Wednesday, June 13, 2012

हम गाना गाते थे, और हमरे बाबू जी रोते थे..

एक तो हम लड़की पैदा हुए, दूसरे मध्यमवर्गीय परिवार में, तीसरे ब्राह्मण घर में, चौथे बिहार में और पांचवे थोडा बहुत टैलेंट लिए हुए, तो कुल मिला कर फ्रस्ट्रेशन का रेसेपी बहुते अच्छा रहा. याद है हमको, सिनेमा हॉल में सिनेमा देखने को मनाही रही, काहे कि उहाँ पब्लिक ठीक नहीं आता है, सिनेमा जाओ तो भाइयों के साथ जाओ, तीन ठो बॉडीगार्ड, और पक्का बात कि झमेला होना है, कोई न कोई सीटी मारेगा और हमरे भाई धुनाई करबे करेंगे, बोर हो जाते थे, सिनेमा देखना न हुआ पानीपत का मैदान हो जाता था...

इ भी याद है स्कूल से निकले नहीं कि चार गो स्कूटर और मोटर साईकिल पीछे लग जाते थे , हम रिक्शा पर और पीछे हमरी पलटन, स्लो मोसन में, घर का गली का मुहाना आवे और सब गाइब हो जावें....

एक दिन एक ठो हिम्मत किया था गली के अन्दर आवे का, आ भी गया था...और बच के चल भी गया, बाकि मोहल्ला प्रहरियों का नज़र तो पड़िये गया था....  

दूसर दिन उन जनाब की हिम्मत और बढ़ी, फिर चले आये गल्ली के अन्दर में, हम तो गए अपना घर बाद में पता चला उनका वेस्पा गोबर का गड्ढा में डूबकी लगा गया, निकाले तो थे बाद में लोग-बाग़ , बाकि काम नहीं किया शायिद, काहे की उ नज़र आये ....वेस्पा नहीं.....

हम गाना गाते थे, और हमरे बाबू जी रोते थे, इसका बियाह कैसे होगा इ गाती है !!! आईना के आगे २ मिनट भी ज्यादा खड़े हो जावें तो माँ तुरंते कहती थी "इ मेन्जूर जैसे का सपरती रहती हो"  माने इ कहें कि चारों चौहद्दी में पहरा ही पहरा, गीत गावे में भी रोकावट था, खाली लता दीदी को गा सकते थे, और हमको आशा दीदी से ज्यादा लगाव था, कभी गाने को नहीं मिला आशा दीदी का चुलबुला गीत सब, सब बस यही कहते रहे, इ सब अच्छा गीत नहीं है, अच्छा घर का लड़की नहीं गाती है इ सब, हम आज तक नहीं समझे कि गीत गावे से अच्छा घर का लड़की बुरी कैसे हो जाती है, गीत गावे से चरित्र में धब्बा कैसे लगता है, उस हिसाब से तो आशा जी का चरित्र सबसे ख़राब है, फिर काहे लोग उनका गोड़ में बिछे हुए हैं, बस यही बात पर आज हम गाइए दिए हैं इ गीत, अब आप ही बताइए, इसको गाकर हम कोई भूल किये हैं का.....का हमरी प्रतिष्ठा में कोई कमी आएगी आज के बाद ????



फिल्म : मेरे सनम
आवाज़ : आशा भोंसले
गीतकार : मजरूह सुल्तानपुरी
संगीतकार : ओ.पी. नैय्यर 
सिनेमा के परदे पर गायीं  हैं 'मुमताज़' 
और ईहाँ आवाज़ है हमारी.....स्वप्न मंजूषा 'अदा' ...

ये है रेशमी
जुल्फों का अँधेरा न घबराइये
जहाँ तक महक है
मेरे गेसुओं के चले आइये

सुनिए तो ज़रा जो हकीकत है कहते हैं हम
खुलते रुकते इन रंगीं लबों कि कसम
जल उठेंगे दिए जुगनुओं कि तरह २
ये तब्बस्सुम तो फरमाइए

ला ला ला ला ला ला ला ला
प्यासी है नज़र ये भी कहने की है बात क्या
तुम हो मेहमाँ तो न ठहरेगी ये रात क्या
रात जाए रहे आप दिल में मेरे २
अरमाँ बन के रह जाइए.

ये है रेशमी
जुल्फों का अँधेरा न घबराइये
जहाँ तक महक है
मेरे गेसुओं के चले आइये

Tuesday, June 12, 2012

अब घर का काम कौन करेगा ...(संस्मरण)

आज फिर उसके चेहरे पर काले-नीले से दाग थे...गौर से देखने पर गर्दन और हाथों पर भी खरोंच के निशान थे...फिर उसकी ज़रुरत से ज्यादा झुकी हुई गर्दन भी, बहुत कुछ बता रही थी....हाय ! कैसी हो ? आई ऍम फाइन ...लीना ने बिना मेरी तरफ देखे हुए जवाब दिया ...ऐ क्या हुआ तुझे...? मैंने उसे हलके से धकेलते हुए पूछा था.....कुछ नहीं ...कुछ भी तो नहीं, कहते हुए वो और सिमट गयी थी और जाने कैसी तो उसकी आवाज़ हो गयी थी...मैं जानती हूँ, जब भी लीना कहती है, कुछ नहीं हुआ...तब ज़रूर कुछ होता है...और आज का दिन भी अपवाद नहीं था....मैंने भी उसे अब ज्यादा एम्बैरेस नहीं करना चाहा...दो घंटे में लंच होने ही वाला है...फिर बात करुँगी उससे...

