Saturday, February 6, 2010

टिप्पणी, टिप्पणी, टिप्पणी, टिप्पणी, टिप्पणी, टिप्पणी



दिल तो है दिल ..क्या कीजिये ??


कल मन बड़ा खिन्न हुआ था टिप्पणी के  प्रति लोगों की बात सुन-सुन कर...और मैंने टिपण्णी आप्शन हटा दिया....यह नहीं कि मैंने आपकी टिप्पणी को मिस नहीं किया..बहुत किया...और अवधिया भईया की डांट, निर्मला जी की फटकार,  डॉ.अजित गुप्ता जी का समझाना , दीपक का फ़ोन, अरविन्द जी का धिराना, गिरिजेश जी का चिढ़ाना, महफूज़ का मनाना किशोर जी  का मुस्काना,   रानी का मुझे समझना, मिथिलेश का जाना,  ललित जी का खटखटाना, और वाणी का ना बतियाना....सबने मिलकर मुझे मेरे फैसले पर रहने ही नहीं दिया....
फलस्वरुप टिप्पणी दान-पेटी खोल रही हूँ....
आशा है, आपलोग मेरे इस छोटे से कदम का मकसद समझ रहे होंगे...
अब क्योंकि 'टिप्पणी' से सम्बंधित इतनी प्रविष्ठियां पढ़ ली थी मैंने, कि मेरा आस्तित्व ही 'टिप्पणीमय' हो गया...अतः एक कविता का जन्म हुआ है...देखिये कैसी है...!!!



आभासी दुनिया की बस आधार है टिप्पणी

मृतक भावों में संजीवनी संचार है टिप्पणी

छोटों का हठीलापन, तकरार है टिप्पणी

कभी आदेश भईया का कभी फटकार है टिप्पणी

बहन बन रूठ जाए कभी, दुलार है टिप्पणी

कभी सुरसा सरि गटक जाए, तैयार है टिप्पणी

ग़र बच सको तो बच जाओ तलवार है टिप्पणी

कभी लागे यूँ बस प्रेयसी का प्यार है टिप्पणी

हम तो बैठे दूर देस में, तार है टिप्पणी

भीज गया है मेरा मन बौछार है टिप्पणी

भोली ना समझना इसे खूंखार है टिप्पणी

और कभी यूँ लगे मुझे बीमार है टिप्पणी

घर की बात मत कर अब,घर-बार है टिप्पणी

चरणों से यूँ लिपट बैठे  सरकार है टिप्पणी

भीषण ब्लॉग सागर की खेवनहार है टिप्पणी


Friday, February 5, 2010

पर तुमको क्यों बताएँ, ??



हर दिन तुमने जाने हम को कितने मारे पत्थर
रक्खे हैं सम्हाल के हमने कितने सारे पत्थर

ठोकर तुमको लगती है हम जान नहीं पाए थे
पलकें मेरी चुनती थीं वो कितने सारे पत्थर

ममता की छाती सूखी है, बच्चे तरस गए हैं
पर दूध में नहाते रहते हैं वो बहुत दुलारे पत्थर

किस को काफ़िर बोलेंगे और किस को भक्त कहोगे
ये सारी बातें बता रहे हैं, मेरे तुम्हारे पत्थर

 

भूख की आँधी और गरीबी का ये आलम देखा
खेतों में अब बो डाले हैं हमने सारे पत्थर

आँखें भी डबडबाई 'अदा' और हूक भी तो उठती है
पर तुमको क्यों बताएँ हम, दिल में तुम्हारे पत्थर ?


धन्यवाद.....

Thursday, February 4, 2010

अगर पत्थर वो झूठे हैं, क्यूँ सच्चे चोट खाते हैं

हमारी जिंदगी में भी कई बे-नाम रिश्ते हैं
उन्हें हम इतनी शिद्दत से न जाने क्यूँ निभाते हैं 

तुम्हारी हर दगाबाज़ी हमें जी भर रुलाती है
सबेरा जब भी होता है तो हम सब भूल जाते हैं 

यहाँ ये कैसी दुनिया है जिसे आभासी कहते हैं 
अगर पत्थर वो झूठे हैं, क्यूँ सच्चे चोट खाते हैं ? 

