Saturday, May 5, 2012

पथिक, स्वीकार करो प्रणाम...!!


मैं नहीं ! 
अंतिम वृक्ष,
इस प्रीत के मरुस्थल में,
आते हैं अनेक
चिर अजातरिपु,
कर्मयोगी,
इस कुरुक्षेत्र में,
परन्तु...
इस अनंत पथ के
एक किनारे,
मेरी विस्मृत सी छाँव तक
तुम जाने कैसे 
आ पहुँचे हो,
ले लो तनिक विश्राम, 
तत्पश्चात,
संचित कर लो हृदय में
पारिजात सी छवि,
और चन्दन सी स्मृति,
आगे...
नूतन लक्ष्य का,
प्रथम दिवस दे रहा
आह्वान ...
तुम्हें जाना है, पथिक,
स्वीकार करो प्रणाम...!!

वादियाँ मेरा दामन, रास्ते मेरी बाहें....आवाज़ 'अदा' की...

Friday, May 4, 2012

अनावश्यक और अतिरिक्त....!!


चीकट हुई रजाई से,
झाँकती चीकट रूई ।
बिना खोल के,
चीकट तकिया,
बरसों पुरानी,
चीकट चादर ।
भूरे से धब्बे,
कितना गंधाते हैं,
अपनी विवशता बताते हैं ।
सामने दीर्खा पर,
अंग-भंग शंकर की मूर्ति,
टंगा है अलने पर,
मैला-कुचैला,
खद्दर का कुरता ।
ज़ेब में थोड़ी सी रेजगारी,    
टूल पर रखा,
टूटा सा चश्मा,
एक 'अनावश्यक' व्यक्ति
का कमरा,
कुछ ऐसा ही नज़र आता है । 
हर वक्त बताता है,
महसूस कराता है,
तुम, 'अतिरिक्त' हो ...!

भरी दुनिया में आखिर दिल को समझाने कहाँ जाएँ...आवाज़ 'अदा' की ..

Wednesday, May 2, 2012

ज़रुरत है हिंदी साहित्य के विकास के लिए....

'पुरानी प्रविष्टि'
ज़रुरत है हिंदी पुरस्कारों के लिए,
कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की,
एक कवयित्री चाहिए,
जिसका रंग गोरा, 
कद ५ फीट ३ इंच
और बायें गाल पर तिल हो,
जिसने ख़ूब ख़ूबसूरती पाई हो,
और अपनी हर कविता में
मर्दों की, की धुनाई हो,
ऐसा हो तो और अच्छा हो 
कि उसके हर लेख में
नारी शक्ति की ही चर्चा हो,
एक युवा कवि चाहिए
जो लगभग ५५ का हो,
जो भी उसने लिखा हो  
कोई समझ न पाया हो,
चाहे पहले कुछ भी लिखा हो,
पर अब क्षेत्रीयता विरोध अपनाया हो,
साथ ही यह पक्का कर लेना
वो यू.पी., बिहार का जाया हो, 
दलित वर्ग का भी कवि देखो
वह पैदायशी दलित होना चाहिए, 
मोटा-ताज़ा ना हो
दलित ही दिखना चाहिए,
एक और कैटेगोरी आई है
जो धर्म निरपेक्षता कहलाएगी,
इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ 
मुसलमान कवि ही आएगा,
जो अलीगढ़ के आस-पास 
ही पाया जाएगा, 
कैसे भी पकड़ कर लाओ 
उसको हमारे पास,
बस हिन्दू-विरोधी न हो
यह बात होनी है ख़ास,
बाल कवियों की भी श्रेणी है
यह कवि उस जगह पाओगे, 
जहाँ बच्चे ग़ायब होते ज्यादा 
ढूँढने का बस तुम कर लो इरादा,
मझोले कद का हो और शक्ल से
शरीफ लगता हो,
अन्दर से चाहे घाघ हो,
पर ऊपर से ख़ूब जंचता हो,
इतने से ही हमारा सारा काम
अजी चल जाएगा,
वर्ना हिंदी-विकास का कोटा
साफ़-साफ़ रुल जाएगा, 
अरे जल्दी कुछ करो भाई
वर्ना समझो कि शामत आई,
फण्ड अलोकेशन समाप्त होने का 
महीना आया है,
और ट्रेजरी ने भी 
जम कर याद दिलाया है
अगर ये राशि नहीं खर्ची तो,
वो सारे पैसे ले जायेगी
और हिंदी साहित्य पुरस्कार की
नैयाँ ऐवें ही डूब जायेगी,
हिंदी विकास का धंधा 
फिर मंदा हो जाएगा,
और जाने कितनों के 
घर का चूल्हा,
फिर ठंडा हो जाएगा ...

और अब एक गीत 'आपके हसीं रुख पर आज नया नूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है'


Tuesday, May 1, 2012

हर फिकराकस की एक औक़ात होती है.....