लंच के वक्त लीना..हमारे बीच नहीं आई...जाकर कोने में बैठ गयी..मैंने दूर से ही आवाज़ दी ...अरी ओ महारानी..! लंच नहीं करना है क्या...लीना ने बिना मेरी तरफ देखे ही, 'ना' में हाथ हिला दिया था...लेकिन मैं भी कौन सी कम थी...उठ कर चली ही गयी उसके पास...'क्या बात है लीना ? लंच नहीं लाई तो, मेरे साथ कर ले...' 'अरे नहीं थैंक्स ..तू खा, आज मुझे भूख नहीं है...' लीना ने कहा था...अब मुझे झुंझलाहट होने लगी..'थैंक्स की बच्ची...तू अपने को बड़ी होशियार समझती है...तुझे लगता है हम सारे बेवकूफ हैं...तुझपर सुशील ने हाथ उठाया है...सारे बदन पर नील पड़ा हुआ है और तू हम सबको उल्लू बना रही है...तू क्या सोचती है...लोग अंधे हैं...आज फिर कहेगी, गिर गयी थी बाथरूम में...बाथरूम न हुआ अखाड़ा हो गया...तू कुश्ती करती है वहां और गिरती रहती है...देख अगर उसे नहीं रोका तो, एक न एक दिन कोई न कोई कम्प्लेन कर देगा यहाँ से...देख ले, वो दोनों कालियां, सुबह से खुसुर-खुसुर कर रहीं हैं...और अगर तू नहीं चाहती की कोई देखे, ये तेरा काला-पीला चेहरा तो मेक-अप करके आया कर...और कान खोल के सुन ले, मेरे से ये ड्रामेबाजी मत किया कर...भूख नहीं है...!' मैंने उसकी नक़ल की थी ...'चुप-चाप से खाना खा और साफ़-साफ़ बता आज क्या हुआ है...'मेरी सारी भड़ास एक सांस में निकल गई थी....लीना मुझे बड़ी कातर नज़रों से देखने लगी...और फुस-फुसाई....दिल नहीं है मेरा खाने का....मैंने उसे एकदम से घूर कर देखा था...उसने हाथ झट आगे बढ़ा दिया और रोटी तोड़ने लगी ..

याद है मुझे, शायद ५-६ महीने पहले की बात है...मुझे, ऑफिस में थोड़ी देर हो गयी थी, उस दिन... सारे जा चुके  थे...मैं भी अपना काम ख़तम करके, भागना चाहती थी...कंप्यूटर ऑफ करके मैं, दरवाज़े की तरफ डग भरने लगी थी...कोने के cubical के पास से गुजरने लगी कि किसी के सुबकने की आवाज़ आई...उस समय ऑफिस में बिलकुल अकेली थी मैं,  डर के मारे दिल धौंकनी की तरह चलने लगा था..जाने कौन है..? डरते हुए झाँका था ..तो देखा लीना सर झुकाए, सुबक रही थी...'आर यू ओ के ?' मेरे इस सवाल से, वो भी घबरा गयी थी...शायद उसे भी यही अहसास था, कि वो अकेली है ऑफिस में...झट आंसू पोंछ कर उसने कहा था...'ओ..याह....आई ऍम फाइन ..आई ऍम सो सॉरी'...वो ज़रा उलटी-पुलती होने लगी थी...बात बदलते हुए मैंने पूछा ....इंडियन हो ? उसने बड़े जोर से 'हाँ' में सर हिलाया ...'मैं भी....आई ऍम सपना....' कहते हुए मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया था...और उसने हाथ बढाने से पहले, हथेली को अपने कपड़ों में जोर से रगडा था...कहीं उसके आंसू मेरी हथेली पर चिपक ना जाएँ.....यही तो सोचा होगा उसने....'नाईस तो मीट यू..आई ऍम लीना..' जबरदस्ती मुस्कुराते हुए उसने कहा था....'अच्छा लीना अब तुम मेडीटेशन बाद में करना ...यहाँ अकेला रहना ठीक नहीं..चलो अब घर चलते हैं....' मेरी आवाज़ में इतनी अथोरिटी थी,  कि लीना ने फट अपना पर्स उठा लिया था...और हमदोनों दरवाजे की तरफ बढ़ गए थे...
पार्किंग लाट में आकर मैंने देखा, सिर्फ मेरी ही गाड़ी खड़ी थी...पूछने पर उसने बताया वो ड्राईव नहीं करती है...और बस से जाती है...मैंने तपाक से उसे राइड ऑफर कर दिया...रास्ते में ऑफिस की और उसके परिवार की  बातें होती रहीं...लेकिन मैंने एक बार भी उससे नहीं पूछा... वो रो क्यूँ रही थी...

