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Tuesday, February 9, 2010

राधा का संताप !!!

एक पुरानी कविता...
हे माधव क्या समझ पाए तुम राधा का संताप
तुम सर्वज्ञ दीनबंधु हर लेते हो हर पाप
किस दुविधा में डाला उसको, कैसा दिया यह ताप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

राधा घर से बे-घर हो ली
तुमने अपनी दुनिया संजो ली
कभी सोचा क्या हुआ उसका
जो करती रही बस हरी जाप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

जब तक चाह उसे घुमाया
वन-कानन में रास रचाया
यूँ उड़ा दिया ह्रदय से
जैसे जल बने भाप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

कान्हा तुम भी अलग नहीं हो
पुरुष वर्ग से विलग नहीं हो
खेल-खेल ठुकराया है
राधा-मीरा सब एक माप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

भामा, रुक्मणी, मीरा या राधा
कैसे जीव-ब्रह्म का रिश्ता है साधा ?
सबने तुमको ह्रदय बसाया
तुम करते रहे मजाक
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

क्या कहा राधा का दुःख था ही कितना ?
अरे ! सम्पूर्ण भुवन में दुःख है जितना
सोच के देखो कभी कृष्ण तो
ह्रदय जायेगा काँप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप

कभी सोचा कहाँ गयी, क्या हुआ था उसको
तुमने  ह्रदय बसाया जिसको
बौरा गयी तुम्हें ढूंढ़ ढूंढ़
निगल गया मरू-ताप
यह अलौकिक प्रेम तुम्हारा बन गया उसका शाप