जल ही जीवन है और इसका संरक्षण हमारा प्रण होना चाहिए !!
Wednesday, July 16, 2014
Tuesday, July 15, 2014
Wednesday, July 9, 2014
दुनियादारी.....!
वाह री ये दुनियादारी !
कितनी सारी है जिम्मेवारी
एक साँस लेना है मुश्किल
दूजा उससे भी भारी
फूल के दर्शन दुर्लभ हो गए
बस झेल रहे हैं गोला-बारी
हम बैठे हैं डाल के ऊपर
दोस्त चलाते धड़ पर आरी
साज़िश रचते मेरे क़त्ल का
मुँह पर कहते लम्बी उम्र है तुम्हारी !!
कितनी सारी है जिम्मेवारी
एक साँस लेना है मुश्किल
दूजा उससे भी भारी
फूल के दर्शन दुर्लभ हो गए
बस झेल रहे हैं गोला-बारी
हम बैठे हैं डाल के ऊपर
दोस्त चलाते धड़ पर आरी
साज़िश रचते मेरे क़त्ल का
मुँह पर कहते लम्बी उम्र है तुम्हारी !!
Monday, June 23, 2014
प्रीती ज़िन्टा .....
प्रीती ज़िन्टा को मेरा सलाम पहुँचे।
कई जगहों पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ देख कर बहुत हैरानी हुई, यहाँ तक कि महिलाओं की प्रतिक्रियाएँ भी सोच में डालने वाली थीं ।
प्रीती के अंतरंग सम्बन्ध मोहम्मद अली जिन्ना की बेटी के पोते से साथ थे, लेकिन अब नहीं हैं । अंतरंग सम्बन्ध या वैवाहिक सम्बन्ध का अर्थ यह नहीं होता कि अपनी पत्नी या प्रेमिका का अपमान करने का लाईसेंस पति या प्रेमी को मिल गया हो। पुरुष, नारी को अपनी मिल्कियत समझना बंद करे.
पति हो या पत्नी, प्रेमी हो या प्रेमिका किसी को भी अपने साथी का अपमान अकेले में भी करने का अधिकार नहीं है तो सार्वजनिक स्थानों की तो बात ही नहीं आती।
प्रीती का केस बिलकुल साफ़ है, वो कभी इस नेस वाडिया की प्रेमिका थी, अब ये नेस सिर्फ़ प्रीती का बिजिनेस पार्टनर है और उसे इसी दायरे में रहना चाहिए।
कई जगहों पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ देख कर बहुत हैरानी हुई, यहाँ तक कि महिलाओं की प्रतिक्रियाएँ भी सोच में डालने वाली थीं ।
प्रीती के अंतरंग सम्बन्ध मोहम्मद अली जिन्ना की बेटी के पोते से साथ थे, लेकिन अब नहीं हैं । अंतरंग सम्बन्ध या वैवाहिक सम्बन्ध का अर्थ यह नहीं होता कि अपनी पत्नी या प्रेमिका का अपमान करने का लाईसेंस पति या प्रेमी को मिल गया हो। पुरुष, नारी को अपनी मिल्कियत समझना बंद करे.
पति हो या पत्नी, प्रेमी हो या प्रेमिका किसी को भी अपने साथी का अपमान अकेले में भी करने का अधिकार नहीं है तो सार्वजनिक स्थानों की तो बात ही नहीं आती।
प्रीती का केस बिलकुल साफ़ है, वो कभी इस नेस वाडिया की प्रेमिका थी, अब ये नेस सिर्फ़ प्रीती का बिजिनेस पार्टनर है और उसे इसी दायरे में रहना चाहिए।
Tuesday, May 27, 2014
जानकी ....!