उसने बताया उसकी शादी को १ साल हुए हैं...वो पंजाब से है...भाई-बहनों में सबसे बड़ी है...माँ-बाप ने उसे अकेली ही भेज दिया था, यहाँ शादी करने के लिए...वो शादी का जोड़ा और कुछ नए कपड़े सूटकेस में भर कर, हाथ में अपने होने वाले दुल्हे की तस्वीर और आँखों में रंगीन ख्वाब लिए, अकेली ही आ गयी थी कनाडा...कनाडा आकर उसकी शादी किसी गुरुद्वारे में हो गयी...शादी के दिन, शादी जैसा कुछ भी नहीं था...इस  शादी में शरीक होना भी, सास-ससुर ने ज़रूरी नहीं समझा था...जो इसी शहर में रहते हैं...ससुर तो अपने घर में लुंगी में ही पड़े रहे थे ...शादी के तुरंत बाद ही, गुरुद्वारे से घर आकर उसने खाना बनाया था, क्यूंकि उसके पति को काम पर जाना था....उसका पति टैक्सी चलाता है... और लीना के कहे अनुसार, वो उससे बहुत प्यार करता है...
ऑफिस में हम सबके, ऐसे ही दिन बीतते जा रहे थे...बीच-बीच में लीना के शरीर पर, सुशील का प्यार, काले-नीले रंगों में नज़र आ ही जाता था...पूछने पर लीना पूरे कांफिडेंस से अपना, बाथरूम हादसा सुना देती थी...और मैं उसे बाथरूम में rug डालने के तरीकों पर भाषण दे देती थी...

इस बीच दर्ज़नों बार, उसे अपनी कार में मैं, उसके घर तक राईड दे चुकी थी,  लेकिन वाह री लीना.... क्या मजाल कि एक बार भी वो, मुझसे घर के अन्दर आने को कहे...बड़ी कंजूस थी वो, कभी ये नहीं कहा उसने कि... आज एक कप चाय पी कर जाओ सपना..

मैं ही कौन सी उसे छोड़ने वाली थी...वैसे भी जो मुझे जानते हैं, वो ये भी जानते हैं, जबतक कोई मुझे बिलकुल अनोइड न कर दे, मैं साथ नहीं छोडती...

आज भी मैं लीना की वही पुरानी ऊंट-पटाँग कहानी ..बाथरूम में गिरनेवाली,  झेल जाती शायद...लेकिन पता नहीं क्यों, आज ख़ुद को नहीं रोक पाई मैं...मुझे इस बात पर ज्यादा गुस्सा आ रहा था, कि लीना मुझे महा-ईडियट समझ रही थी...बिफर कर मैंने कहा था ...देख लीना अगर तुझे इसी तरह चोट लगती रही ...तो अब मैं चुप नहीं रहूंगी...कहे देती हूँ...या तो तू सुधर जा या फिर उसे सुधार दे, जिससे तुझे चोट लगती है...ये चोट आखरी होनी चाहिए...लीना भी समझ गयी थी, अब वो ज्यादा नहीं छुपा सकेगी बातें..

जाने क्या हुआ उसके बाद, लीना चार दिन तक, ऑफिस नहीं आई...मैं रोज़ उसका इंतज़ार करती, लेकिन वो नदारद रही...मन में कहीं अपराधबोध भी घर करने लगा था मेरे अन्दर...मुझे क्या ज़रुरत थी, वो सब कहने की ...मियाँ-बीवी की ज़िन्दगी है..मुझे क्या लेना-देना है...मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था..ऐसे ही विचार मेरे ज़हन-ओ-दिल पर हावी होते रहे ....लेकिन वो मेरे दिल के इतने करीब आ गयी थी, कि उसका अपमान, मुझे मेरा अपमान लगता था...

चौथे दिन शाम को, मैं लीना के घर पहुँच गयी...घंटी बजाया तो किसी गोरी ने दरवाजा खोला था...लीना के बारे में पूछने पर उसने, बेसमेंट का दरवाज़ा दिखा दिया था...मैं नीचे चली गयी..लीना बिस्तर पर निढाल पड़ी थी...मुझे देख कर उसके चेहरे पर ऐसे भाव आये, जैसे उसने भूत देख लिया हो...चेहरा एकदम सफ़ेद हो गया था उसका...कहने लगी सपना ..तू क्यूँ आई..? तू मुझे मरवा डालेगी...मैंने उसे आश्वस्त किया, कि ऐसा कुछ नहीं होगा....'तू मेरा घर देखना चाहती थी न....देख ले यहीं रहती हूँ मैं'...मैंने उसे ढाढस बंधाते हुए कहा ....'तो क्या हुआ ...कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा...तेरा पति एक अच्छी सी जगह में घर लेगा और तू आराम से रहेगी...इस जगह से तुझे, वो ले जाएगा'...उसने ना जाने मुझे कैसी नज़र से देखा...मेरा कलेजा मुंह को आ गया...उसने मुझे झकझोरते हुए कहा...'सपना ये मेरे पति का ही घर है...बस मेरी जगह यहाँ है, बेसमेंट में...मुझे बेडरूम में जाने की इजाज़त नहीं है'.....मैं तो जैसे आसमान से गिर गयी...क्याआआअ.?  'हाँ मेरी औकात सिर्फ एक नौकरानी की है...बता मैं तुझे कहाँ लेकर आती सपनाअअअअ' ...वो बोलती ही जा रही थी...अब मेरी आँखों के सामने उस गोरी का चेहरा घूम गया था....मैंने तुरंत पूछा...'वो गोरी कौन है...?' 'वही तो है सपना इस घर की मालकिन, मैं तो बस नौकरानी हूँ...खाना बनाना, घर साफ़ करना, घास काटना...ये काम, वो काम, सब कुछ  करना..यहाँ तक कि अपने खर्चे का भी इंतज़ाम करना....ये सारी बातें मैं झेल जाती हूँ.....लेकिन जब मुझे वो कपड़े धोने होते हैं...जिनमें उनके सानिध्य के चिन्ह होते हैं...सच कहती हूँ....मैं बिखर जाती हूँ...नहीं झेल पाती'...ये कहते हुए..लीना की छाती तो जैसे फट ही गयी थी शायद...उसका बदन इतने जोर से हिला था, कि शायद भगवान् भी उठ बैठे होंगे...

