Showing posts with label मूरत. Show all posts
Showing posts with label मूरत. Show all posts

Sunday, July 15, 2012

जीते जी मर जाएगा ....

(यह कविता उनके लिए जो, नारी को वस्तु समझते हैं )

मुझे !
बस पत्थर की इक,
ख़ूबसूरत मूरत न समझ
तू नासमझ,
मैं ह्या हूँ, शर्म हूँ,
और हूँ  ग़ैरत, नासमझ,
तालिबे इल्म भी है, पास मेरे,
मैं नहीं जाहिल कोई
बेख़ौफ़ बढती जाऊँगी,
कई मंजिलें हैं मेरी,
तेरे बेशर्म इरादों से 
हर मुमकिन टकराना है,
मेरी आबरू के पर्दों को
वहशियों से बचाना है,
खबरदार करती हूँ,
तू अब होश में आ जा,
मुझे बेपर्दा करने की
हिमाक़त अब न कर ,
ओ ज़ालिम ।
मशालें इल्म की रौशन करूँ 
जहाँ में नूर फैलाउँगी ।
वो तेरे तल्ख़ मंसूबे 
मुझे तकलीफ़ देने के
जो तुमने गढ़ लिए ,
तुम्हें बतला दूँ ,
कलम की सुर्ख़ियों से  
वो मैंने सारे के सारे
ख़ारिज कर दिए,
मेरे इरादों की लपटों में 
झुलसने को अब, तैयार हो ,
नसीहतों और कायदों को 
अब नामंजूर ही तू पायेगा,
मैं कुदरत का करिश्मा हूँ
बस इतना जान लो तुम ज़ाहिलो,
जादूगरनी हूँ, मैं जादू करती हूँ 
तेरे घर को जन्नत बना
तेरे बच्चे मैं जनती हूँ ,
आफ़ताब हूँ मैं, तेरी ज़ीस्त का
और तू फ़क़त इक दीया ही है ,
मुझसे क्या मिलाएगा आँख  ?
तुझमें दम कहाँ, जो तू मेरी,
इक चोट सह पायेगा ?
गर मैं न हूँ, तो तू बेमुरौवत
जीते जी मर जाएगा...