Wednesday, October 8, 2014

दुर्गा पूजा और माँसाहार .....!

 

कई जगहों पर दुर्गा पूजा के दौरान माँसाहार खाने वालों के लिए छी-छी दुर-दुर होते हुए देखा । लेकिन इस त्योहार में माँसाहार सदियों पुरानी परंपरा है,  हमारे झारखंड-बिहार में आज भी बँगाल का प्रभाव देखने को मिलता है, क्योंकि दुर्गा पूजा का आविर्भाव ही बंगालियों की देन है । आज भी कई घरों में सप्तमी को मछली खा कर अष्टमी का व्रत किया जाता है । इन प्रदेशों में नवमी के दिन तो माँसाहार नितांत आवश्यक है, ग़रीब से ग़रीब इन्सान के घर में माँस पकता ही है । नहीं पकने का तो प्रश्न ही नहीं उठता । नवमी की सुबह मीट की दुकानों में भीड़ सुबह चार बजे से लग जाती है और मीट का भाव बढ़ ही जाता है । 

 

दुर्गा पूजा में मान्यता यह है कि माँ दुर्गा अपने मायके आईं हुईं हैं इसलिए उनके आने की ख़ुशी में खान-पान में कोई कमी नहीं रखी जायेगी । आज भी घर में कोई मेहमान आये तो उसके स्वागत लिए नॉन-वेज बनाना हमारे प्रदेशों की परम्परा है । हमारे घर कोई हमारे जैसा मेहमान आये और हम उसे कढ़ी-चावल या राजमा-चावल परोस दें तो वो दोबारा नहीं आएगा और बदनामी करेगा सो अलग :) अगर ये हमारी सदियों पुरानी परम्पराएँ हैं तो इसपर प्रश्न चिन्ह लगाने वाले दूसरे कौन होते हैं ???? 

 

जो परम्परायें हमें विरासत में मिली हैं उनका निर्वहन हर कोई अपनी-अपनी तरह से और अच्छी तरह से करने की कोशिश करता है । ये सोच लेना कि मेरी परम्परा उसकी परम्परा से बेहतर है और उसे साबित करने के लिए 'व्यंग', 'कटाक्ष', 'नेम कॉलिंग', भला-बुरा कहना मेरे विचार से कहीं ज्यादा 'हिंसात्मक प्रवृति' है । हैरान करने वाली बात यह है कि कुछ लोगों को सिर्फ़ अपनी भावनाओं की ही फ़िक्र रहती है, वो ना तो दूसरों की भावनाओं के बारे में सोचते हैं ना दूसरों की परम्पराओं को सम्मान देने का विचार करते हैं ।

जब मैं छोटी थी तब से मैंने मेरी दादी, चाची, माँ सबको देखा है जीउतिया का व्रत रखने के एक दिन पहले मछली-भात खाते हुए मेरी कुछ बँगाली दादियों को तो छोटी सी ज़िंदा मछली निगलते भी देखा है जीउतिया (अहोई) व्रत करने से पहले, तो क्या उनको 'क्रिमिनल' माना जाएगा ??? या कि वो सारी बेहतर इन्सान ही नहीं थीं ??? मछली को वँश विस्तार का प्रतीक माना गया है और जिउतिया बच्चों लिए ही किया जाता है इसलिए आज भी शादी-विवाह में बँगाल-बिहार-झारखण्ड के कई ईलाकों में इसकी उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है । 

आज भी जीउतिया से एक दिन पहले घर में मछली बनती ही है,  दुर्गा पूजा के सप्तमी को मछली बनती है और नवमी के दिन मीट बनता ही है… अब अहिंसा के पुजारियों दे दो हम सबको फाँसी, क्योंकि हम अगर ज़िंदा रहे तो ऐसा होता ही रहेगा !! 

जापान की ७५% आबादी बौद्ध धर्म का अनुकरण करती है, लेकिन वो सभी माँसाहारी हैं, तो इसका क्या अर्थ हुआ कि वो लोग अच्छे बौद्ध नहीं हैं ?