 
ये दिल इस दर्द के जज़्बात से जब भी लरजता  है
पकड़ कर डाल हम ख़ामोशियों के झूल जाते हैं

बड़ा है कौन यां ग़र तुम, कभी इस बात को सोचो
चमारों के छुए पर  ये बिरहमन क्यूं नहाते हैं..?

कभी सोचा 'अदा' तुमने, गरीबों की ही बीवी को 
सभी देवर से क्यूँ बनकर के भाभी जाँ बुलाते हैं ?




Wednesday, February 3, 2010

विपक्ष.... !!!! ..... एक कविता ......समा है सुहाना सुहाना.........एक गीत..


ललकारो मुझे, मैं चुप रहूँगा
 

तुम कोंचो मुझे, मैं चुप रहूँगा
 

तुम थूरो मुझे, मैं चुप रहूँगा
 

तुम हूरो मुझे, मैं चुप रहूँगा

लेकिन.....

तुम शांत हो गए तो, ध्येय खो जाएगा
 

और मेरा चुप रहना, निष्फल हो जाएगा.....


वाणी थैंक्स ..एक शब्द में अटक गई थी...तुमने आज बचा लिया...:)

लगे हाथों एक गीत आपके लिए...
फिल्म : घर घर की कहानी (शायद) 
गीतकार : आनंद बक्शी 
संगीतकार : कल्याण जी आनंद जी 
बोल हैं : 
समा  है  सुहाना सुहाना नशे में जहाँ है.....
इस पोस्ट पर आवाज़ : संतोष शैल की

 

समा है सुहाना सुहाना
नशे में जहाँ है
किसी को किसी की खबर ही कहाँ है
हर दिल में देखो
मोहब्बत जवाँ है
hmm...

कह रही है नज़र नज़र से अफ़साने
hmm...
कह रही है नज़र नज़र से अफ़साने
हो रहा है असर के जिसको दिल जाने
देखो ये दिल की अजब दास्तां है
नज़र बोलती है, दिल बेज़ुबां है
hmm...
समा है सुहाना सुहाना...

हो रहा है मिलन दिलों का मस्ताना
hmm...
हो रहा है मिलन दिलों का मस्ताना
हो गया है कोई किसी का दीवाना
जहाँ दिलरुबा है, दिल भी वहाँ है
जिसे प्यार कहिये, वही दर्मियाँ है
hmm...
समा है सुहाना सुहाना...
 
 

Tuesday, February 2, 2010

पहुँचेंगे शिखर पर वो .....


जब मन उदास होता है
ख़याल के पास होता है

जो दिल में दर्द उठता है
लब पे उच्छ्वास होता है

पहुँचेंगे शिखर पर  वो
जिन्हें विश्वास होता है

सच्चा प्रेम मिल जाए
फिर मधुमास होता है

सुधि सा जो साथी हो
जीवन ख़ास होता है

कलह प्रेमी मनुज का तो
बस विनाश होता है

कुटिलता का अंतिम लक्ष्य
बस भड़ास होता है

जिस जीवन में नहीं उत्साह
मृत्यु के पास होता है


Monday, February 1, 2010

बैंगन की डंठल

एक पुरानी कविता....

याद है मुझे,
बचपन में,
तरकारी से
वो बैंगन की डंठल
के लिए लड़ पड़ना,
सिर्फ इसलिए कि,
वह चिकन के जैसे
होने का
अहसास दिलाती थी |
उसे लुत्फ़ से,
नोच नोच कर खाना
और एकदम
विजेता बन जाना,
बचे हुए
रानों पर हिकारत
की नज़र फेकना,
और ख़ुद को
सांत्वना देना कि
हमने सचमुच
चिकन खाया है |
वो लड़ाई
अब तक रुकी नहीं
मानसिकता की तरकारी
से प्रभुत्वता की डंठल 
हर कोई झपट
रहा है,
विजयी बनने का ख्वाब
बैंगन और चिकन का
फर्क मिटा देता है,
पता तब चलता है
जब वही चूसी हुई 
डंठल की रान, 
कुटिलता से मुस्काती है, 
छले जाने का 
अहसास कराती है,
देर हो जाती है
और हम
बैंगन में चिकन
की मरीचिका से निकल
नहीं ही पाते हैं.....