कहा जाता है, 'मौन' कई प्रश्न भी खड़े करता है और कई बार कई प्रश्नों के उत्तर भी देता है । कुछ प्रश्नों के उत्तर वाणी से नहीं कर्म से दिए जाते हैं । एक चुप्पी हज़ारों सवालों पर भारी पड़ जाती है । ऐसी ही एक चुप्पी है, सीता की चुप्पी । सीता का चुपचाप पृथ्वी में प्रवेश, सीता के द्वारा पूछा गया विकट प्रश्न भी है और कई प्रश्नों का उत्तर भी ।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अन्त में, अश्वमेध यज्ञ के समापन के उपरान्त, अयोध्या के जन समूह की ओर से एक आवाज उठी : राम, सीता को फिर से स्वीकार कर अपना घर बसाएं।
राम ने सीता का परित्याग तो कर दिया था लेकिन वो जानते थे और पूरे अन्त:करण से मानते भी थे कि सीता निष्कलंक और निष्पाप है, परन्तु महज लोकभय से राम ने सीता का परित्याग किया था । राम ने साफ-साफ स्वीकार भी किया है कि
‘सेयं लोकभयात् ब्रह्मन् अपापेत्यभिजानता, परित्यक्ता मया सीता’ (उत्तरकाण्ड, सर्ग 97, श्लोक 4) ‘हे, ब्रह्मन्, मैं जानता हूं कि सीता निष्पाप है, परन्तु लोकभय से ही मैंने इसका परित्याग किया है।’
राम ने, वाल्मीकि से यह भी कहा था, कि अगर वाल्मीकि, जन समाज में, सीता को निष्पाप घोषित कर दें और लोग इस बात को मान लें, तो वो सीता को फिर से ग्रहण करने के लिए तैयार हैं । परन्तु तभी एक असाधारण घटना घटित हो गई । जब सीता ने यह सब सुना, तब उन्होंने एक अप्रत्याशित फैसला ले लिया । बिना पलक ऊपर उठाए और बिना पल भर की प्रतीक्षा किए, सीता ने, पृथ्वी को सम्बोधित करते हुए जो कहा, उसे आदिकवि वाल्मीकि ने इन श्लोकों में व्यक्त किया है :
हालांकि रावणवध और युद्ध समाप्ति के उपारान्त राम को, अयोध्या की प्रजा से वैसी कोई शिकायत सुनने को नहीं मिली थी, जैसी राज्याभिषेक के बाद मिली । परन्तु सम्भावित लोकापवाद से राम भयभीत थे, इसीलिए उन्होंने सीता से चारित्रिक शुद्धता का प्रमाण माँगा । लोक भय से, रूखे और निष्ठुर राम को सीता ने कई तरह से समझाया, उन्हें उलाहना भी दिया, परन्तु राम अपनी बात पर अड़े रहे, तब हार कर सीता ने, लक्ष्मण से चिता तैयार करने को कहा और यह कहते हुए अग्नि में प्रवेश कर गईं कि अगर मेरा चरित्र शुद्ध हो तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें-(कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यमहम् राघवं सर्वधर्मज्ञं तथा मां पातु पावक: युध्दकाण्ड, सर्ग 116, श्लोक 27) और अग्निदेव ने सीता की रक्षा कर ली ।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अन्त में, अश्वमेध यज्ञ के समापन के उपरान्त, अयोध्या के जन समूह की ओर से एक आवाज उठी : राम, सीता को फिर से स्वीकार कर अपना घर बसाएं।
राम ने सीता का परित्याग तो कर दिया था लेकिन वो जानते थे और पूरे अन्त:करण से मानते भी थे कि सीता निष्कलंक और निष्पाप है, परन्तु महज लोकभय से राम ने सीता का परित्याग किया था । राम ने साफ-साफ स्वीकार भी किया है कि
‘सेयं लोकभयात् ब्रह्मन् अपापेत्यभिजानता, परित्यक्ता मया सीता’ (उत्तरकाण्ड, सर्ग 97, श्लोक 4) ‘हे, ब्रह्मन्, मैं जानता हूं कि सीता निष्पाप है, परन्तु लोकभय से ही मैंने इसका परित्याग किया है।’