अंतरजाल पर जब कुछ लिखा जाता है तो वह सिर्फ़ उत्तर भारत या मध्य भारत या दक्षिण भारत के लिए नहीं लिखा जाता है,  या यों कहें सिर्फ भारत के लिए नहीं लिखा जाता, यह पूरे विश्व के लिए लिखा जाता है.…ये सभी परम्पराएँ इन त्योहारों के उद्गम के दिन से ही शुरू हुईं हैं और आज भी विद्यमान हैं । सच्चाई को ज़बरदस्ती नकार देने से साक्ष्य नहीं बदल सकते । 

मैं माँसाहार की हिमायती नहीं हूँ, लेकिन मांसाहारियों के लिए घृणा पालने के पक्ष में भी नहीं हूँ क्योंकि ऐसा हुआ तो मुझे बहुतों से घृणा करनी पड़ेगी, मसलन मेरे माँ-बाप, भाई-बहन, चाचा-चाची, दोस्त-मित्र, मेरे बहुत सारे हिन्दुस्तानी, कैनेडियन, अमेरिकन रिश्तेदारों से.… 

फिर मुझे घृणा करनी होगी ईसा मसीह जैसे पैगम्बर से जिन्होंने माँसाहारी होते हुए भी पूरी दुनिया को प्रेम और शान्ति का सन्देश दिया, मदर टेरेसा से, फिर मुझे घृणा करनी होगी उन सभी हिन्दू ग्रंथों के पात्रों से जो आखेट में जाया करते थे … बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं,  भोजन अपनी पसंद का ही करना चाहिए।

 

बाक़ी भी पढ़ ही लीजिये कैसे हुई थी शुरुआत दुर्गा पूजा की एक बँगाली परिवार द्वारा .…

हाँ नहीं तो !!!

http://www.jagran.com/bihar/rohtas-9777741.html

डेहरी आन-सोन (रोहतास) : शहर में प्रथम दुर्गोत्सव का श्रेय बंगाली परिवार का रहा है। इस परम्परा का इतिहास सौ साल से ज्यादा पुराना है। यहां 1908 में बतौर स्टेशन मास्टर आए मनमुसुनाथ मित्रा ने दुर्गा पूजा की बुनियाद रखी। उन्होंने पाली रेलवे गुमटी अवस्थित देवी मंदिर को शारदीय नवरात्र के दौरान मां दुर्गे की पूजा-अर्चना के लिए चयनित किया। कोलकाता से मूर्तिकार को आमंत्रित किया। उसी मूर्तिकार पुआल के ढांचे पर मिंट्टी की गढ़न से पहली बार मां दुर्गे की प्रतिमा बनाई।

मनमुसुनाथ मित्रा के 95 वर्षीय पुत्र रविन्द्रनाथ मित्रा (एलआईसी के सेवानिवृत्त वरीय प्रबंधक) बताते हैं कि यहां 1956 में रामकृष्ण आश्रम का निर्माण हुआ। तब से दुर्गा पूजा यहां होने लगी। बंगाली समाज तब से यहां लगातार भव्य पूजनोत्सव का आयोजन परंपरागत ढंग से करता आ रहा है। आज भी रामकृष्ण आश्रम की ओर से प्रतिवर्ष पूजा स्मारिका प्रकाशित होती है। इस स्मारिका के विज्ञापन के लिए रामकृष्ण आश्रम से जुड़े युवा काफी मेहनत करते हैं। पितृपक्ष बीतते ही उत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती है। आयोजन को ले कई बैठकें होती हैं। विशेषकर बंगाली परिवार नवरात्र शुरू होने के दस दिन पहले ही उत्सवी रंग में डूबा नजर आता है। इनका उल्लास व भक्ति भाव देख ऐसा लगता है, मानो आप डेहरी में नहीं कोलकाता में हैं।
शारदीय दुर्गोत्सव के अध्यक्ष प्रदीप दास उर्फ गोरा दा बताते हैं कि परंपरा के अनुसार आज भी यहां मूर्तियां कोलकाता से आए मूर्तिकार ही बनाते हैं। इस वर्ष मूर्तिकार बुद्धदेव पाल ने प्रतिमाओं का निर्माण किया है। पुरोहित चंचल राय तथा ढाक बजाने वाले कलाकार भी कोलकाता से आए हैं। प्रतिदिन मां को भोग लगाया जाता है। वे कहते हैं कि संस्थागत पूजा बहुत बाद में शुरू हुई। काफी समय तक सबसे पहले आश्रम की प्रतिमा विसर्जित होती थी उसके बाद ही शहर की दूसरी प्रतिमाओं का नम्बर आता था। आज कल रामकृष्ण आश्रम की पूजा का भार मुख्य रूप से पल्लव कुमार मित्रा, बादल चक्रवर्ती, तपन कुमार डे आदि पर है।
रेल रूट, चूना भट्ठी व रोहू ने लुभाया

