 'फिरोजशाह कोटला' १३५४ में बनाया गया ....यमुना के तट पर निर्मित चतुर्भुजों का यह नगर हौज़ ख़ास से पीर ग़ायब  (कहा जाता है किएक पीर ॰गायब हो गए थे ) तक फैला हुआ था.....'पीर ग़ायब' इलाका अब हिंदूराव अस्पताल परिसर में आता है .....इस नगर की दीवारें तो बहुत पहले ही ग़ायब हो गयी लेकिन महल 'कुश्क-ए-फ़िरोज़' का मलबा अब भी शेष है ...इसके उद्यानों में अब क्रिकेट मैच आयोजित होते हैं.....तीन आयताकार क्षेत्रों में बसा यह महल अब अवशेष मात्र रह गया है... लेकिन इसी में महल-ए-बड़ी, दीवान-ए-ख़ास, निजी महल, जामी मस्जिद और हवा महल हुआ करता था.....अब कुछ भी बाकी नहीं रहा...न दर्पण कक्ष, न भित्ति चित्र.....तैमूर के प्रहारों से जा बच पाया है उसमें जामी मस्जिद और हवा महल के ऊपर अशोक स्तम्भ शामिल है....

जामी मस्जिद, जो अपने समय की विशालतम मस्जिद थी नियमित रूप से प्रयुक्त होती रही थी...फ़िरोज़ शाह को इस मस्जिद से बेपनाह प्यार था....

जामी मस्जिद का बाहरी हिस्सा

१३९८ में तैमूर लंग दिल्ली आया ...अपने आतंक के बल पर उसने अपने साम्राज्य का निर्माण किया ....वह बग़दाद से होता हुआ भारत पहुंचा था...अपने पीछे उसने भयंकर विनाश का खेल खेला था ....दिल्ली को १७ दिसंबर १३९८ को इस दुर्दांत ने रौंदा और खुद को बादशाह घोषित किया ....तैमूर इसी जामी मस्जिद में इबादत किया करता था....वह जामी मस्जिद की वास्तुकला से इतना प्रभावित था... कि वह भारत के शिल्पकारों को लेकर समरकंद गया..ताकि वहां भी ऐसा ही निर्माण कर सके......एक शताब्दी और पच्चीस वर्षों के बाद उसका एक वंशज भारत लौटा (बाबर .....शायद आप लोग बताइयेगा सही है या नहीं, जिसने मुग़ल सल्तनत कि स्थापना की ) और तैमूर का अंश हमेशा के लिए भारत के इतिहास में समाहित  हो गया...

हवा महल के कमरे पिरामिडनुमा है और हवा महल गुप्त गलियारों द्वारा जामी मस्जिद से जुड़ा हुआ है...यहाँ शायद स्त्रियाँ रहती थीं...यहीं अशोक स्तम्भ भी गड़ा हुआ है...

  
हवा महल की छत और अशोक स्तम्भ 


अशोक स्तम्भ पर आलेख 

बादशाह फ़िरोज़ ने शायद अनजाने में ही एक शांति के पुजारी सम्राट अशोक के चिन्ह से अपने रिहाइश को अलंकृत कर लिया था ...सबकुछ भग्नावस्था में है...लेकिन देखकर लग ही जाता है कि...इमारत बुलंद थी....!!


Wednesday, February 10, 2010

आश्चर्यजनक किन्तु सत्य...


विभिन्न प्रकार के धातु  हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं...अगर आपको याद हो तो दिल्ली के क़ुतुब मीनार परिसर  में एक  ऐसी ही धातु कला का उदाहरण हमें देखने को मिलता है ..'लौह स्तम्भ' ...सरसरी तौर पर देखें तो यह अन्य लौह स्तम्भ की तरह ही लगता है , जब तक  कि आप इसकी विशेषता से अवगत नहीं हो जाते... 