मैंने लीना को अपनी बाहों में भर लिया था...थोड़ी देर में वो शांत हो गयी थी...अब हमदोनों मिल कर उसका सूटकेस तैयार कर रहे थे...मैंने लीना को सबसे अच्छा सूट पहनने को कहा था ...बेसमेंट के, छोटे से आईने के सामने बैठी लीना का, मैं मेक-अप कर रही थी ...उसके चेहरे के सारे दाग फाउनडेशन के नीचे अब, दब गए थे...मेक-अप पूरा होने के बाद जो लीना नज़र आई..उसे देख कर मेरी आँखें चमक गयीं...इतनी प्यारी इतनी खूबसूरत कि बस पूछिए मत..

हम दोनों ने एक-एक सूटकेस उठा लिया था...हम जैसे ही दरवाज़े के बाहर आये, एक टैक्सी आकर रुकी थी, ड्राईव-वे पर...'ओये ! ये कोण है ? ओये कित्थे जा रही है ...? ऐसा ही कुछ चीख़ रहा था वो ...शायद उसे ये फ़िक्र खाए जा रही थी, अब घर का काम कौन करेगा ...वो गोरी तो करने से रही ?
हम दोनों के कदम, मेरी कार की तरफ बढ़ते जा रहे थे.....पीछे से लगातार चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थीं...मैंने कनखियों से लीना को देखा ..उसके चेहरे पर 'Who Cares....!!' के भाव थे...आज, वो मुझे ज़रा लम्बी लग रही थी....शायद आत्मविश्वास इंसान का कद बढ़ा देता है....


हाँ नहीं तो...!
आओ हुजूर तुमको... आवाज़ 'अदा'

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Sunday, June 10, 2012

विभा...!! (संस्मरण)


कानून  पत्नी को पति  की जायदाद में अधिकारिणी मानता है...
अगर पति की मृत्यु  हो जाए तो, पति की सम्पति की वारिस पत्नी  ही होती है...
यूँ तो कौन स्त्री कभी चाहेगी विधवा होना, लेकिन कभी-कभी नियति के कुचक्र का प्रहार किसी पर हो ही जाता है..और तब, जब कभी कोई विधवा हो जाती है,  तो हमारा समाज उसके साथ कैसी बेइंसाफी करता है, साथ ही स्वार्थी तत्व किस तरह बलात, कमजोर विधवा के ऊपर कानून लाद कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश करते हैं ...यह संस्मरण इसी बात को बताता  है ...और इस समाज को आईना भी दिखाता है.....

'विभा' नाम है उसका...व्यवसायी परिवार की लड़की है ....माँ बाप नेअच्छा खासा दान-दहेज़ देकर उसका विवाह पटना के, श्री सत्यपाल प्रसाद के साथ कर दिया....विभा भी ससुराल आकर और अपने पति का सानिध्य पाकर बहुत खुश थी...ससुराल में ..सास-ससुर, जेठ-जेठानी और एक 'परित्यक्ता' ननद और उसका एक बेटा साथ रहते थे.....घर में जेठ और ननद की ही चलती थी.... ननद बहुत खुश नहीं रहती थी...'परित्यक्ता' का जीवन जीना भारतीय समाज में कठिन तो है, चाहे कितना भी जीवन यापन भत्ता मिलता हो....

विभा के सर पर मुसीबतों का पहाड़ उस दिन टूटा,  जिस दिन उसके पति, सत्यपाल की मृत्यु जीप एक्सिडेंट में हुई....पति  के इस आकस्मिक निधन से, विभा की दुनिया तो बस उजड़ ही गयी....शादी के मात्र २ साल में ही हाथों की मेहंदी उतर गयी...विभा के कोई संतान भी तो नहीं थी कि, वह अपना कुछ दिल लगा लेती...
विभा का पति बहुत ही काबिल इंसान था...वो हर मामले में अपने बड़े भाई से बेहतर था...उसने अपने बड़े भाई से ज्यादा संपत्ति अर्जित की थी, वह घर का कमाऊ पूत था....और अब उसकी पूरी कमाई बंद हो गयी, जिससे घर की  परिस्थिति में फर्क पड़ने लगा....लेकिन विभा के व्यक्तिगत खर्चे तो थे ही ...जाहिर था, अब वो खर्चे परिवार के अन्य सदस्यों को खलने लगे थे...

विभा और बाकि लोगों में एक और फर्क था.....विभा शिक्षित थी और समझदार भी..जबकि उसके जेठ के परिवार में शिक्षा के प्रति लोग उदासीन थे...इसलिए विभा की समझदारी की बातें, उन्हें समझ में नहीं आती थी...

