ठोकर खाकर मैं गिरती जब तक,
थामने को उठे कई हाथ,
निकल रहा था मेरा दम,
कि हवाओं ने दिया झूम के साथ
कितना घना अँधेरा था,
जब वजूद बना एक बिसरी बात
तब तारे झुक झुक आये मुझे तक
स्याह रात बनी उजली रात
तन्हाई के आगोश में अब तो
महफूज़ हैं मेरे हर जज़्बात
तेरा क्यूँ मैं सोग मनाऊँ,
जब उम्मीद खड़ी है थामे हाथ...
थामने को उठे कई हाथ,
निकल रहा था मेरा दम,
कि हवाओं ने दिया झूम के साथ
कितना घना अँधेरा था,
जब वजूद बना एक बिसरी बात
तब तारे झुक झुक आये मुझे तक
स्याह रात बनी उजली रात
तन्हाई के आगोश में अब तो
महफूज़ हैं मेरे हर जज़्बात
तेरा क्यूँ मैं सोग मनाऊँ,
जब उम्मीद खड़ी है थामे हाथ...

