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Thursday, July 12, 2012

समलैंगिगता, बायोलोजिकल और साइकोलोजिकल इम्बैलेंस का नतीजा होता है..

 हर मनुष्य में स्त्रियोचित गुण और पुरुष के गुण होते हैं। पुरुषों में पुरुषत्व ज्यादा होता है और स्त्रियों में स्त्रीत्व की अधिकता होती है। लेकिन कुछ पुरुष जो शारीरिक रूप से तो पुरुष होते  हैं लेकिन उनमें स्त्रीगत गुण ज्यादा हो जाते और ठीक इसके उल्टा कुछ स्त्रियों में पुरुषत्व के गुण ज्यादा देखने को मिलता है। इस तरह के होर्मोनल इम्बैलेंस की वजह से किन्नर, गेय और लेसबियंस जैसे लोग हमें देखने को मिल जाते हैं। सच पूछा जाए तो समलैंगिगता, बायोलोजिकल और साइकोलोजिकल इम्बैलेंस का नतीजा होता है। इसमें ऐसे व्यक्तियों का कोई दोष भी नहीं होता, क्योंकि हारमोंस पर हमारा कोई इख्तियार नहीं। लेकिन समाज समलैंगिक लोगों को हिकारत की नज़र से देखने का आदि है । अपवादों (जिन्हें हम अपवाद कहते हैं) से दुनिया भरी पड़ी है, और ये भी अपवाद हैं, हमारी नज़र में ।

एक समय था, जब ऐसी कमियों वाले (जो हमारी नज़र में कमी है), खुद को बहुत अकेला पाते थे, एक त्रासदी से गुजरते थे, समाज की उलाह्नाओं के बीच खुद को दबा कर जी लेते थे। अब समय बदल रहा है और इनलोगों ने भी जीवन जीने की ठान ली है। सोचने वाली बात यह है, अगर यह उनकी मजबूरी नहीं होती तो भला ये क्यों नहीं एक नोर्मल ज़िन्दगी जीते ???

भारत और भारतीयों के लिए यह विषय बेशक चौंकाने वाला होगा, लेकिन यहाँ इन देशों में समलैंगिक रिश्ते पूर्ण रूप से हैं स्वीकार्य  हैं, मेरी बेटी की दोस्त ऐसी ही माओं की बेटी है, और उसे कहीं कोई समस्या नहीं हुई है न ही होगी..बहुत आराम से ऐसे जोड़े रहते हैं, और उनके बच्चे भी बिना किसी कुंठा के जीते हैं..जब ऐसे सम्बन्ध बन ही रहे हैं तो हमें उन्हें स्वीकारने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए..

ये सही है कि, हमें ऐसी बातों की आदत नहीं है, लेकिन अगर हम उनकी दशा को समझने की कोशिश करें और उनकी भावनाओं को यथोचित सम्मान देते हुए उन्हें स्वीकार करें तो कहीं कोई मुश्किल नहीं है।
इस तरह की समस्या अगर घर में आ जाए, अर्थात आपका बच्चा अगर ऐसा निकल आये तो, माता-पिता झेल नहीं पाते हैं। मुश्किल भी है झेलना, लेकिन बच्चे को उलाहना देना, उसके साथ ज़बरदस्ती करना, अमानवीय होगा। इसे बिलकुल वैसे ही देखना चाहिये जैसे कोई नेत्रहीन हो, कोई गूंगा हो तो आप उसका साथ देते हैं, ऐसे बच्चों को हम ब्रेल सिखाते हैं, साईन लान्गुयेज सिखाते हैं ताकि वह अपना जीवन जहाँ तक हो सके नोर्मल जी सके, जो परिभाषा हमने नोर्मलसी की दी हुई है, फिर समलैंगिकता के साथ यह दुर्व्योहार क्यूँ ?

पहले मुझे भी अटपटा लगता था, लेकिन बात-चीत करने के बाद जो बातें सामने आयीं, उन्हें सुन कर लगा कि यही उनके लिए नोर्मल है। देखते रहने पर स्वीकार्य हो ही जाता है...अब मुझे बिल्कुल भी ऐसा रिश्ता अजीब नहीं लगता ।

दुनिया बदल रही है, और फिर ऐसे सम्बन्ध हमारे समाज में अनादिकाल से रहे हैं, बात सिर्फ इतनी है कि हमने उन्हें कभी स्वीकार नहीं किया, या यों कहें कि हम उसे स्वीकारना नहीं चाहते हैं..,एक बार अगर स्वीकार लिया तो कुछ भी बुरा नहीं लगता है...