धीरे-धीरे विभा के प्रति लोगों का रवैय्या बदलने लगा, उसके सारे गहने सास के कब्ज़े में चले गए, दिन-प्रतिदिन के व्यक्तिगत खर्चों के लिए वो मोहताज हो गयी और विभा आभाव की प्रतिमूर्ति बन कर रह गयी...

बात इतने पर ही ख़त्म नहीं हुई थी,  जब-जब भी विभा ने अधिकार के लिए ज़बान खोलने की कोशिश की, उसे पूरे परिवार के आक्रामक रवैय्ये का सामना करना पड़ा...आये दिन मार-कुटाई भी शुरू हो गयी...

मेरी ससुराल भी पटना में ही है, और विभा वहाँ मेरी पड़ोसन है....मैं कुछ साल पहले, कुछ दिन के लिए गयी थी अपने ससुराल....बस यूँही एक दिन पड़ोस में पहुँच गयी विभा के घर ...पूरे घर का माहौल ही अजीब था....विभा को देखा ....वैधव की मूर्ति, कितनी आभा विहीन होती है, देखकर मन में एक टीस सी उठी थी....लेकिन दाल में कुछ काला भी लगा था,  बस  मैं उससे बात करने की जुगत में जुट गयी...

एक दिन दोपहर, जब ज्यातर लोग घर से बाहर थे और जो घर में थे वो भी सो रहे थे ...मैं मौका पाकर विभा के घर अन्दर चली गयी....और विभा का हाथ पकड़ कर ले आई उसे अपने  घर....मेरी सास को पसंद नहीं आया था , उसका मेरे घर आना...लेकिन मुझसे कुछ कह नहीं पायीं वो .....

विभा से बात करके मुझे पता चल गया, कि लाखों की सम्पति की वारिस विभा को, कितनी प्रताड़ना भरे दिन देखने को मिल रहे हैं...और इसमें उसकी सास, उसकी ननद और उसके जेठ सबका हाथ है....
विभा की गला दबा कर हत्या करने की भी, कोशिश की गयी थी जिसमें ...टांगें सास ने पकडे थे, हाथ ननद ने और गला दबाने का उपक्रम जेठ ने किया था...वो तो भला हो ससुर का, जो इसमें उनका साथ नहीं दे पाए....

विभा की कोई संतान नहीं है...वो उस घर से निकलना भी नहीं चाहती, अगर वो ऐसा करेगी तो संपत्ति से हाथ धो बैठेगी.....जो भी समय मुझे  दस-पंद्रह दिन में मिला, उसको ढाढस, और संघर्ष करने का साहस बनाये रखने की प्रेरणा देती रही....मेरे  रिश्ते के जीजा लगते हैं, हजारीबाग के एस .पी . थे उन दिनों ..Mr सुबर्नो उनसे बात करवा दी...जिससे हिम्मत बनी  रहे विभा की....कल ही बात की उससे फ़ोन पर..
कह रही थी कुछ भी नहीं बदला है दीदी.....सब कुछ वैसा ही है....आप फ़ोन करते रहा कीजिये....अच्छा लगता है आपसे बात करना......

और मैं सोच रही हूँ, इस हक की लड़ाई में विभा जीतेगी या हारेगी..यह तो समय ही बताएगा...लेकिन एक बात स्पष्ट है....कि मध्ययुगीन प्रवृतियां आज भी हमारे समाज में कहीं-कहीं व्याप्त हैं ...क्या हम सचमुच ख़ुद को प्रगतिशील, नीतिवान, ईमानदार,  आधुनिक कहने का हक रखते हैं...???

हिन्दू उतराधिकारी अधिनियम १९५६ के प्रावधानों के तहत विधवा अपने पति के हिस्से की पुश्तैनी संपत्ति तथा पति की अर्जित संपत्ति की उत्तराधिकारी है...

अब एक गीत ...नैनों में बदरा छाये..आवाज़ 'अदा' की...

Wednesday, June 6, 2012

पुरुष प्रधान समाज के मुँह पर इनके तमाचों की आवाज़ आज तक गूँज रही है...

बिना नारी के इस दुनिया की कल्पना नहीं की सकती, लेकिन आज भी समाज में नारी को अपने अधिकार के लिए अथक संघर्ष करना पड़ता है। नारी की स्थिति ऐसी हमेशा से नहीं थी, आदिकाल में नारी ज्यादा स्वतंत्र तथा अपने अधिकारों के प्रति सजग थी..

हमारी पूर्वज नारियों ने, बहुत से ऐसे काम किये हैं, जिनको करने की ताब, आज की नारी में भी नहीं है, जैसे कुंती का बिन ब्याही माँ बनाना, मरियम का कुँवारी माँ बनना, सर्वविदित है।
पुराणों में तथा धर्म पुस्तकों की अनेकोनेक नायिकाओं ने स्वाधिकार का प्रयोग किया है, पुरातनकाल में स्वयंवर का आयोजन ही, अपने आप में 'स्त्री स्वतंत्रता' का प्रतीक है। जिसमें उम्मीदवार पुरुषों को, जुटा कर, अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का अधिकार नारी को था । इसके अलावा, और भी कई ऐसे फैसले हैं, जो इन नारियों ने अपनी इच्छा तथा अपनी भावनाओं को मान देते हुए लिए थे, जैसे, कई पुरुषों से संसर्ग, विवाहेतर सम्बन्ध, स्पर्म डोनर का उपयोग तथा विधवा विवाह की बात भी देखी-पढ़ी जा सकती है । हालांकि इन घटनाओं को हमारा पुरुष प्रधान समाज सीधे-सीधे कबूलना नहीं चाहता, और हमेशा किसी न किसी बहाने का जामा पहना कर ही प्रस्तुत और स्वीकार करता है। आज बात करते हैं ऐसी ही कुछ नारियों की ।

