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Wednesday, July 4, 2012

लेकिन ये पत्थर हमेशा ही ग़लत होते हैं...!

मुझे लोग पसंद करते हैं,
और मैं भी उन्हें पसंद करती हूँ,
लेकिन तभी तक,
जब तक हम एक दूसरे को,
ठीक से जान नहीं जाते ।
इस जानने और जान जाने के बीच ,
खिले रहते हैं फूल, नम्रता के,
लेकिन कुछ दुविधाएं दो से चार
होने लगतीं हैं ।
इकट्ठी हुई दुविधाओं की गाँठें,
जब खुल जातीं हैं,
सिले हुए होंठों की तुरपाई भी उधड़ जाती है ।
और कसूरों की बन्दर-बाँट,
शुरू हो जाती है,
आधा तेरा है, आधा मेरा है।
मुझे भी अब होंठों को सिल के बैठना,
मंजूर नहीं,
कब तक उन पत्थरों से हम,
साठ-गाँठ बनायेंगे ?
कितने हाथों से हम अपना चेहरा छुपायेंगे ?
लाख कोशिश करो
ये पत्थर कानों से अन्दर तक,
उतर ही जाते हैं, 
बवाल करते हैं और बिखर जाते हैं,
फिर दे जाते ला-ईलाज चोट कई जगह,
हम सही हो सकते हैं,
तुम भी सही हो सकते हो,
दूसरे भी सही हो सकते हैं,
लेकिन ये पत्थर हमेशा ही ग़लत होते हैं...!





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