हर दिन,
तुम्हारे ख़्वाब
हमारी पलकों पर
दस्तक दे रहे हैं
झिरी में से
अन्दर देख रहे हैं
आज फिर बाहर
वो कतार सजाएं है
न जाने कितनी बार
कुंडा खटखटाएं हैं
पलकें खुलने को
आतुर हो जाती हैं
फिर डर कर
वहीं बैठ जाती हैं
बंद आँखें जागने लगीं हैं
तुम्हारे ख्वाबों से
दूर भागने लगी हैं
अब तो
सारी उम्र हम नहीं सो पायेंगे
तुम ही बताओ
कि अब मेरे ख्वाब कहाँ जायेंगे ??