दर्जनों बंगाली परिवार के बीसवीं सदी की शुरूआत में डेहरी में बसने की वजह भी कम रोचक नहीं है। उन्हें पश्चिम बंगाल से आवागमन की सहूलियत, उद्योग-धंधे की संभावना तथा खाने में प्रिय मछली की प्रचुर उपलब्धता नजर आई। इस कारण एक-एक कर बंगाली परिवार बसते गए। स्थानीय समाज में खुद तो रचे बसे ही अपनी परम्पराओं व संस्कृति को भी स्वीकार्य बना दिया।
याद दिला दें कि वर्ष 1900 में कोलकाता से दिल्ली को ट्रेन रूट से जोड़ने के लिए महानद सोन पर विश्व के सबसे लम्बे रेल पुल का निर्माण कराया गया। कैमूर पहाड़ी में चूना पत्थर प्रचुर मात्रा में था। इस कारण यहां चूना भट्ठियां स्थापित कर व्यवसाय की बेहतर संभावना थी। दरअसल उस दौर में भंवन निर्माण में चूने का ही इस्तेमाल होता था। इसके अलावा बंगाली परिवार मछली के प्रेमी होते हैं। यहां सोन नद की रेहू मछली स्वाद में बेजोड़ है ही।



http://navbharattimes.indiatimes.com/festivals/-/articleshow/3560541.cms

नवरात्र ऐसा समय है, जब संपूर्ण भारत भक्ति में आकंठ तक डूबा रहता है। मां को प्रसन्न करने का इससे पावन समय साल में दोबारा नहीं मिलता। अपने देश का हर प्रदेश इस दौरान उत्साह और उल्लास से भरपूर रहता है। नवरात्र में मां की पूजा यूं तो हर प्रदेश में अपने ही ढंग से होती है, लेकिन बंगाल की खड़ी के तटवर्ती प्रदेश बंगाल की बात ही कुछ निराली है। आपको शायद यह जानकर आश्चर्य हो कि रसगुल्ले के लिए मशहूर बंगाल में शक्ति स्वरूपा को प्रसाद के रूप में इस मिठाई का भोग नहीं लगाया जाता।

बंगाल में मां दुर्गा की पूजा की शुरुआत षष्ठी से होती है। इसे वहां के लोग 'अकाल बोधन' भी कहते हैं। इसी दिन मूर्ति के आगे से पर्दे को हटाया जाता है और मां की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि मां को अब पंडाल स्थित मूर्ति में आने का निमंत्रण दे दिया गया है। इसके बाद दशमी तक विधि-विधान से मां की आराधना की जाती है। पूजा-अर्चना का सारा काम काम पुरोहित करते हैं। इनकी संख्या एक या दो हो सकती है। इनकी सहायता के लिए बड़ी संख्या में भक्तजन मौजूद रहते हैं। मूर्ति की स्थापना सामान्यतया पंडालों में की जाती है। दिल्ली में यह कार्य कई सोसाइटी भी करती हैं।
प्रसाद