राम ने, वाल्मीकि से यह भी कहा था, कि अगर वाल्मीकि, जन समाज में, सीता को निष्पाप घोषित कर दें और लोग इस बात को मान लें, तो वो सीता को फिर से ग्रहण करने के लिए तैयार हैं । परन्तु तभी एक असाधारण घटना घटित हो गई । जब सीता ने यह सब सुना, तब उन्होंने एक अप्रत्याशित फैसला ले लिया । बिना पलक ऊपर उठाए और बिना पल भर की प्रतीक्षा किए, सीता ने, पृथ्वी को सम्बोधित करते हुए जो कहा, उसे आदिकवि वाल्मीकि ने इन श्लोकों में व्यक्त किया है :
सीता कहतीं हैं (यथाहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये। तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।) ‘अगर मेरे मन ने राम को छोड़ कर किसी के भी विषय में सोचा हो तो माधवी देवी (पृथ्वी) मुझे अपने में समा लें । (मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये। तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति।)अगर मैं मन, वचन और कर्म से सिर्फ राम की अर्चना करती हूं तो हे माधवी देवी मुझे अपने में समा लें । (यथैतत् सत्यमुक्तं मे वेह्नि रामात् परं न च। तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति॥) अगर यह सच है कि राम के अतिरिक्त मैं किसी को नहीं जानती तो हे माधवी देवी मुझे अपने में समा लें ।’ सीता के ऐसा कहने के पश्चात, पृथ्वी फट जाती है और सीता पृथ्वी में समा जाती हैं ।
अब कहने वाले कह सकते हैं, क्या कहीं, किसी के आग्रह मात्र से ऐसे ही पृथ्वी फट जाती है ? हो सकता है यह महर्षि वाल्मीकि की कोरी कल्पना हो । लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश का इतिहास अनेकोनेक ऐसी ही असाधारण घटनाओं से भरा पड़ा है, जिन्हें आम जीवन में असम्भव माना जाता है। जैसे गर्भ में ही शिशु को सबकुछ ज्ञात हो जाना । यह भी सम्भव है, स्वयं को निष्पाप साबित करने की कड़ी चुनौती, जो बार-बार सीता के सामने आ रही थी, उससे मुक्त होने का इससे बेहतर विकल्प शायद उन्हें दिखाई न दिया हो । शायद इस कठिन चुनौती ने ही उन्हें कोई विकट कार्य करने के लिए प्रेरित किया हो, जिसे पृथ्वी में समा जाने की उपमा, आदिकवि वाल्मीकि ने दे दी हो । बहुत सम्भव है कि सीता ने अपने ही प्रयासों से स्वयं को पृथ्वी में विलीन कर वैसे ही समाप्त कर दिया हो, जैसे बाद में राम ने स्वयं को जल को समर्पित कर महासमाधि ले ली थी ।
सीता ने अपनी निष्कलंकता साबित करने के प्रयास में स्वयं को ही नष्ट कर दिया । लेकिन फिर सोचने वाली बात यह है, उन्होंने आखिर ऐसा क्यों किया ? क्यों नहीं वो प्रजा की जयजयकार और पुष्पवृष्टि के बीच, फिर से अपने राम के साथ सुखमय जीवन बिताने को तैयार हुईं ? राम तो उन्हें निष्पाप मानते ही थे और सीता को भी इस बात का अखण्ड विश्वास था, कि राम को उनकी पवित्रता पर रंचमात्र भी संदेह नहीं है । यह बात वाल्मीकि रामायण में कई बार स्पष्ट भी की गई है । सिर्फ राजा की मर्यादा की रक्षा के लिए, लोकापवाद से बचने के लिए ही राम ने सीता का परित्याग किया । यह भी राम ने कई बार स्पष्ट कर दिया था। फिर जब वाल्मीकि के कथन पर जन समुदाय, सीता को निष्पाप मानने और क्षमायाचनापूर्वक स्वीकारने को तैयार था तो क्यों नहीं सीता ने लोकस्वीकृति को महत्व दिया और क्यों स्वयं को पृथ्वी के हवाले कर दिया?
