Tuesday, September 15, 2009

कुछ क़तरे बेतरतीब से...


माना के दरिया में कई क़तरे होते हैं
पर दरिया को क्या पड़ी कि,कितने क़तरे होते हैं
दरिया के बगैर क़तरे की,न कोई हकीक़त न वजूद
फिर भी तेवर लिए हुए,क़तरे होते हैं
मिटने का गुरुर या किस्मत कहें
ज़ज्ब-दरिया में फना,क़तरे होते हैं
क़तरे से दरिया का,रिश्ता है अजीब
नाचीज़ क़तरे होते हैं
जब दरिया से जुदा होते हैं
बेताबी दरिया की क्या बताये 'अदा'
दरिया का अंजाम भी तो क़तरे होते हैं !!

Sunday, September 13, 2009

रिटर्न ऑफ़ ए ग़ज़ल


मेरी ये नामुराद रचना अब ग़ज़ल बन गयी है, एक अजीम-ओ-शान ग़ज़लगो के हाथों....
इस मुई रचना ने कब सोचा था, कि इसे भी कोई सँवारने वाला मिल जाएगा, वो भी यहाँ से हजारों मील दूर जाने किस वादी में हजारों दिलों पर राज़ करने वाले 'श्री मेजर राजरिशी' के हाथों !!!
श्री मेजर राजरिशी को भला कौन नहीं जानता है. ये वो शख्शियत हैं जो फौलाद के हैं पर फूलों सा दिल रखते हैं...बन्दूक और कलम का ऐसा सामंजस्य बिरले ही देखने को मिलता हैं...
जहाँ गज़लकारों की दुनिया में इनकी पहचान है वहीँ सरहद की वादियाँ भी इनके नाम से गूँजतीं हैं...
मेजर साहब, बहुत-बहुत शुक्रिया आपका..
जी हां 'श्री मेजर गौतम राजरिशी' ने इसे दुरुस्त कर दिया है और मैं इसे फिर से पेश करने की हिमाक़त कर रही हूँ.....

क्यूंकि अब ये बाकायदा ग़ज़ल हैं !!!

जब कभी भी हम किसी आजाब में आ जाते हैं
बाहें फैलाए हुए वो ख़्वाब में आ जाते हैं

ढ़ूँढ़ते-फिरते हो तुम जितने सवालों के जवाब
सब के सब ही मेरे पेचोताब में आ जाते हैं

डूबने की कोशिशें मेरी करें नाकामयाब
जाल कसमों की लिये तालाब में आ जाते हैं

कुंद होने चल पड़े दिल के अंधेरों में 'अदा'
नूर की झुरमुट लिए महताब में आ जाते हैं

ये तो है जी after की तस्वीर


और ये रही before की :

जब कभी हम किसी अजाब में आ जाते हैं
बाहें फैलाए हुए वो ख़्वाब में आ जाते हैं

ढूंढ़ते फिरते हैं हम कितने सवालों का जवाब
जाने कैसे वो ख़ुदा की क़िताब में आ जाते है

कोशिशें मेरी डूबने की कर गए नाक़ामयाब
जाल कसमों के लिए तालाब में आ जाते हैं

कुंद होने चल पड़े दिल के अंधेरों में 'अदा'
नूर की झुरमुट लिए महताब में आ जाते हैं


सारी तसवीरें गूगल के सौजन्य से ....

Saturday, September 12, 2009

जाल कसमों के लिए तालाब में आ जाते हैं


जब कभी हम किसी अज़ाब में आ जाते हैं
बाहें फैलाए हुए वो ख़्वाब में आ जाते हैं

ढूंढ़ते फिरते हैं हम कितने सवालों का जवाब
जाने कैसे वो ख़ुदा की क़िताब में आ जाते है

कोशिशें मेरी डूबने की कर गए नाक़ामयाब
जाल कसमों की लिए तालाब में आ जाते हैं

कुंद होने चल पड़े दिल के अंधेरों में 'अदा'
नूर की झुरमुट लिए महताब में आ जाते हैं


सारी तसवीरें गूगल का सौजन्य से ....