प्रसाद के रूप में षष्ठी को मुख्यत: सूखी मिठाई चढ़ाई जाती है। इनमें बताशा, संदेश, फल आदि रहते हैं। फलों में सेब, केला और अन्य मौसमी फलों की ही अधिकता रहती है। पूजा के फूलों में विदेशी फूलों का कोई स्थान नहीं होता। यही वजह है कि जब आप इनके पंडाल पर जाएंगे, तो गुलाब नहीं दिखेगा। अगरबत्ती, धूपबत्ती, घी आदि से अलग तरह का माहौल पैदा हो जाता है। इस दिन अधिकतर लोग उपवास नहीं रखते। वैसे, चंडी पाठ इसी दिन से शुरू हो जाता है। षष्ठी से ही आरती भी की जाने लगती है। इसके बाद प्रसाद वितरण होता है।

भोजन

बंगाल के लोगों के बीच दुर्गा पूजा को लेकर एक ही मान्यता है कि इस दिन मां अपने मायके आती हैं, तो हमें खुशी मनानी चाहिए। न कि कष्ट उठाकर और खुद को दुखी करके मां की पूजा करें। यही वजह है कि इनके बीच नवरात्र में भी मांसाहारी भोजन पर रोक नहीं होती। दिल्ली में जॉब कर रहीं और मूल रूप से बंगाल की रहने वालीं सोमा और मोनाली बताती हैं, 'हमलोग दुर्गा पूजा में मांस-मछली खाने को अधिक तरजीह देते हैं। जब मां अपने घर आई हैं, तो सभी को उत्साह पूर्वक रहना चाहिए। हां, पूजा में हम कोई विघ्न नहीं होने देते।'

Sunday, August 31, 2014

भारत सेक्स क्रांति के कगार पर!



यह आलेख यहाँ से लिया गया है :


भारत में स्त्री-पुरुषों के संबंधों में जितना बदलाव पिछले दस सालों में आया है उतना शायद पिछले तीन हज़ार सालों में भी नहीं हुआ है. सेक्स अब रज़ाइयों के दायरे से निकल कर बैठकों की दहलीज़ को छू रहा है.
संबंधों का पुराना फ़ार्मूला था पहले शादी, फिर सेक्स और उसके बाद प्यार. नए फ़ार्मूले में सबसे पहले प्यार आता है, फिर सेक्स और सबसे बाद में शादी.
कोलंबिया विश्वविद्यालय से एमबीए कर चुकी इरा त्रिवेदी अपनी किताब "इंडिया इन लव मैरिज एंड सेक्सुअलिटी इन ट्वेंटिएथ सेंचुरी", में कहती हैं कि भारत एक बड़ी सामाजिक क्रांति की दहलीज़ पर बैठा हुआ है. अरेंज्ड शादियाँ कम हो रही हैं, तलाक की दर बढ़ रही रही है, सेक्स और संबंधों के नए प्रतिमानों की न सिर्फ़ खोज हो रही है बल्कि उन पर रोज़ नए-नए परीक्षण भी हो रहे हैं.
इरा का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हैं. वे कहती हैं, "सबसे बड़ा कारण आर्थिक है. भारत में जो आर्थिक उदारवाद और उपभोक्तावाद आया है यह तो उसके पीछे है ही. साथ ही सेक्सुलिटी और विवाह से संबंधित कई कानूनों में भी बदलाव हुए हैं. बाहर के भी प्रभाव पड़े हैं...चाहे वो इंटरनेट हो...या एम टीवी हो. भारत का बहुत तेज़ी से वैश्वीकरण हो रहा है. भारत में जो विदेशी कंपनियां आ रही हैं, वे न सिर्फ़ नौकरियाँ ला रही हैं बल्कि बहुत सारे सांस्कृतिक बदलाव भी ला रही हैं."