पिछले १६०० वर्षों से आँधी, पानी, तूफ़ान, शीत  और धूल का सामना कर  रहा है यह स्तम्भ ..परन्तु इसपर जंग लगना या अन्य किसी प्रकार की क्षति आप लेश मात्र भी नहीं देखेंगे...यहाँ तक कि  धातुकर्मी  भी..इस स्तम्भ की इस गुणवत्ता से हैरान हैं...कि आखिर  ऐसी क्या बात है.... कि यह स्तम्भ ख़ुद ब ख़ुद अपना संरक्षण कर लेता है...
ऐसा नहीं है कि इसमें धातु ह्रास के गुण दिखाई नहीं देते...देते हैं लेकिन यह ख़ुद ही अपना संरक्षण कर लेता है..और जंग से मुक्त हो जाता है...ठीक उसी तरह जैसे कि किसी मानव शरीर में खरोंच लग जाए और वह अपने आप ठीक हो जाए....
यह स्तम्भ ७ मीटर ऊँचा है और ६ टन वज़न का है...उत्तर भारत के गुप्त वंश (३१९-५५० इस्वी  ) के समय का माना जाता है...उस समय धातु प्रसंकरण और धातु  निष्कर्षण  विधा बहुत उच्च कोटि की थी.... यह स्तम्भ पिटवा लौह का बना हुआ है....
इस स्तम्भ को चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने खड़ा करवाया था ....कहा जाता है कि इस स्थान पर एक जैन मंदिर हुआ करता था ...और यह स्तम्भ उस समय वहाँ पर स्थित जैन मैन्दिर का एकमात्र अवशेष है... इस मंदिर को  क़ुतुबुद्दीन ऐबक  ने यहाँ क़ुतुब मीनार बनवाते वक्त  तुड़वा दिया था ....उसने इस स्तम्भ की कारीगरी और लौह प्रसंकरण देख कर इसे रहने दिया था ...
प्राचीन काल में  धातुकर्मी हमेशा अपने अन्तःकरण से काम लेते थे..वो द्रष्टा हुआ करते थे...स्पर्श मात्र से वो यथार्थ तक पहुँच सकते थे...छूकर यह बताने की क्षमता रखते थे कि ..इस धातु से कैसी कलाकृति बनाई  जा सकती है ...

लोहार विशेष समय की प्रतीक्षा किया करते थे जब ग्रह, चन्द्र, सूर्य  एक विशेष  स्थान पर आते थे ...उन सबके एक विशेष कोण में मिलने से और उनकी किरणों के धातु पर पड़ने से... धातु में दैवीय गुण आ जाते थे..ऐसा उनका मानना था...इस तरह की प्रक्रिया के बाद ही लोहार उस लोहे को किसी अनूठी कलाकृति में ढालता था...यह भी मान्य था कि अगर ऐसे अनुष्ठान नहीं किये गए... तो कला अधूरी रह जायेगी...
ख़ैर...बात हम कर रहे हैं क़ुतुब मीनार परिसर में खड़े 'लौह स्तम्भ' की, तो आज तक वैज्ञानिक इसकी स्वयम संरक्षण के गुण के रहस्य का पता नहीं लगा पाए हैं...और ना ही आज तक इस लोहे के अवयवों की नक़ल की जा सकी है...
आज भी यह खड़ा है..सर उठा कर और बता रहा है कि हमारा अतीत कितना वैभवशाली और गूढ़ था....यह स्तम्भ प्राचीन भारत के विज्ञानं का एक जीता-जागता उदाहरण है....कोई है जो इसकी टक्कर ले सकता है ???


Tuesday, February 9, 2010

राधा का संताप !!!