Friday, September 11, 2009

मानोगे हम दुनिया हिला कर चले


तुम्हारी नज़र में नज़र हम न आयें
के खुद को नज़र से बचा कर चले

चले जायेंगे जहाँ से तो इक दिन
दिलों में इक घर बसा कर चले

मिटा दे हमारी वो यादें तेरे दिल से
खुदा से बस इतनी दुआ कर चले

सजाना न तुम मेरी तस्वीर कोई
हम अक्स अपने सारे जला कर चले

भला सा इक वक्त संग तेरे गुज़ारा
इन बातों से दिल बहला कर चले

ऐसे थे वैसे थे जैसे भी थे 'अदा'
मानोगे हम दुनिया हिला कर चले

Wednesday, September 9, 2009

मरने के हौसले भी मेरे यार कम गए हैं


क्यूँ अश्क बहते-बहते यूँ आज थम गए हैं
इतने ग़म मिले कि, हम ग़म में रम गए हैं

तुम बोल दो हमें वो जो बोलना तुम्हें है
फूलों से मार डालो हम पत्थर से जम गए हैं

रंगीनियाँ लिए हैं ग़मगीन कितने चेहरे
अफ़सोस के रंगों में वो सारे रंग गए हैं

तकतीं रहेंगी तुमको ये बे-हया सी आँखें
जीवन भी रुक रहा है कुछ लम्हें थम गए हैं

हम थे ऐसे-वैसे तुम सोचोगे कभी तो
जब सोचने लगे तो हम खुद ही नम गए हैं

जीने का हौसला तो पहले भी 'अदा' नहीं था
मरने के हौसले भी मेरे यार कम गए हैं

यहाँ ...वहाँ...क्या कहें.....




यहाँ ...वहाँ...

तब, भारत में !
वो तपती दुपहरी , बगीचे में जाना,
टहनी हिला कर, आम गिराना
दादी को फुसलाकर,अमावट बनवाना
चटाई पर हिस्से की, हद्द लगाना
बिजली गुल होते ही, कोलाहल मच जाना
तब लालटेन जला कर, अँधेरा भगाना
सुराही से पानी ले, गटागट पी जाना
गमछे से बदन का ,पसीना सुखाना
आँगन में अंगीठी पर, मूंगफली सिकवाना
सोंधे नमक की, चटकार लगाना
बिजली के आने से, खुशियाँ मानना
दौड़ कर झट से, फिर टी.वी.चलाना
सावन के मौसम में, फुहारों में दौड़ना
मटमैले पानी में, छपा-छप कूदना
गली के नुक्कड़ पर, मजमा लगाना
बिना बात के यूँ ही, गुस्सा दीखाना
किसी से कहीं भी, बस उलझ ही जाना
बेवक्त किसी की, घंटी बजाना
बिना इजाज़त, अन्दर घुस जाना
अपना जो घर था, वो अपना ही था
अपनों से अपनों का जुड़ते ही जाना

अब, कनाडा में !
ये सर्दी के मौसम में,घर में दुबकना
हर दिन मौसम की, जानकारी रखना
न बिजली के जाने की चिंता में रहना
न बिजली के आने की खुशियाँ मानना
न पसीने का आना, न पसीना सुखाना
न सुराही के पानी, का आनंद उठाना
न ख़ुशी से चिल्लाना, न शोर मचाना
गुस्सा जो आये तो, बस गुस्सा दबाना
न कुत्तों का लड़ना, न बैलों से भिड़ना
न मजमा लगाने की, हिम्मत जुटाना
न किसी का आना, न किसी का जाना
न बगैर इजाज़त, घंटी बजाना
तरतीब के देश में,तरतीब से हैं हम
मुश्किल है कुछ भी, बेतरतीब पाना
बहुत ही आसां है, मकाँ बनाना
बस कठिन है यहाँ ,एक 'घर' बसा पाना


क्या कहें.....

वफ़ा चली गई
तो जफ़ा चिपक गई

जीने की ललक बढ़ी
मौत झलक गई

सोच की स्याही
से कलम सरक गई

ज़ेब तार-तार हुई
नियत भटक गई

ज़मीर तो जगा रहा
बस आँख लपक गई

साकी की नज़र बचा
होश अटक गई

मजमों का शोर बढा
महफ़िल छिटक गयी