सीता का पृथ्वी में प्रवेश, सीता के मौन द्वारा पूछा गया एक विकट प्रश्न भी है और प्रश्न का उत्तर भी । जब सीता का अपहरणकर्ता रावण, राम के हाथों मारा जाता है, तब सीता की प्रसन्नता की सीमा नहीं होती । रावण का अपने पति के हाथों मारे जाने के बाद, प्रसन्न सीता अपने पति से मिलने जातीं हैं, उनके अंग लज्जा के मारे अपने में ही सिमटते जा रहे हैं और वे विस्मय, अपार हर्ष और स्नेह के साथ पति के सौम्य मुख को निहारने लगीं परन्तु इस प्रतीक्षारत, सकुचाती, लज्जामयी और प्रेम से परिपूर्ण सीता को राम से सुनने को क्या मिला ? यह कि राम चाहते हैं कि सीता पहले अपने चरित्र की शुद्धता प्रमाणित करे ? (प्राप्तचारित्रसंदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता, दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकुलासि मे दृढा)...उस समय राम इतने कठोर हो गए थे कि सीता से यह भी कहने लगे, जानकी, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ. मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ । देवी, ये दसों दिशाएं तुम्हारे लिए खुली पड़ी हैं, तुमसे मेरा अब कोई सरोकार नहीं रह गया है, (तद् गच्छ त्वानुजानेsद्य यथेष्टं जनकात्मजे,एता दश दिशो भद्रे कार्यमस्ति न मे त्वया )। जिस कीर्ति के लिए मैंने तुम्हारा उद्धार किया था, वह मुझे प्राप्त हो गई. मुझे तुमसे कोई लगाव नहीं रहा तुम अब जहाँ जाना चाहो, जा सकती हो (यदर्थं निर्जिता मे त्वं यशः प्रत्याहृतं मया. नास्ति मे त्वय्यभिष्वङ्गो यथेष्टं गम्यतामितः युद्ध. 103.21) देवी, मैंने तुमसे यह बात सोच-विचारकर कही है. तुम चाहो तो भरत या लक्ष्मण के साथ रह सकती हो, तुम्हारा मन करे तो सुग्रीव या फिर विभीषण के साथ भी रह सकती हो, जहाँ तुम्हें सुख मिलने की आशा हो, वहीं मन से रम जाओ (इति प्रव्याहृतं भद्रे मयैतत् कृतबुद्धिना, लक्ष्मणे भरते वा त्वं कुरु बुद्धिं यथासुखम्, सुग्रीवे वानरेन्द्रे वा राक्षसेन्द्रे विभीषणे, निवेशय मनः सीते यथा वा सुखमात्मना... युद्ध. 115.22-23), जाहिर है कि राम ने ऐसी कटुता पूर्ण बातें, लोकापवाद के भय से ही कही, अन्यथा वे तब भी सीता को हृदयप्रिया ही मानते थे ।
हालांकि रावणवध और युद्ध समाप्ति के उपारान्त राम को, अयोध्या की प्रजा से वैसी कोई शिकायत सुनने को नहीं मिली थी, जैसी राज्याभिषेक के बाद मिली । परन्तु सम्भावित लोकापवाद से राम भयभीत थे, इसीलिए उन्होंने सीता से चारित्रिक शुद्धता का प्रमाण माँगा । लोक भय से, रूखे और निष्ठुर राम को सीता ने कई तरह से समझाया, उन्हें उलाहना भी दिया, परन्तु राम अपनी बात पर अड़े रहे, तब हार कर सीता ने, लक्ष्मण से चिता तैयार करने को कहा और यह कहते हुए अग्नि में प्रवेश कर गईं कि अगर मेरा चरित्र शुद्ध हो तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें-(कर्मणा मनसा वाचा यथा नातिचराम्यमहम् राघवं सर्वधर्मज्ञं तथा मां पातु पावक: युध्दकाण्ड, सर्ग 116, श्लोक 27) और अग्निदेव ने सीता की रक्षा कर ली ।