एक पुरानी कविता...
हे माधव क्या समझ पाए तुम राधा का संताप
तुम सर्वज्ञ दीनबंधु हर लेते हो हर पाप
किस दुविधा में डाला उसको, कैसा दिया यह ताप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

राधा घर से बे-घर हो ली
तुमने अपनी दुनिया संजो ली
कभी सोचा क्या हुआ उसका
जो करती रही बस हरी जाप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

जब तक चाह उसे घुमाया
वन-कानन में रास रचाया
यूँ उड़ा दिया ह्रदय से
जैसे जल बने भाप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

कान्हा तुम भी अलग नहीं हो
पुरुष वर्ग से विलग नहीं हो
खेल-खेल ठुकराया है
राधा-मीरा सब एक माप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

भामा, रुक्मणी, मीरा या राधा
कैसे जीव-ब्रह्म का रिश्ता है साधा ?
सबने तुमको ह्रदय बसाया
तुम करते रहे मजाक
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

क्या कहा राधा का दुःख था ही कितना ?
अरे ! सम्पूर्ण भुवन में दुःख है जितना
सोच के देखो कभी कृष्ण तो
ह्रदय जायेगा काँप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

कभी सोचा कहाँ गयी, क्या हुआ था उसको
तुमने  ह्रदय बसाया जिसको
बौरा गयी तुम्हें ढूंढ़ ढूंढ़
निगल गया मरू-ताप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

Monday, February 8, 2010

पर बैठा रहा सिरहाने पर



तू प्यार मुझे तन्हाई कर
बढ़ के शाने पर रख दे सर
 
तू साथ है तो सब है गौहर 
वर्ना है सब कंकर पत्थर
 
अब कौन ग़मों का हिसाब करे
बस खुशियों पर ही रक्खो नज़र

तेरा प्यार सुलगता है दिल में
आँखों में 
खुशनुमा है मंजर

इक सच्ची बात कही थी कल
सो आज चढ़ूँगी सूली पर
 
बोला ही नहीं तू कितने दिन
पर बैठा रहा सिरहाने पर


गौहर = मोती

Sunday, February 7, 2010

रिपोर्ट....रिपोर्ट.....एक सच्ची घटना....



सुना है,  आज वो पकड़ी गई...
शायद,
उसका नकारा पति, आवारा देवर, और वहशी ससुर 
उसे बाल से पकड़ कर घसीटते हुए ले आये होंगे
लात, घूसे, जूते से मारा होगा  
सास की दहकती आँखें,
उस दहकते हुए सरिये से कहाँ कम रही  होगी,
उसका मुंह बाँध दिया गया होगा,
आवाज़ हलक में हलाक़ हो गई होगी,
दहकता हुआ सरिया नर्म चमड़ी पर,
अनगिनत बार फिसल गया होगा,
दाग दो साली नीपूती कुलटा को,
आँखों की दहशत काठ बन गई होगी, 
कुलच्छिनी, कमीनी, वेश्या,
घर की इज्ज़त बर्बाद कर दी है...
इसका ख़त्म हो जाना ही बेहतर है ..
यही फैसला हुआ होगा 
और फिर सबने उसे उठा कर फेंक दिया होगा...
रसोई घर में...
तीन बोतल किरासन तेल में, 
उसके सपने, अरमान, विश्वास, आस्था 
सब डूब मरे होंगे,
पहली बार उत्तेजित.. उसके पति ने, 
जिसकी इज्ज़त से  वो खेलती रही थी !!
ने दियासलाई सुलगा दी होगी...

स्थिर आँखों से उसने अपने पति को देखा होगा
"काश !!"
फिर छटपटाती आँखों से उसने पूछा भी  होगा
'क्यों' ??

किसी ज़िबह होते जानवर सी वो घिघियाई होगी 
नज़रों के सामने कितनी रातें तैर गयीं होंगी
जब उसने खुद को तलहटी तक नीचे गिराया था ..

काँपा तो होगा हाथ उसके पति का...
पर उससे क्या ???
आज वो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट बन गई, 
'कुँवारी' बताया है उसे..!!
सुबह, एक और रिपोर्ट आई थी...डाक्टर की
जो रसोई घर में घटित ....
इस अप्रत्याशित दुखद दुर्घटना 
में जल कर राख हो गई....!!!