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Sunday, September 20, 2009

भरोसा हमारा उतर ही गया


क़र्ज़ और वजूद इकतार हो गए हैं
नींव हिल गयी घर बिखर ही गया

सारी उम्र दोनों अब सो न सकेंगे
बेटी का भाग अब सँवर ही गया

कई दिन से रोटी मिली ही नहीं थी
सपने में देख रोटी डर ही गया

हुआ क्या बहू जो जल कर मरी है
अख़बार का रंग निखर ही गया

काली सी गाड़ी का पहिया चढ़ा था
लाल रंग आपको अखर ही गया

आपका क्या आप चढ़ जाएँ कुर्सी
भरोसा हमारा उतर ही गया