प्रीमैरिटल सेक्स कोई नई चीज़ नहीं

डॉक्टर संजय श्रीवास्तव इंस्टीट्यूट ऑफ़ इकॉनॉमिक ग्रोथ में समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख हैं जिन्होंने भारतीय सेक्सुअलिटी पर ख़ासा काम किया है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया, "पहले की फ़िल्मों के बारे में अगर आप सोचें तो पहले हीरो की एक गर्लफ़्रेंड हुआ करती थी, जो उसकी पत्नी नहीं बन सकती थी, क्योंकि पत्नी की छवि एक सती सावित्री जैसी होती थी. अब वह स्थिति नहीं है. कम से कम शहरी इलाकों में अगर लड़की शादी से पहले ब्वॉय फ़्रेंड के साथ रहती है तो उसे ज़िंदगी भर के लिए कलंक नहीं माना जाता. फ़िल्मों में भी अब वैंप का रोल एक तरह से ख़त्म हो गया है क्योंकि जो काम वो पहले किया करती थी वह अब पत्नी करने लगी है... जैसे रेस्तराँ जाना, डांस करना, शराब पीना, सिगरेट पीना... वगैरह-वगैरह."
एक अध्ययन के अनुसार भारत में विवाह पूर्व यौन संबंधों में ज़बरदस्त उछाल देखने में आ रहा है. शैफाली संध्या, "लव विल फ़ॉलो: वाई द इंडियन मैरिज इज़ बर्निंग" में लिखती हैं कि एक अनुमान के मुताबिक शहरी भारत में 18 से 24 वर्ष के एज ब्रैकेट में 75 फ़ीसदी लोगों ने शादी से पूर्व सेक्स का अनुभव किया है.
भारत के जानेमाने सेक्सोलॉजिस्ट डॉक्टर प्रकाश कोठारी का भी मानना है, "विवाह से पूर्व सेक्स कोई नई बात नहीं है. प्राचीन भारत में भी इसके उदाहरण मिलते हैं. मैंने मुंबई में के ई एम अस्पताल में सेक्सुअल मेडिसिन विभाग स्थापित किया था. अब तक मैं पचास हज़ार से ज़्यादा मरीज़ देख चुका हूँ और अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि प्रीमैरिटल सेक्स शहरी भारत के साथ-साथ ग्रामीण भारत में भी है. शहरी भारत में शायद थोड़ा ज़्यादा है."
वे कहते हैं, "एक ज़माना था कि लोग समझते थे कि मोहब्बत की आखिरी मंज़िल हमबिस्तरी हो सकती है और हमबिस्तरी की आख़िरी मंज़िल मोहब्बत होना ज़रूरी नहीं है. अब इस विचार में काफ़ी बदलाव आ चुका है...यानि मोहब्बत कम और उससे आगे की चीज़ ज़्यादा..."

पोर्न देखने में भी भारतीय पीछे नहीं

गूगल के एक सर्वेक्षण के अनुसार ऑनलाइन पोर्नोग्राफ़ी देखने में भारत का स्थान दुनिया में छठा है. इंडिया टुडे के सेक्स सर्वे के अनुसार अहमदाबाद में जबसे ज़्यादा 78 फ़ीसदी लोग (महिला और पुरुष दोनों) ऑनलाइन पोर्न देखते हैं.
कुछ साल पहले भारत में एक कॉमिक सीरीज़ सविता भाभी काफ़ी लोकप्रिय हुई थी जिस पर बाद में भारत सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था. इरा त्रिवेदी का मानना है कि सविता भाभी की सफलता का मूल कारण था कॉमिक का लोकल फ़्लेवर होना जिससे लोग अपने आप को रिलेट कर पाते थे.
वह कहती हैं, "जो सविता भाभी थीं वो गुजराती हाउसवाइफ़ थीं. छोटे शहर में रहती थीं. अपने पति, सास-ससुर और रिश्तेदारों का ख़्याल रखती थीं लेकिन उनकी ज़बर्दस्त सेक्स ड्राइव भी थी. उनके अलग-अलग यौन संबंध होते थे आसपास के लोगों के साथ...किराने वाले के साथ, ब्रा बेचने वाले के साथ...घर आने वाले मेहमानों के साथ...उनका एक पति भी है जो बहुत बोरिंग हैं...हर समय काम करता रहता है. दूसरी तरफ सविता भाभी में काफ़ी सेक्सुअल लिबीडो है."
इरा कहती हैं कि इस कॉमिक सीरीज़ को देखकर कुछ लोग फ़ेंटेसाइज़ ज़रूर करते होंगे लेकिन वास्तव में ये सीरीज़ अधिकतर भारतीयों के सेक्स के प्रति उनके संकोची और असहज दृष्टिकोण का मज़ाक उड़ाती है.