परन्तु प्रश्न यह है कि क्यों नहीं दूसरी बार भी सीता ने अग्नि, पृथ्वी इत्यादि से अपनी रक्षा की प्रार्थना की और शेष जीवन, श्री राम के साथ बिताने की इच्छा ठीक वैसे ही प्रकट की जैसे रावण वध और युद्ध समाप्ति के उपरांत, अग्निप्रवेश के समय की थी ? क्या इसलिए कि पहली बार उन पर संदेह उनके पति ने किया था, जिसका निवारण करना, तमाम परिस्थितियों को देखते हुए, सीता ने अपना कर्तव्य समझा ? और क्या दूसरी बार उन पर संदेह उनके पति ने नहीं, बल्कि जन समाज ने किया था, जिसके निवारण की उन्होंने कोई आवश्यकता नहीं समझी ? अपने पति के संदेह का निवारण करना सीता को अपना कर्तव्य लगा, पर समाज द्वारा उठाए गए इस निर्मूल संदेह का निवारण करना उन्हें कतई अपना कर्तव्य नजर नहीं आया और न ही आना चाहिए था । इस शंका का निवारण करना अब राम का कर्तव्य था ।
इसलिए अपने गहरे मौन के जरिए इस बार सीता ने राम को जता देना चाहा कि बेशक इस बार आक्षेप तुमने नहीं, समाज ने लगाया है, पर इस बार असली दोषी तुम हो । सीता मानो कहना चाहती हैं कि हे राम, बेशक मेरा निर्वासन कर, मुझसे दूर रहकर, अकेले में अपने हृदय को कष्ट देकर तुमने श्रेष्ठ नायक, एक पत्नीधर्म का पालन कर मर्यादापुरुषोत्तम राजा का पद पा लिया हो, पर मर्यादायुक्त पति के सिंहासन तक तुम नहीं पहुंच पाए ।
तो अब प्रश्न यह है कि राम को क्या करना चाहिए था ? राम के पास दो विकल्प थे । या तो वो सीता से खुद को अलग कर लेते या सीता के साथ रहने का निर्णय कर खुद को राजपाट से अलग कर लेते । पहला विकल्प आसान था, परन्तु दूसरा कठिन । और राम ने पहला और आसान विकल्प चुना । न सिर्फ सीता को निर्वासित किया, स्वयं को भी दण्डित कर दिया । लेकिन वो राजा थे, वो प्रजा से कह सकते थे, क्यों सिर्फ नारी ही परीक्षा का विषय होनी चाहिए ? क्यों नहीं आरोप लगाने वाली प्रजा की भी परीक्षा होनी चाहिए ? कहने का तात्पर्य यह है कि वो गर्भवती सीता को, जिनकी निष्कलंकता पर उन्हें रंच मात्र भी संदेह नहीं था, ऐसी सीता को, जो निश्छलता और स्नेह की प्रतिमा थीं, ऐसी सीता को बिना निर्वासित किए, बिना पलभर का कष्ट दिए हुए, वो प्रजा से कह सकते थे कि जो प्रजा ऐसी सीता को अपना नहीं सकती, वह सीता के पति, राम के लायक भी नहीं । परन्तु राम ने ऐसा नहीं किया।