पंचकन्या, वे पाँच कन्याएँ हैं, जिनका भारत के हिन्दू सम्प्रदाय और धर्मग्रंथों में विशिष्ट स्थान है। पुराणों के अनुसार ये पाँच कन्याएँ विवाहित होते हुए भी, पूजा के योग्य मानी गई हैं। इनके स्मरण मात्र से ही सभी पापों का नाश होता है।
अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा।
पंचकन्या: स्मरेतन्नित्यं महापातकनाशम्॥
इन पांच कन्याओं का नाम निम्नलिखित हैं :
  1. अहल्या
  2. द्रौपदी
  3. कुंती
  4. तारा
  5. मंदोदरी
अहल्या
अहल्या महर्षि गौतम की पत्नी थी। वह अत्यंत ही रूपवती थी। एक दिन गौतम की अनुपस्थिति में देवराज इन्द्र ने अहल्या से प्रेम निवेदन किया और सानिध्य की इच्छा प्रकट की। यह जानकर कि स्वयं इन्द्र उस पर मुग्ध हैं, अहल्या, देवराज इन्द्र की आसक्ति से खुश हुई थी और प्रसन्नता पूर्वक इस अनुचित कार्य के लिए तैयार हो गई। लेकिन ऋषि गौतम ने, कुटिया से जाते हुए इन्द्र को देख लिया और उन्होंने अहल्या को पाषाण बन जाने का शाप दे दिया। अहल्या का त्याग ऋषि गौतम ने, उसके विवाहेतर सम्बन्ध के कारण किया था, त्रेता युग में श्री राम की चरण-रज से अहिल्या का शापमोचन हुआ। वह पाषाण से पुन: ऋषि-पत्नी हुई। अब वो पत्थर की बनी थीं या 'पथरा' गयीं थी सोचने वाली बात तो है, और ये भी हो सकता है कि श्री राम ने इस दम्पति के बीच, काउंसिलिंग करके मेल करवाया था, यह भी विवेचना का विषय हो सकता है, लेकिन यह बहुत बड़ा उदहारण है विवाहेतर सम्बन्ध का।

द्रौपदी
कुंती तथा पांडवों ने द्रौपदी के स्वयंवर के विषय में सुना तो वे लोग भी सम्मिलित होने के लिए धौम्य को अपना पुरोहित बनाकर पांचाल देश पहुंचे। कौरवों से छुपने के लिए उन्होंने ब्राह्मण वेश धारण कर रखा था तथा एक कुम्हार की कुटिया में रहने लगे। राजा द्रुपद द्रौपदी का विवाह अर्जुन के साथ करना चाहते थे। लाक्षागृह की घटना सुनने के बाद भी उन्हें यह विश्वास नहीं होता था कि पांडवों का निधन हो गया है, अत: द्रौपदी के स्वयंवर के लिए उन्होंने यह शर्त रखी कि निरंतर घूमते हुए यंत्र के छिद्र में से जो भी वीर निश्चित धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाकर, दिये गये पांच बाणों से, छिद्र के ऊपर लगे, लक्ष्य को भेद देगा, उसी के साथ द्रौपदी का विवाह कर दिया जायेगा। ब्राह्मणवेश में पांडव भी स्वयंवर-स्थल पर पहुंचे। कर्ण ने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा तो ली थी, किंतु द्रौपदी ने सूत-पुत्र से विवाह करने से इनकार कर दिया था, अत: कर्ण द्वारा लक्ष्य भेदने का प्रश्न ही नहीं उठा। अर्जुन ने छद्मवेश में पहुंचकर लक्ष्य भेद दिया तथा द्रौपदी को प्राप्त कर लिया। शेष उपस्थित व्यक्तियों में यह विवाद का विषय ज़रूर बन गया कि एक ब्राह्मण को क्षत्रीय कन्या क्यों दी गयी है। परन्तु श्री कृष्ण के बीच-बचाव से बात सुलट गयी । जब अर्जुन और भीम द्रौपदी को लेकर डेरे पर पहुंचे और माता कुंती से यह कहा कि वे लोग 'कुछ' लेकर लाये हैं, उन्हें बिना देखे ही कुंती ने कुटिया के अंदर से ही आदेशा दे दिया कि सभी मिलकर उसे ग्रहण करो। लेकिन साक्षात् पुत्रवधू को देखकर अपने वचन का मान रखने के लिए कुंती ने पांचों पांडवों को द्रौपदी से विवाह करने के लिए कहा। यह वह कथा है जो कही जाती है ।