देह व्यापार

समाजशास्त्री केके मुखर्जी और सुतापा मुखर्जी ने 10,000 यौनकर्मियों के बीच किए गए सर्वेक्षण में पाया कि भारत में यौनकर्मियों की संख्या तीस लाख से बढ़कर पचास लाख हो गई है और ये आंकड़े 2006 के हैं.
भारत में वेश्यावृत्ति का पुराना इतिहास रहा है. वीना ओल्डेनबर्ग अपनी किताब 'लाइफ़स्टाइल ऐज़ रेज़िज़टेंस : द केस ऑफ़ कोर्टिज़ांस इन लखनऊ' में लिखती हैं, "1857 के ग़दर में हर चार में से एक ब्रिटिश सैनिक गुप्त रोग से पीड़ित था और इस दौरान लड़ाई से ज़्यादा सैनिक गुप्त रोगों से मरे थे."
इमिग्रेशन अधिकारियों का आकलन है कि हर साल मध्य एशियाई देशों से भारत के लिए जारी किए गए 50,000 वीज़ा में से कम से कम 5000 वीज़ा का संबंध देह व्यापार से होता है.
साल 2011 में जब भारत सरकार ने इन देशों में अपने दूतावासों को दिशा-निर्देश जारी किए कि इस देश से वीज़ा का आवेदन करने वाली 15 से 40 वर्ष का महिलाओं को वीज़ा देते समय बहुत सावधानी बरती जाए, तो कीव में टॉपलेस महिलाओं ने भारतीय दूतावास के सामने बाक़ायदा प्रदर्शन किया.

'अच्छी' लड़की बनाम 'बुरी' लड़की

भारत में आमतौर से लड़कियों के बारे में धारणा है कि वे या तो 'अच्छी' होती हैं या 'बुरी'. कहा जाता है कि 'अच्छी' लड़कियाँ 'सेक्सुअली फ़ोर्थकमिंग' या सक्रिय नहीं होतीं. इरा त्रिवेदी कहती हैं कि भारतीय पुरुष इन तथाकथित 'बुरी' लड़कियों से सेक्स संबंध तो बनाना चाहता है लेकिन जब शादी की बात आती है तो वह तथाकथित 'अच्छी' लड़कियों को ही चुनता है.
डॉक्टर संजय श्रीवास्तव का कहना है कि लोग चाहते हैं कि उनकी पत्नियाँ काम करने वाली भी हों. वह इतना कमाएं कि घर में फ़्रिज हो, गाड़ी हो, एयरकंडीशनर हो... लेकिन वो इतना भी न कमाएं कि बिल्कुल स्वतंत्र हो जाए...या पति से ज़्यादा ही कुछ बन जाएं. भारतीय लोगों को सबसे ज़्यादा वह शादियाँ पसंद हैं जो लव कम अरेंज्ड मैरिज हों. वो घबराते भी हैं कि उन्हें ऐसी पत्नी न मिल जाए जो उन पर हावी हो जाए.
महिला-पुरुष संबंधों में आ रहे बदलाव के बावजूद कुछ चीज़ें ऐसी हैं जिन्हें कोई नहीं बदल सकता. इस विषय पर डॉक्टर प्रकाश कोठारी की राय सबसे अलग है. कोठारी कहते हैं, "मर्द प्यार देता है सेक्स पाने के लिए जबकि औरत सेक्स देती है प्यार पाने के लिए."
डॉक्टर प्रकाश कोठारी कहते हैं, "सेक्स के मामले में भारतीय बहुत भोले हैं. उनकी दिक्कत है कि वे अंधविश्वासों को बहुत तवज्जो देते हैं और सेक्स करते समय बहुत बड़ा मानसिक बोझ लेकर जाते हैं. उनकी सेक्स समस्याएं दो कानों के बीच की हैं न कि दो पैरों के बीच की!"
भारतीय पुरुष अपने शयन कक्ष में कई प्रयोग कर रहा है. डॉक्टर संजय श्रीवास्तव कहते हैं, "वह प्रयोग ज़रूर कर रहा है लेकिन उसे यह डर भी है कि कहीं उसकी पत्नी को इसमें आनंद न आने लगे. अगर ऐसा है तो क्या सचमुच वह ऐसी महिला है जिसे मेरी पत्नी होना चाहिए. उसे आनंद भी चाहिए लेकिन उसे इस बात से परेशानी भी है कि इस चक्कर में उसकी मर्द होने की हैसियत कहीं कम न हो जाए. उसे इस बात की भी आशंका है कि उसकी पत्नी कहीं ऐसी औरत न निकल जाए जिसे उसकी गर्लफ़्रेंड होना चाहिए था."