तो अब प्रश्न यह है कि राम को क्या करना चाहिए था ? राम के पास दो विकल्प थे । या तो वो सीता से खुद को अलग कर लेते या सीता के साथ रहने का निर्णय कर खुद को राजपाट से अलग कर लेते । पहला विकल्प आसान था, परन्तु दूसरा कठिन । और राम ने पहला और आसान विकल्प चुना । न सिर्फ सीता को निर्वासित किया, स्वयं को भी दण्डित कर दिया । लेकिन वो राजा थे, वो प्रजा से कह सकते थे, क्यों सिर्फ नारी ही परीक्षा का विषय होनी चाहिए ? क्यों नहीं आरोप लगाने वाली प्रजा की भी परीक्षा होनी चाहिए ? कहने का तात्पर्य यह है कि वो गर्भवती सीता को, जिनकी निष्कलंकता पर उन्हें रंच मात्र भी संदेह नहीं था, ऐसी सीता को, जो निश्छलता और स्नेह की प्रतिमा थीं, ऐसी सीता को बिना निर्वासित किए, बिना पलभर का कष्ट दिए हुए, वो प्रजा से कह सकते थे कि जो प्रजा ऐसी सीता को अपना नहीं सकती, वह सीता के पति, राम के लायक भी नहीं । परन्तु राम ने ऐसा नहीं किया।
शायद इसीलिए दूसरी बार अपनी शुद्धता सिद्ध करने के लिए बुलाई गई सीता ने अपने पति की इस दुर्बलता का, अपनी पत्नी की रक्षा नहीं कर पाने की असफलता का, पति की तुलना में अपने राजा होने को अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति का, विरोध इस तरह से किया कि बिना पति से एक शब्द कहे, बिना उसकी ओर निहारे, यहां तक कि उन्हीं की भक्ति की शपथ उठा कर सीता, पृथ्वी में समा गईं । मानो राम से कह गईं कि हे राम, तुम्हें मैं प्रिय अवश्य हूं, मेरे बिना तुम व्याकुल भी हो, पर अपनी प्रजा के आगे तुम विवश हो । प्रजा के लिए तुम मेरा ही बार-बार अपमान करते हो, तो इस अपमान को बार-बार सहना मेरे लिए अब सम्भव नहीं । अनन्य प्रेम से भरे पति के साथ शेष जीवन बिताने का विकल्प सीता ने इसलिए नहीं चुना क्योंकि एक से अधिक बार साबित हो चुका था कि राम, प्रजा और सीता के बीच प्रजा के निराधार आरोप और अनर्गल बातों को ही हमेशा अधिक महत्व देंगे और सीता बार-बार एक प्रेम से भरे, परन्तु एक कमजोर पति की ख़ातिर और अग्निपरीक्षाएं देने के लिए तैयार नहीं थीं ।
कौन जाने सीता क्या कहना चाहती थीं ? बिना पल भर विलम्ब किए सीता का पृथ्वी में प्रवेश, कितने प्रश्न खड़े कर गया है । जिनमें से सबसे बड़ा सवाल यक़ीनन राम से है कि क्या पति होने के नाते राम का सीता के प्रति कोई कर्तव्य नहीं था ? वाल्मीकि ने लिखा है, सीता के सहसा पृथ्वी में प्रवेश कर जाने के उपारांत राम देर तक रोते रहे थे । थोड़ी देर बाद क्रोधित होकर वो पृथ्वी को ललकारने लगे कि सीता को वापस करो अन्यथा वो बाणों से उसे विर्दार्ण कर पर्वत-समुद्र सहित हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर देंगे ! लेकिन सीता मानो अपने पृथ्वी प्रवेश से उपजे सन्नाटे में राम से कह रही थी कि हे राम, ऐसा ही उद्वेग तुमने तब क्यों नहीं दिखाया, जब मुझ पर झूठे आरोप लग रहे थे ?
Thursday, March 13, 2014
हम लोग किस पार्टी पर यकीन करें ये कोई बता दे ????
झारखण्ड :
और अब लाख टके की बात हम आपसे पूछते हैं, इतना सबकुछ देखने और भुगतने के बाद हम लोग किस पार्टी पर यकीन करें ये कोई बता दे ????