परन्तु माता कुंती का यह आदेशा कि, जो भी 'वस्तु' तुम लोग लेकर आये हो, आपस में बाँट लो, और एक 'स्त्री' को 'वस्तु' मान कर सबने बाँट लिया ! यह बात गले नहीं उतरती, सबसे बड़ी बात 'व्यक्ति' और 'वस्तु' में फर्क तो होता ही है, मेरे विचार से कारण कुछ और ही होगा। 
हो सकता है, वन-वन घूमते हुए पांडवों के लिए विवाह योग्य कन्या पाना कठिन था, कोई अपनी पुत्री देना ही न चाहता हो ऐसे लोगों को जिनका, रहने-खाने का कोई ठिकाना नहीं था, शायद पांच स्त्रियों का भरण पोषण उन हालात में कठिन होता, यह भी हो सकता है, ग्यारह लोगों की भीड़ लेकर अज्ञातवास में रहना दुर्गम होता, कौन जाने माता कुंती के इस निर्णय के पीछे कारण क्या था ?? कारण जो भी रहा हो, इस निर्णय को स्वीकार करने की हिम्मत द्रौपदी ने की थी। पोलिगैमी का ऐसा स्वीकार्य उदाहरण, दूसरा फिर नज़र नहीं आया है। यह बहुत ही बड़ा उदाहरण है 'पोलिगैमी' का..

द्रौपदी ने पांच पांडवों से पांच पुत्रों की प्राप्ति की। उनके पुत्रों का नाम क्रमश:
  1. प्रतिविंध्य (युधिष्ठिर पुत्र),
  2. श्रुतसोम (भीम पुत्र),
  3. श्रुतकर्मा (अर्जुन पुत्र),
  4. शतानीक (नकुल पुत्र),
  5. श्रुतसेन (सहदेव पुत्र) रखे गये ।
कुंती 
पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी और वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतिभोज ने पृथा को माँगकर अपने यहाँ रखा। इससे उनका नाम 'कुंती' पड़ गया। पृथा को दुर्वासा ऋषि ने एक मंत्र बतला दिया था जिसके द्वारा वे किसी देवता का आवाहन करके उससे संतान प्राप्त कर सकती थीं। विवाह से पूर्व  ही कुंती ने इस मन्त्र का उपयोग, सूर्य देवता का आवाहन करके किया, यह भी हो सकता है किसी पुरुष के सान्निध्य से जिनका नाम सूर्य था, एक पुत्र रत्न प्राप्त किया था, जिसका नाम कर्ण रखा गया, परन्तु विवाह पूर्व की गयी इस भूल से प्राप्त पुत्र को कुंती अपना न सकीं, फलतः कर्ण का उन्हें त्याग करना पड़ा। कर्ण का लालन-पालन एक सूत अर्थात सारथि के घर पर हुआ, फलतः वो सूत-पुत्र ही कहलाये । 
समय आने पर स्वयंवर-सभा में कुंती ने हस्तिनापुर नरेश पाण्डु को जयमाला पहनाकर पति रूप में स्वीकार कर लिया। 

महर्षि दुर्वासा का वरदान 
कहा जाता है कि, राजा पाण्डु ने शिकार करते हुए, मैथुन-रत मृग की हत्या की थी, और मरते हुए मृग ने श्राप दिया था, कि जब भी राजा पाण्डु रति-क्रीड़ा करेंगे उनकी मृत्यु अवश्यम्भावी होगी, पाण्डु के शापित हो जाने से, जब उन्हें संतान उत्पन्न करने की रोक हो गई, तब कुंती ने महर्षि दुर्वासा के वरदान के बारे में नरेश पाण्डु को बताया। यह सुनने से महाराज पाण्डु को सहारा मिल गया। उनकी अनुमति पाकर कुंती ने धर्मराज के द्वारा युधिष्ठिर को, वायु के द्वारा भीमसेन को और इन्द्र के द्वारा अर्जुन को उत्पन्न किया। परन्तु सोचने वाली बात यह भी है, अगर मंत्रोच्चारण से ही कर्ण का जन्म हुआ था, तो उसे त्यागना कहाँ तक उचित था ??? और इसकी आवश्यकता भी क्या थी?? बाद में माद्री जो कुंती की सौत थी, को उसी मन्त्र से दो पुत्र प्राप्त हुए, नकुल और सहदेव, पिता अश्विनी कुमार थे। क्या इसे हम 'स्पर्म डोनर' के अंतर्गत कह सकते हैं ??? क्या पता आज जिस वैज्ञानिक पद्धति का उपयोग हो रहा है, उस ज़माने भी रही होगी। आख़िर विज्ञान तब भी बहुत विकसित था।

तारा
तारा प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण के अनुसार बालि की पत्नी व सुषेण की पुत्री थी। रावण की भरी सभा अपना पैर गाड़ने वाला अंगद तारा का ही पुत्र था। रामायण में श्रीराम ने बालि का वध किया था । बालि की मृत्यु के उपरांत तारा का विवाह बालि के छोटे भाई सुग्रीव से हुआ था। यह उदाहरण है, विधवा-विवाह का । तारा पंचकन्याओं में से एक है।