शादी के विज्ञापनों की भाषा

जहाँ तक शादी की बात है, ताज़ा ट्रेंड जानने हों तो शादी के लिए दिए जाने वाले विज्ञापनों को देखिए. इनके गढ़ने का अंदाज़ और इनकी शब्दावली अलग से एक शोध का विषय हो सकता है.
इरा त्रिवेदी ने कई मैरिज ब्रोकरों को बहुत नज़दीक से काम करते देखा है. वह कहती हैं, "शादी के विज्ञापनों में एक अजीब तरह का विरोधाभास दिखाई देता है. लोग कंज़रवेटिव के साथ-साथ आधुनिक लड़की की मांग करते हैं. अकेले पुत्र होने का मतलब होता है, संपत्ति का उत्तराधिकारी होना. लोग ब्रोकरों से शादी के बारे में इस तरह बात करते हैं जैसे वो कार खरीदने जा रहे हों. पहले जाति पर आधारित बहुत विज्ञापन आते थे लेकिन अब डॉक्टर इंजीनियर और एमबीए जैसे प्रोफ़ेशन भी एक तरह की जाति हो गई है."

लिव-इन संबंध

तमाम बदलावों के बावजूद अविवाहित जोड़ों का साथ रहना अभी भी आम बात नहीं हो पाया है. साल 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसले में लिव-इन संबंधों को वैध घोषित किया था. अदालत का कहना था कि अगर दो विपरीत सेक्स के लोग बिना विवाह किए एक छत के नीचे रहना चाहें तो यह अपराध नहीं है.
लेकिन अभी भी इस चलन को भारतीय अभिभावकों की मान्यता नहीं मिली है. यह सही है कि लोग अपने संबंधों में कई प्रयोग कर रहे हैं.
एक अंग्रेज़ी पत्रिका द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि 94 फ़ीसदी भारतीय अपने संबंधों से "ख़ुश" ज़रूर हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर लोगों का कहना है कि अगर उन्हें दोबारा विकल्प दिया गया तो वह उसी व्यक्ति से शादी करना या किसी से भी शादी करना पसंद नहीं करेंगे.

कहना शायद ग़लत नहीं होगा कि मध्यम वर्ग की सोच में हो रहे बदलाव के कारण पुरुष-महिला संबंधों के नए प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं.

Saturday, August 30, 2014

ज़िक्र होता है जब.... !

आँखें बंद करके सुन रहे हैं हम बस्स्स्स !!



Monday, August 25, 2014

मेरी मासूम हिमाक़त के सिवा कुछ भी नहीं.....




अब दोस्ती, प्यार, चाहत के सिवा कुछ भी नहीं
ज़िन्दगी क्या है मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

अगले जन्मों में मेरे साथ सफ़र का वादा
तेरी इक और शरारत के सिवा कुछ भी नहीं

प्यार औरों को मिला और मेरी क़िस्मत में
एक पत्थर की इबादत के सिवा कुछ भी नहीं

चीरकर सीना मेरा आप तसल्ली कर लें
दिल में आपकी सूरत के सिवा कुछ भी नहीं

अपने हाथों की लकीरों में सजाना तुमको
मेरी मासूम हिमाक़त के सिवा कुछ भी नहीं

ख़्वाहिशे-वस्ल न शिकवे न शिकायत दिल में
आख़िरी दीद की हसरत के सिवा कुछ भी नहीं

ऊँचे क़द वालों से ज़रा फ़ासला ही रख्खो 
वर्ना हाथ आएगी, ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं

ख़्वाहिशे-वस्ल = मिलन की इच्छा