| No | Name (constituency) | Term | Party | ||
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | Babulal Marandi Ramgarh | 15 November 2000 – 17 March 2003 (852 days) | Bharatiya Janata Party | ||
| 2 | Arjun Munda Kharsawan | 18 March 2003 – 2 March 2005 (715 days) | |||
| 3 | Shibu Soren -- | 2 March 2005 – 12 March 2005 (10 days) | Jharkhand Mukti Morcha | ||
| (2) | Arjun Munda Kharsawan | 12 March 2005 – 14 September 2006 (555 days) | Bharatiya Janata Party | ||
| 4 | Madhu Koda Jaganathpur | 14 September 2006 – 23 August 2008[2] (709 days) | Independent | ||
| (3) | Shibu Soren -- | 27 August 2008 – 18 January 2009 (144 days) | Jharkhand Mukti Morcha | ||
| – | Vacant (President's rule) | 19 January 2009 – 29 December 2009 (344 days) | N/A | ||
| (3) | Shibu Soren -- | 30 December 2009 – 31 May 2010 (152 days) | Jharkhand Mukti Morcha | ||
| – | Vacant (President's rule) | 1 June 2010 – 11 September 2010 (102 days) | N/A | ||
| (2) | Arjun Munda Kharsawan | 11 September 2010 – 18 January 2013 (860 days) | Bharatiya Janata Party | ||
| – | Vacant (President's rule) | 18 January 2013 – 12 July 2013 (175 days) | N/A | ||
| 5 | Hemant Soren Dumka | 13 July 2013 – present (239 days) | Jharkhand Mukti Morcha | ||
छत्तीसगढ़ :
| Assembly | Duration | Winning Party/Coalition | Chief Minister | Opposition leader |
|---|---|---|---|---|
| 1st | 2000–2003 | Indian National Congress | Ajit Jogi | Nand Kumar Sai |
| 2nd | 2003–2008 | Bharatiya Janata Party | Raman Singh | Mahendra Karma |
| 3rd | 2008–2013 | Bharatiya Janata Party | Raman Singh | Ravindra Choubey |
| 4th | 2013–Present | Bharatiya Janata Party | Raman Singh | T.S. SINGH DEO |
और इन दोनों जगहों में विकास के नाम पर कुछ नहीं है, हर दिन हत्या, लूट, बंद यही मिला है यहाँ की जनता को । इसबार मुझे झारखण्ड आये हुए १३ दिन हुए हैं, जिसमें से ३ दिन बंदी रही है, इस बीच कई हत्याएँ हो चुकी हैं । मेरी ज़मीन छत्तीस गढ़ में है, जिसे देखने तक जाना मुहाल है, इतनी हत्याएँ हो रहीं हैं कि कुछ समझ नहीं आता । इन दोनों जगहों में लोग डरे सहमे हुए हैं, व्यवसाय औंधे मुँह पड़े हुए हैं, अराजकता इस क़दर फैली हुई है कि कुछ कहा नहीं जा सकता। खुशियाँ लोगों के चेहरों से ग़ायब है, हर इंसान परेशान नज़र आता है ।
लोग सोच सकते कि अगर इतनी ही परेशानी है तो मैं यहाँ आती ही क्यों हूँ, पहली और सबसे अहम् बात मैं भारतीय हूँ , झारखण्ड मेरा जन्मस्थान है, दूसरी उतनी ही अहम् बात, मेरी माँ यहाँ अकेली है, मुझे उसकी वजह से ही हर दो-तीन महीने में आना पड़ता है, वो अपना घर-द्वार छोड़ कर कैनेडा जाना ही नहीं चाहती और हम सभी उसकी इच्छा का आदर करते हैं। यहाँ बिजली नहीं, पानी नहीं, सड़कें नहीं, ट्रैफिक ऐसी कि आप घर से बाहर पाँव धरने से पहले दस बार सोचें। कूड़े का अम्बार लगा हुआ है।
बेईमानी और धोखाधड़ी हर कदम पर है । आप चाह कर भी किसी पर यकीन नहीं कर सकते।
गुड गवर्नेंस की बात करने वाले ये भी बताएँ कि झारखण्ड को अलग राज्य का दर्ज़ा पाये हुए १३ वर्ष हो चुके और इन १३ वर्षों में से ९.५ वर्ष 'सो कॉल्ड' गुड गवर्नेंस पार्टी का ही राज रहा है, मैं पूछती हूँ क्या साढ़े नौ साल का समय कम था इनके गुड गवर्नेंस के लिए ?????? इन जगहों पर, उनकी गवर्नेंस करने की क्षमता कहाँ घास चरने चली जाती है ???? चमके हुए जूते को चमका-चमका कर कहते फिरना कि देखो जी हमने क्या चमकाया है !!!!। हमसे बेहतर कोई हो ही नहीं सकता । ये हम झारखण्ड और छत्तीस गढ़ में रहने वालों के लिए विश्वास करने वाली बात अब नहीं रह गयी है, क्योंकि हम लोगों ने फर्स्ट हैण्ड अपनी फ़ज़ीहत इन्हीं के हाथों से झेली है । सालों देख चुके हैं हम इनकी बेहतरी और इनकी क़ाबिलियत । इनकी गवेर्नेंस ने झारखण्ड की भद्द पीट कर रख दी, छत्तीसगढ़ मटियामेट हुआ जा रहा है । मुझसे कहीं बेहतर दिमागवाले लोग हैं, उनसे इतना ही पूछना है, जब इतने छोटे-छोटे राज्य सम्हालने का शऊर नहीं है इन पार्टियों को तो क्या देश सम्हाल लेंगे ये लोग ????
