Monday, October 18, 2010

सेतु....





जानते हो !
खोकर ...
घर, ज़मीन, देश, दुनिया,
और कपड़े...
बचा कर आबरू,
ढकती है अपने हाथों से,
सबकी प्रतिष्ठा..
आँखों में अनजानी,
ख्वाहिश लिए लोग,
जो फ़िरते हैं, आस-पास,
कितने अनजान हैं !
एक, माँ, पत्नी, बहन, बेटी,
स्वयं को,
बनाती है सेतु,  
ईश्वर और धरती के बीच,
इस कामना के साथ, 
उन तक आने वाले,
सारे ग्रह,  
अगर टकरायें तो, 
उसी से टकरा जाएँ, 
कोई भी आँच,
उनतक न पहुँच पाए,
और फिर,
तैयार हो जाती है,
झेल जाने को सबकुछ,
अपनी कमजोर सी,
प्रार्थना के बल पर.....


शायद पसंद आए ..शायद न भी पसंद आए...लेकिन गीत तो है..

हम वहीं तर जाते हैं.....

पुराना है...
इक दिन में हम कई बार, देखो ना ! मर जाते हैं
क़ब्र के अन्दर, कफ़न ओढ़ कर, काहे को डर जाते हैं

राह में तेरे संग चलते हैं, पर दामन भी बचाते हैं
फ़िर आँखों में धूल झोंक कर, आ अपने घर जाते हैं

साजों की हिम्मत तो देखो, बिन पूछे बज जाते हैं
जब उनपर कोई थाप पड़े तो, गुम-सुम से हो जाते हैं

चुल्लू चुल्लू पानी लेकर, कश्ती से हम हटाते हैं
वो पलक झपकते सागर बन, और इसे भर जाते हैं

देखें तुझको या ना देखें, फर्क हमें क्या पड़ता है
साया भी ग़र छू कर गुज़रे, हम वहीं तर जाते हैं


अब गीत... पुराना है...का कहें अब....गाये तो हमहीं हैं न...!

Sunday, October 17, 2010

जीवन ! भाव, शब्द विन्यास है.....


जीवन !
भाव, शब्द विन्यास है
अर्थ-अनर्थ, अज्ञ-विज्ञ
राग-द्वेष, रुदन-परिहास है
उत्कर्ष-अपकर्ष, उग्र-सौम्य 
कोप-कृपा, अनंत जिज्ञास है
भक्ति-विरक्ति, अधम-उत्तम
अर्जन-वर्जन, आस-निराश है
कठिन-आसान, जय-पराजय 
मान-अपमान, कटु-मधु
चढाव-ढलान हेतू मोहपाश है
न्याय-अन्याय, उदार-अनुदार
उत्थान-पतन, जटिल-सरल 
रिक्त-पूर्ण, जन्म-मृत्यु,
का अनवरत विरोधाभास है.....

Saturday, October 16, 2010

एक और अहल्या...


यह  मेरी एक पुरानी कविता है..
अहल्या गौतम ऋषि की पत्नी थी, वह अति-सुन्दर थी, उसकी सुन्दरता पर देवराज इन्द्र तक मोहित थे... गौतम ऋषि प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही उठ जाया करते थे और पूजा इत्यादि में संलग्न हो जाते थे...उस दिन भी यही हुआ था ..लेकिन इंद्र ने चन्द्रमा के साथ मिल कर एक कुटिल योजना बनायीं..चन्द्रमा उस दिन, समय पहले ही अस्त होने लगा, देवर्षि गौतम समय से पहले ही उठ गए और नदी की ओर चल पड़े....जब उन्होंने सूर्यदेव को अर्ध्य देना चाहा, तो उन्हें पता चल गया कि अभी एक पूरा प्रहर बाकी है...वो अपने घर की ओर चल पड़े ...
 