एक और उदाहरण मिलता है ऐसे ही विवाह का और वह है मंदोदरी का विवाह ।

मंदोदरी 
मंदोदरी रामकथा-काव्यों में मन्दोदरी का चरित्र वर्णित हुआ है।इसके पिता का नाम मयासुर था तथा माता रम्भा नामक अप्सरा थी। मन्दोदरी का विवाह रावण से हुआ था तथा इससे रावण के इन्द्रजित नामक पुत्र भी उत्पन्न हुआ था। मंदोदरी ही एक अकेली थी जिसने महाबली रावण का खुल कर विरोध किया था, जिस कारण सीता को अशोकवन में रखा गया था, यहाँ तक भी कहा जाता है सीता मंदोदरी की पुत्री थी, जिसका जन्म किसी ऋषि के संसर्ग से हुआ था, हो सकता है, यह कुछ हद तक सच भी हो, शायद यही कारण हो रावण, ईर्ष्या या क्रोधवश सीता को राजा जनक के खेत में फेंक आया था। रावण की मृत्यु के पश्चात, मंदोदरी का विवाह विभीषण से हुआ था । मंदोदरी पंचकन्याओं में से एक थी।

ये पाँचों स्त्रियाँ इसलिए पूज्य हैं क्योंकि ये समय से बहुत आगे थीं, इन्होने अपने अधिकार का सदुपयोग किया, इन्होने वही किया जो इन्हें उचित लगा।

ठीक वैसे ही ईसा मसीह की माँ, मरियम ने न सिर्फ कुँवारी माँ बन कर दिखा दिया, बल्कि अपने पुत्र को भगवान् का सबसे प्रिय बेटा भी साबित करवा दिया । 

पुरुष समाज ने न जाने कितनी ही किंवदंतियों का सहारा लेकर, इन स्त्रियों द्वारा उठाये गए कदमों को खूबसूरत मोड़ देने की कोशिश की है, लेकिन सत्य की कसौटी और तर्क की अग्नि में तप कर जो एक खरी सी बात, सामने आती है, वो सिर्फ इतनी ही है, कि पुरुष प्रधान समाज के मुँह पर इन पाचों स्त्रियों के तमाचों की आवाज़ आज तक गूँज रही है, इतना ही नहीं, इनके आगे आज भी पुरुष वर्ग नतमस्तक है और जब तक यह धरती रहेगी पुरुषों का सिर इनके सामने झुका ही रहेगा ।

हो सकता है मेरी बातों से, बहुतों को इत्तेफाक ना हो, हो सकता है मुझे कोपभाजन भी बनना पड़े, लेकिन चीज़ों को तार्किक नज़र से देखना मेरी आदत है, जब कोई बात कोई सेन्स न करे तो मैं उसमें सेन्स ढूँढने की कोशिश करती हूँ। आप मेरी बातों का जवाब, असहमति, आपत्ति, सहमती, सबकुछ सलीके से दीजिये आपका स्वागत है, बाकी फ़ालतू बातें मेरे पोस्ट पर, या मेरे ब्लॉग पर नहीं सुनी जायेंगी। 

आज से मैं अपना कमेन्ट बॉक्स खोल रही हूँ, और इसका सारा श्रेय देना चाहूंगी अनूप शुक्ला जी को, जिनका मैं बहुत सम्मान करती हूँ।

(कुछ समस्या है, कमेन्ट बॉक्स नज़र नहीं आ रहा है ..मैं इसपर काम कर रही हूँ, क्षमाप्रार्थी हूँ )

नोट: ये सारे तथ्य इन्टरनेट और अन्य पठन सामग्री से लिए गए हैं। हाँ इनको आधुनिक आयाम देने की कोशिश मेरी अपनी है...
हाँ नहीं तो !! 

Friday, June 1, 2012

बिन धुले तौलिये....


स्वच्छता की सनक ,
और गंदगी से घृणा, 
का सिद्धांत लिए
हर दिन, 
अंतस, ताज़े धुले तौलिये में 
लिपट जाता था ..
कुछ पल का जो खुलापन आता है बीच में,
वो कभी अखर जाता ,
और कभी मैं देखती ही नहीं उधर ,
लेकिन देख रही हूँ , 
मुझे भी आदत होती जा रही है,  
काव्य और कलाओं में घिसटती हुई  
गन्दगी को , निर्विकार भाव से देखने की |
विडंबना तो है, 
लेकिन, 
अब गन्दगी से घृणा नहीं होती,
धीरे-धीरे वो अपना असर खो रही है..
शायद,
उसने, नापसंदगी का दर्ज़ा पा लिया है.. 
बड़ा सूक्ष्म सा अंतर है ,
घृणा और नापसंदगी में |
सोचती हूँ, 
जब गन्दगी से दो-चार होना ही है , 
तो फिर घृणा क्यों, नापसंदगी क्यों नहीं ?
आख़िर, कभी-कभी ,
बिन धुले तौलिये से भी, 
बेमन ही सही, 
हम बदन पोंछ ही लेते हैं ..

और अब एक और गीत..आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे....आवाज़ 'अदा' की..

Tuesday, May 29, 2012

कनाडा में फूलों का मौसम है और मेरा घर भी अछूता नहीं.....

इनदिनों कनाडा में फूलों का मौसम है और मेरा घर भी अछूता नहीं.....घर के आँगन में  फूल ही फूल खिल रहे हैं.
..देखिये... 
वैसे हम बता देते हैं...ई अभी ट्रेलर है पिक्चर अभी बाकी है...  :)

ई चंपा का फूल हम लगाए हैं, यहाँ के मौसम में इनको बचाना मुश्किल होता है लेकिन ख़ुशबू के क्या कहने....