लोग सोच सकते कि अगर इतनी ही परेशानी है तो मैं यहाँ आती ही क्यों हूँ, पहली और सबसे अहम् बात मैं भारतीय हूँ , झारखण्ड मेरा जन्मस्थान है, दूसरी उतनी ही अहम् बात, मेरी माँ यहाँ अकेली है, मुझे उसकी वजह से ही हर दो-तीन महीने में आना पड़ता है, वो अपना घर-द्वार छोड़ कर कैनेडा जाना ही नहीं चाहती और हम सभी उसकी इच्छा का आदर करते हैं। यहाँ बिजली नहीं, पानी नहीं, सड़कें नहीं, ट्रैफिक ऐसी कि आप घर से बाहर पाँव धरने से पहले दस बार सोचें। कूड़े का अम्बार लगा हुआ है।
बेईमानी और धोखाधड़ी हर कदम पर है । आप चाह कर भी किसी पर यकीन नहीं कर सकते।
गुड गवर्नेंस की बात करने वाले ये भी बताएँ कि झारखण्ड को अलग राज्य का दर्ज़ा पाये हुए १३ वर्ष हो चुके और इन १३ वर्षों में से ९.५ वर्ष 'सो कॉल्ड' गुड गवर्नेंस पार्टी का ही राज रहा है, मैं पूछती हूँ क्या साढ़े नौ साल का समय कम था इनके गुड गवर्नेंस के लिए ?????? इन जगहों पर, उनकी गवर्नेंस करने की क्षमता कहाँ घास चरने चली जाती है ???? चमके हुए जूते को चमका-चमका कर कहते फिरना कि देखो जी हमने क्या चमकाया है !!!!। हमसे बेहतर कोई हो ही नहीं सकता । ये हम झारखण्ड और छत्तीस गढ़ में रहने वालों के लिए विश्वास करने वाली बात अब नहीं रह गयी है, क्योंकि हम लोगों ने फर्स्ट हैण्ड अपनी फ़ज़ीहत इन्हीं के हाथों से झेली है । सालों देख चुके हैं हम इनकी बेहतरी और इनकी क़ाबिलियत । इनकी गवेर्नेंस ने झारखण्ड की भद्द पीट कर रख दी, छत्तीसगढ़ मटियामेट हुआ जा रहा है । मुझसे कहीं बेहतर दिमागवाले लोग हैं, उनसे इतना ही पूछना है, जब इतने छोटे-छोटे राज्य सम्हालने का शऊर नहीं है इन पार्टियों को तो क्या देश सम्हाल लेंगे ये लोग ????
झारखण्ड और छत्तीसगढ़ दोनों ही आज शरीफों के रहने लायक जगह नहीं रह गए हैं, जबकि उनके निर्माण के साथ ही गुड गवर्नेंस पार्टी ने सरकार सम्हाली थी। कभी लोग इन राज्यों की तरफ भी देख लिया करें और तब आकलन करने की कृपा किया करें, ये जो ढोल पीटते फिर रहे हैं अपनी क़ाबिलियत का, क्या सचमुच वो क़ाबिल है ???
और अब लाख टके की बात हम आपसे पूछते हैं, इतना सबकुछ देखने और भुगतने के बाद हम लोग किस पार्टी पर यकीन करें ये कोई बता दे ????
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