इधर आश्रम में अहल्या सो रही थी..लेकिन इन्द्र, देवर्षि गौतम का रूप लेकर अन्दर आ गए,  अहिल्या उन्हें ऋषि गौतम ही समझ रही थी, और अपना सर्वस्व दे दिया ...जब ऋषिराज गौतम अपने आश्रम के समीप पहुंचे तो उन्होंने छत पर चन्द्रमा को बैठे देखा, उन्हें शक हुआ, ज़रूर कोई बात है...उन्हें देखते ही चन्द्रमा भागने लगा, देवर्षि ने अपना मृगछाला उसपर फेंक कर मारा ...कहते हैं उसी मृगछाले का निशान,  आज तक चाँद पर है....उनकी क्रोधित वाणी, इन्द्र के कानों पर भी पड़ी, वो भी निकल कर भागे..और ऋषिराज गौतम से टकराए, ऋषि ने उन्हें तुरंत नपुंसक हो जाने श्राप दे दिया....और ऐसा ही हुआ...अहल्या की अस्त-व्यस्त अवस्था देख कर देवर्षि सब कुछ समझ ही चुके थे ...अहिल्या को भी पाषाण हो जाने का श्राप दे दिया...परन्तु उन्हें इस बात का भी अनुमान था, कि अहल्या उतनी दोषी नहीं थी, इसलिए इस श्राप से मुक्ति का भी उपाय बता गए थे...दशरथ पुत्र राम के चरण रज जब भी उस पाषण पर पड़ेंगे...वो मुक्त हो जायेगी... और ऐसा ही हुआ ...!

आज भी हमारे समाज में न जाने कितनी निर्दोष अहल्यायें, ऐसे हादसों से गुज़र कर, पत्थर सी ही बनी हुई हैं...

निस्तब्ध रात्रि की नीरवता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
अरुणिमा की उज्ज्वलता सी पडी हूँ
कब आओगे ?
सघन वन की स्तब्धता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
चन्द्र किरण की स्निग्धता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
स्वप्न की स्वप्निलता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
क्षितिज की अधीरता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
सागर की गंभीरता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
प्रार्थना की पवित्रता सी पड़ी हूँ
कब आओगे
हे राम ! तुमने एक अहल्या तो बचा लिया
एक और धरा की विवशता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?


बहार ख़ुदकुशी कर गई, लोग उसे दफ़्न कर आए ....



मौसम फिर से बदला है, हमसफ़र लौट ही आए 
खुशियों का अब सिलसिला, देखें फिर कहाँ जाए

शजर सब्ज़ सा लागे, नज़ारे फिर से मुस्काये  
मगर जो उड़ गए पंछी, कहाँ वो लौट कर आए

अभी कल का मसला है, ये शाखें गुँचा-गुँचा थीं 
बहार ख़ुदकुशी कर गई, लोग उसे दफ़्न कर आए

आँधियाँ भी धमकतीं थीं, उठ रहे थे वो ज़लज़ले
इस संगीन मौसम में, शुक्र है तुम चले आए 

मेरे ख़्वाबों में रातों को, बिजलियाँ कौन्धतीं जातीं  
उतर कर दिल के आँगन में, हज़ारों चाँद गहनाए 

ग़मों की तेज़ धूप हो, और जल जाने का ख़तरा हो 
ख़ुदाया ऐसे में तुझको, मेरी ज़ुल्फों की याद आए  

हमारा क्या, मुसाफ़िर हैं, कहीं भी ठौर पा लेंगे
फ़िक्र अब रास्ता कर ले, कहाँ रुकना, कहाँ जाए 

Tuesday, October 12, 2010

आप सभी को 'हैप्पी थैंक्स गिविंग्स डे '....


थैंक्स गिविंग उत्तरी अमेरिका का एक पारंपरिक त्यौहार है ...आप इसकी तुलना बैसाखी या ओणम से कर सकते हैं...नई फसल के कटने के बाद यह त्यौहार ईश्वर को धन्यवाद देते हुए अपने प्रिय जनों के साथ मनाया जाता है...कनाडा में यह त्यौहार अक्टूबर महीने के दूसरे सोमवार को मनाया जाता है...

