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Wednesday, November 25, 2009

सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है....

वैसे तो हम अपने काम से काम रखती हूँ, या तो कविता लिखती हूँ या फिर गीत गाती हूँ, और इन दोनों कामों में बहादुरी ही ज़रुरत नहीं होती, लेकिन पिछले दो दिनों से एक काम और कर दिया हूँ 'बहादुरी', एक-दो आलेख पढ़े जिनमें 'आँचल पायल' का बात किये थे लोग, हमहूँ सोचे अरे इ तो fantastik बात है, दुनो चीज़ हमको भी बहुते पसंद है, बस कूद गए 'पायल की झंकार रस्ते-रस्ते' गाते हुए, अब कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि सबको हमरा गीत पसंदे आ जाए बस, नहीं आया पसंद, और हमरी लुटिया डूब गयी 'नारी' ब्लाग पर, इ बात में कौनो पिरोब्लेम नहीं है, उ अपने घर खुस हम अपने घर, लेकिन सोचे कि जाते-जाते गुड बाय भी कह दें, और हमरे बुद्धि से जो बात जेतना समझे कह दें, ताकि कोई तरह का मन में मैल न रहे, अब हुआ का कि हम ठहरे महिला, जब बोलने लगे तो इतना बोल दिए, कि सोचे अब पोस्ट से जाबर टिप्पणी का ठीक लागी....???? ता काहे नहीं पोस्टवे बना देवल जाय, एक बात और इ चक्कर में हम गाना भी तो नहीं रिकॉर्ड किये ना...
तो इ हम धर रहे हैं हमरा पक्ष....

रचना जी, हमारे सुर अलग हैं, आप जो कह रही हैं मैं नहीं समझ रही हूँ, मैं जो कह रही हूँ आप नहीं समझ रही हैं...
अच्छा किया आपने 'नारी' से मेरी 'सदयस्ता' निरस्त कर दी ..क्यूंकि जब हमारे विचार एक नहीं हैं तो बात एक जैसी कैसे हो सकती है.....
लेकिन शिष्टाचार का तकाजा है कि जिस तरह प्रेम से आपने मुझे नारी के साथ जुड़ने के लिए आमंत्रित किया था उसी तरह मेरी सदस्यता समाप्त करने की बात भी ईमेल से बता देती तो थोडा professional लगता...
लेकिन कोई बात नही ..मैं इसे अन्यथा नहीं ले रही हूँ....
आपकी टिप्पणी को कई बार पढ़ा है और सच पूछिए तो बात मुझे समझ नहीं आ रही है.....
आपने कहा कि नारी को शरीर की परिभाषा में न बांधा जाए, शरीर को भूलना होगा, नर-नारी में जो भेद है उसका मुख्य धरातल ही शरीर है, उसे कैसे भूल सकती हैं...???
हाँ ये कह सकती हैं, कि शरीर के अलावा हम सभी बातों में पुरुषों से सामान हैं, बल्कि कुछ बातों में हम पुरुषों से बेहतर हैं...जैसे सहनशक्ति, धीरज, intution इत्यादि...
नारी अधिकार की बात मैं भी करती हूँ और आप भी फर्क सिर्फ इतना है, मैं अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य की भी बात करती हूँ, इसका कारण शायद यह हो सकता है कि मैं अधिकार से पहले कर्तव्य को स्थान देती हूँ, आपने कपड़े के चयन जैसी बात को लेकर एक मुद्दा बनाया, जो मुझे बहुत ही बचकाना महसूस हुआ, साड़ी पहनना, ऐसा बताया गया है नारी ब्लॉग पर जैसे कोई सजा है, साड़ी तो वैसे भी अब लुप्तप्राय है........
महिलाओं के उत्थान की बात करना और इसके लिए सतत प्रयत्न करना बहुत अच्छी बात है....इसमें हर तबके की महिलाओं के परेशानियों का समन्वय होना चाहिए.....
कपड़ों का चयन : उच्च वर्ग की महिला के लिए एक तरह की समस्या होगी.....माध्यम वर्ग की महिला के लिए दूसरी किस्म की समस्या होगी और इक गरीब महिला जिसे दो जून कि रोटी नसीब नहीं होती उसके लिए क्या साडी और क्या पैंट....??

कुछ मुद्दे हो सकते हैं...:

वैचारिक स्वतंत्रता का....
आत्मनिर्भरता का....
शिक्षा का.....
नारी प्रताड़ना उन्मूलन का...
स्वयं- सुरक्षा का
दहेज़ विरोधी का
कुपोषण का
समान वेतन का
सामान रोजगार का
promotion में समानता का
नौकरी में maternity leave में बढ़ोत्तरी हो
maternity लीव के लिए बच्चों की संख्या न देखी जाए, हर बच्चे के जन्म में छुट्टी मिले...
इतने सारे मुद्दे हैं कि लिस्ट हमेशा छोटी हो जायेगी, न कि कपड़ों के चुनाव में अपना समय नष्ट करें, कितनी अजीब बात है, इतने सशक्त माध्यम का उपयोग ऐसी छोटी चीज़ के लिए किया जा रहा है, क्या हुआ अगर साडी पहन कर रसोई में, गर्मी में ९ लोगों के लिए खाना बना लिया तो, अगर वही महिला अच्छी शिक्षा ले ले तो खाना बनाने की ज़रुरत ही नहीं होगी, खाना बनाने वाली रख सकती है.......
अपनी काबिलियत का लोहा मनवा ले, तो किसकी मजाल कि कोई उसे रोके, कि वो क्या पहनेगी, कपड़े भी उसके होंगे और चुनाव भी, वैसे भी महानगरों में तो, एकल परिवार की इतनी परंपरा है, कि सभी औरतें अपने ही हिसाब से कपड़े पहनती हैं, हाँ जब कभी सास-ससुर मिलने आते हैं तब दो-चार दिनों के लिए हाफ पैंट से साड़ी या सूट पहनती हैं....
यह भी कहा आपने, कि कोई नर्स अपना स्कर्ट पहन कर या डॉक्टर अपना कोट पहन कर वही अनुभव करती है जो मैं अपना आँचल सर पर रख कर महसूस करती हूँ, तो यही कहूँगी आप मेरी बात नहीं समझ पायी....
मैं सिनिअर सॉफ्टवेर इंजिनियर/प्रोजेक्ट मेनेजर हूँ, माना कि मेरा uniform नहीं है, लेकिन मैं मीटिंग्स में अंग्रेजी सूट पहन कर जाती हूँ (क्यूंकि मीटिंग्स में clients के सामने हमें यहाँ के हिसाब से ही रहना होता है) उस वक्त कि भावना और मंदिर में साड़ी पहनने की भावना में कोई तुलना नहीं है, मैं तो उस भावना की बात कर रही थी, जब वही नर्स या डाक्टर मंदिर जाती है, इसलिए आपका इस तरह तुलना करना कोई मायने नहीं रखता है.....
आपको एक बात और बतानी है...कि यहाँ ऑफिस में ड्रेस कोड हैं, लेकिन मैंने अपनी साड़ी के लिए challenge कर दिया और मेरी साड़ी इन्हें स्वीकार करनी पड़ी, इसलिए गर्मी में साड़ी पहन कर ही, ऑफिस जाना होता है, गर्मी का अर्थ है ...जुलाई...में..

वैसे भी रचना जी समय बदल गया है, अब हमें और आपको कोई क्या रोकेगा, हम आप तो अपनी मर्जी से अपना जीवन जीते हैं, और जहाँ तक नयी पीढ़ी का सवाल है, वो ज्यादा उन्मुक्त है.......
आपकी टिप्पणी में बलात्कार, जैसे हादसे का भी जिक्र है...यह सच है, ऐसे हादसों के ज़ख्म पूरी उम्र रह जाते हैं, और इस नरक को दुनिया में, सिर्फ और सिर्फ बलात्कार की शिकार नारी ही झेलती है, मैं आपकी बात की इस पीड़ा से पूर्णतः सहमत हूँ, लेकिन फिर भी यही कहूँगी, कपड़ों के चुनाव का अधिकार मिलना इस समस्या का समाधान नहीं है, न ही बराबरी का अधिकार मिल जाने में है, इसका समाधान इसमें भी तुरंत नही है कि हम पुरुषों को बदल जाने की अपील करें, पुरुष वर्ग बदल जाए, इससे अच्छा और क्या हो सकता है, लेकिन वो बदलते हैं या नहीं ये उन पर निर्भर है, बदलेंगे भी तो कब बदलेंगे, और कितना बदलेंगे नहीं मालूम इसलिए बेहतर है, महिलाएं ही इसका समाधान ढूँढें, ऐसी घटनाओं के प्रति बचपन से, लड़कियों को सचेत रहना बताना होगा...माएँ ये काम घर पर अपनी बेटियों से, बात-चीत कर के कर सकती हैं, अपने बचाव के कुछ गुर सीख लें, जहाँ तक हो सके उत्तेजित करने वाले, वस्त्र न पहनें, कहीं भी आना जाना करें तो जांच-पड़ताल कर लें इत्यादि, बहुत सारी बातों का ख्याल रख कर इस रिस्क को कम किया जा सकता है, इस तरह की जानकारी आप अपने ब्लॉग पर भी दे सकती है, इस पर एक अच्छी चर्चा की जा सकती है, और पुरुषों से भी स्त्री-सुरक्षा पर विचार लिए जा सकते हैं....और सबसे बड़ी बात, ईश्वर न करे किसी के साथ भी ऐसा हो, लेकिन अगर ऐसा हो भी जाता है...तो स्वयं के अन्दर हीन भावना हरगिज भी आने ना दें, हमेशा यह ख्याल रखें कि किसी भी दुर्घटना की तरह यह भी एक दुर्घटना है, जिस तरह,  हाथ या पांव टूट जाये तो, कुछ दिनों के बाद उसे ठीक हो ही जाना होता है, इसे भी एक घाव की तरह ठीक हो ही जाना चाहिए, और इसके लिए घरवालों से भी सहयोग की अपेक्षा है, आपका ब्लॉग भी ऐसी बलात्कार पीड़ित महिलाओं को, आत्मबल स्थापित करवाने जैसी कोई सेवा प्रदान कर सकता है.....
रचना जी, आपका सशक्त ब्लॉग इन सब मुद्दों पर बहुत कुछ कर सकता है, ज़रुरत है बस ज़रा सा दृष्टिकोण बदलने की, आपको बहुत सी गुणी, तेजस्विनी महिलाओं का साथ है, बस अब कुछ कर ही डालिए, जिससे कहीं कुछ तो बदल जाए, मेरी शुभकामना आपके साथ है....
सस्नेह...'अदा'