दुल्हन बन तेरे घर आना
संग-संग चलते ही जाना
क़तरा क़तरा जुड़ते जाना
चप्पे चप्पे पे छा जाना
कभी खुशबू आबशार बने तो
कभी हो कोई तेल पुराना
कभी आग का गोला हो तुम
कभी हो शबनम मोती दाना
कभी बातों से देह जलाना
नज़रों में ही कभी छुपाना
धूप-छाओं, के साए में
बस यह जीवन जीते जाना
अंत समय तेरे हाथों से
मुख में गंगाजल पा जाना
फिर दुनियाँ में दोबारा आना
फिर तुझसे जुड़ते ही जाना
फिर संग चलते ही जाना
कभी खुशबू आबशार का आना
तो कभी वही तेल पुराना
फिर वही वो आग का गोला
और कभी वही मोती दाना
फिर कभी मेरी देह जलाना
और कभी आँखों में बसाना
फिर जीवन का अंत आजाना
तेरे हाँथों एक बार फिर
मुख में गंगाजल पा जाना
बस ऐसे ही रोते गाते
तुझ संग सातों जनम निभाना