ऐसा नहीं है की शुरू से ही थैक्स गिविंग्स त्यौहार इसी दिन मनाया जाता था...और न ही इसे नई फसल के आने की ख़ुशी के लिए मनाया जाता था...सबसे पहले इसे मनाया गया था एक्स्प्लोरर मार्टिन फ्रोबिशर के घर लौट आने की ख़ुशी में...मार्टिन उन दिनों उत्तरी मार्ग की खोज कर रहे थे, जिसके द्वारा प्रशांत महासागर तक पहुँचा जा सकता था...वो इस खोज में सफल होकर घर लौट आए थे और उनकी इस सफलता के लिए 'Newfoundland ' में १५७८ को एक औपचारिक समारोह का आयोजन किया गया और उनके सुरक्षित घर वापस लौट आने के लिए, ईश्वर को धन्यवाद देते हुए थैंक्स गिविंग का त्यौहार मनाया गया था...यह पहला थैंक्स गिविंग त्यौहार था....

लेकिन जनवरी ३१, १९५७ को कनाडियन पार्लिअमेंट ने इसे एक नया ही प्रारूप दे दिया, अब यह त्यौहार नई फसल के स्वागत के लिए स्थापित किया गया, अक्टूबर के महीने तक फसलें कट कर घर में आ जाती हैं...और नए अनाज का प्रयोग शुरू हो जाता है...कनाडियन पार्लिअमेंट में निम्नलिखित घोषणा की गई :
On January 31, 1957, the Canadian Parliament proclaimed:
A Day of General Thanksgiving to Almighty God for the bountiful harvest with which Canada has been blessed … to be observed on the 2nd Monday in October.


और तब से थैंक्स गिविंग्स डे अक्टूबर महीने का दूसरे सोमवार को मनाया जाने लगा...
इस दिन विशेष रूप से टर्की नमाक पक्षी पकाया जाता है...सारे स्टोर्स में टर्की की लूट मची रहती है....मुझे तो बहुत अफ़सोस होता है इस मनमोहक चिड़िया का इस तरह खातमा होना , लेकिन इस दिन मुख्य भोजन यही होता है....




आम तौर पर टर्की को भरवाँ बनाया जाता है ...इसके अन्दर मसालेदार आलू और ब्रेड भरा जाता है, फिर इस मैरिनेट करके बेक किया जाता है....साथ में ..पम्पकिन (सीताफल) पाइ, ब्रेड, मैश किये हुए आलू, ग्रेवी और अन्य मीट के ना ना प्रकार के व्यंजन, रेड वाईन और वाईट वाईन होता है...
आपको बता दूँ कनाडा दुनिया के प्रमुख कृषि प्रधान देशों में से एक है...यहाँ से मुख्यतः गेहूं, मकई, आलू, सूर्यमुखी फूल के बीज, सरसों, दालें, बीन्स इत्यादि दुनिया भर में निर्यात किये जाते हैं...
सब्जियों का निर्यात ज्यादातर प्रोसेस्ड फ़ूड के तौर पर किया जाता है...







कनाडा से उच्च कोटि के रेड वाइन और वाईट वाइन भी निर्यात किये जाते हैं...यहाँ अंगूर की फसल बहुतायत में मिलती है....कई इलाकों में अंगूर के बाग़ मीलों तक फैले हुए नज़र आते हैं...
कनाडा मछली और अण्डों का भी निर्यात करता है...मेपल सिरप कनाडा की अपनी पहचान है...शहद के निर्यात में भी कनाडा अग्रणी है...
जब इतने सारे अच्छे कारण हों तो क्यों नहीं त्यौहार मनाया जाए.. थैंक्स गिविंग्स डे यहाँ की बैसाखी है... जो नई फसल के स्वागत और ईश्वर के धन्यवाद के लिए मनाया जाता है...

आप सभी को मेरी और मेरे परिवार की ओर से 'हैप्पी थैंक्स गिविंग्स डे '....