
क़र्ज़ और वजूद इकतार हो गए हैं
नींव हिल गयी घर बिखर ही गया
सारी उम्र दोनों अब सो न सकेंगे
बेटी का भाग अब सँवर ही गया
कई दिन से रोटी मिली ही नहीं थी
सपने में देख रोटी डर ही गया
हुआ क्या बहू जो जल कर मरी है
अख़बार का रंग निखर ही गया
काली सी गाड़ी का पहिया चढ़ा था
लाल रंग आपको अखर ही गया
आपका क्या आप चढ़ जाएँ कुर्सी
भरोसा हमारा उतर ही गया