काव्य मंजूषा
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मेरे घर की उखड़ी साँस
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Saturday, January 2, 2010
मेरे घर की उखड़ी साँस
उजड़ा छप्पर टूटी बाँस
मेरे घर की उखड़ी साँस
यादें सूख के पपड़ी भयीं
कहीं फँसी है दर्द की फाँस
लोग कहाँ हैं, बस्ती सूनी
घर में उग आई है काँस
अंत समय क्या चाहे 'अदा'
दू गज कपड़ा आठ गो बाँस
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