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Friday, August 7, 2009

मुहावरे ही मुहावरे

श्री गणेश हुआ
आँखें मिली
आँखें चार हुई
रातों की नींद हराम हुई
दिल आसमान में उड़ने लगा
दिल लगा लिया
दिल बल्लियों उछल गया
दिल चोरी हो गया
होश गुम हुए
दिल का कँवल खिल गया
प्रेम की पींगें बढ़ी
प्यार परवान चढा
दिल पर हाथ रख कर
कसमें खाने लगे
चाँद सितारे तोड़ कर लाने लगे
चौदहवी का चाँद हुए
कभी ईद का चाँद,
कभी पूनम का चाँद नज़र आये
सपनों के महल बनने लगे
फिर एक दिन
शहनाई बजी
हाथ पीले हुए,
डोली चढ़ गए
घोडी चढ़ गए
घर बसाया
घी के दीये जलाये
दो बदन एक जान हुए
दिन में होली रात दिवाली हुई
दिन हवा हुए,
प्रेम के सागर में डूबे उतराए
दसों उंगली घी में हो गए
दरवाज़े पर हाथी झूमने लगे
फिर धीरे-धीरे
दिल बैठने लगा
नानी याद आने लगी
नमक तेल का भावः समझ में आया
नून-तेल लकड़ी जुटाने में जुट गए
रात-दिन एक कर दिया
दीमाग लड़ाने लगे
कभी दाल नहीं गली
दिन को दिन रात को रात नहीं समझा
समय की चक्की में पिस गए
पाँव भारी हुए
आँख के तारे आये
कई टुकडों में बँट गए
पाँव में पत्थर बंध गए
काठ की हांडी बार-बार चढाने लगे
बच्चे सर खाने लगे
आँखें पथराने लगी
दिन में तारे नज़र आने लगे
दांतों चने चबाने लगे
दाँत से कौडी दबाने लगे
कभी दाँत निपोरा
तो कभी दाँत दिखाने लगे
कुछ ऐसे मिले
जिनके मुंह में राम बगल में छूरी थी
मुफलिसी में आटा भी गीला हुआ
मुसीबत अकेली नहीं आई
दर-दर की ठोकर खाने लगे
दिल खट्टा होने लगा
दाई से पेट छुपाने लगे
दाँव पे दाँव चलाने लगे
दलदल में फँस गए
दरिया तक जाते हैं और प्यासे लौट आते हैं
दिल का गुब्बार निकालने लगे
दामन बचाने लगे
तीन-पांच बहुत किया
जाने कब दिन फिरेंगे
अब तो लगता है
दिल कड़ा करना पड़ेगा
पीछा छुड़ाना पड़ेगा
कहीं खो जायेंगे
काफूर हो जायेंगे
लगता है
नौ-दो ग्यारह हो जाएँ