आज फिर उसने मुझको रुलाया है
रूठे हुए थे हम वो मनाने आया है
ज़ख्मों पे पपड़ी सी कुछ जमी हुई थी
नाखून से कुरेद कर उसने हटाया है
रूठे हुए थे हम वो मनाने आया है
ज़ख्मों पे पपड़ी सी कुछ जमी हुई थी
नाखून से कुरेद कर उसने हटाया है
दिल के क़तरनों के पैबंद बना कर
हमने भी कई ज़ख्म सबसे छुपाया है
मरहम धरने की नई साज़िश रचा
एक और घाव उसने फिर लगाया है
महबूब भी है खौफ़-ए-रक़ीब भी है
मेरे ही ज़ख्मों से मुझको सजाया है
हमने भी कई ज़ख्म सबसे छुपाया है
मरहम धरने की नई साज़िश रचा
एक और घाव उसने फिर लगाया है
महबूब भी है खौफ़-ए-रक़ीब भी है
मेरे ही ज़ख्मों से मुझको सजाया है