मसक जातीं हैं,
अस्मतें,
किसी के फ़िकरों
की चुभन से,
बसते हैं मुझमें भी
हया में सिमटे
आदम और हव्वा,
जो झुकी नज़रों से

देखते हैं,

खुल्द के फल का असर |
दिखाती हैं

सही फ़ितरत, 

इन्सानों की,
उनकी तहज़ीब-ओ-बोलियाँ,
वर्ना पैरहन के नीचे 

सबका सच एक ही होता है ,
मानों...या न मानों
फ़िकरों की भी, ज़ात होती है,
और हर फिकराकस की 
एक औक़ात होती है.....



इतना तो याद है मुझे.....'अदा' की आवाज़...

Sunday, April 29, 2012

ये कैसी नौकरी है जहाँ हर दिन की शुरुआत ही झूठ और फरेब से होती है....

कॉल सेण्टर में काम करने वाली एक नई युवा पीढ़ी की खेप की बाढ़ इन दिनों पूरे देश में आई हुई है ....पश्चिम के सुर में सुर मिलाते हुए और अंग्रेजियत का लबादा ओढ़े हुए कुछ ज्यादा ही अंग्रेज, ये नस्ल अपनी पहचान को खोने में कितनी आतुर नज़र आती  है, देख कर हैरानी होती है....किसी भी कॉल सेण्टर का माहौल बड़ा ही अजीब सा होता है ...जहाँ अंग्रेजियत की बनावटी हवा में देशी पसीने की गंध सब कुछ गडमड करती हुई लगती है....सीधी सी एक कहावत याद आती है ...न घर के न घाट के...ये कैसी नौकरी है जहाँ हर दिन की शुरुआत ही झूठ और फरेब से होती है....

Hello Sir...my name is Mark or Michell or Suzi or John,  calling from New york or Boston or Washington  ...you see sir we are a company giving you best rate for .....blah ..blah..blah...

बेशक नेपथ्य में देशी ठहाके चल रहे हों...कॉल सेण्टर की अपनी ही एक संस्कृति बनती जा रही है...नवजवानों का रात भर काम करना..और जो वो नहीं है...खुद को मान लेना, छद्म  जीवन जीना..
हैरानी की बात यह है कि कोई इस बात पर ध्यान नहीं दे रहा है, कि ये वेदेशी कंपनियां...अपने बिजनेस के लिए हमारी युवा पीढ़ी को एक ऐसा जीवन दे रही है जिसका कोई भविष्य नहीं है....
इस नौकरी में अच्छे पैसे मिलते हैं...इसलिए बच्चे १०-१२ वीं की पढ़ाई करके पैसा कमाने चले जाते हैं....२०,०००-३०,००० हज़ार रुपैये हर महीने कमाते देख माँ-बाप भी खुश और बच्चे भी खुश...आसान काम,
आसान पैसा...
लेकिन सोचने वाली बात ये है कि इस पीढ़ी का भविष्य क्या होगा ...जब इनकी उम्र ४०-५०-६० वर्ष की होगी तो ये क्या करेंगे ? कॉल सेण्टर इनको रखेगा नहीं....qualification इनके पास होगी नहीं ...और दूसरा काम ना जानते हैं, न ये कर पायेंगे...और तब एक दूसरी ही खेप तैयार हो जायेगी...
 
है न सोचने वाली बात ? तो सोचिये....ये विदेशी कंपनियां और कॉल सेंटर्स तो जम कर पैसा कमा रहीं है ...लेकिन साथ ही लगा रहीं हैं वाट हमारी भावी पीढ़ी को....इतनी तादाद में बच्चे इस आसान से फरेबी,  ग्लैमर और न जाने क्या-क्या से अटे से काम में लगे हुए हैं....कल देश में जब सही लोगों की और सही शिल्प की ज़रुरत होगी तो लोग कहाँ से आयेंगे ???... और उससे भी बड़ी बात ये कॉल सेण्टर आज हैं कल ये विदेशी कंपनी इसे उठा कर अपने देश में भी तो ले जा सकते हैं ..फिर का होगा बबुआ...!!!

हाँ नहीं तो..!!

कभी अपनी गर्दन घुमा कर तो देखो...

कुछ नया नहीं लिख पाई हूँ...ये पुरानी पोस्ट है,  मुझे पसंद है...
कविताओं के साथ एक बड़ी समस्या है, लोग फटा-फट सोचने/पूछने लगते हैं..किस पर लिखा है :)
इससे पाहिले कि कोई सोचे/पूछे हम पहिले ही पाठकगणों को बताय देना चाहते हैं...कोई भी इसे अपने ऊपर चिपका कर खामखाह खुस होने की कोसिस न करे, न ही ये सोचे अरे ई ज़रूर फलनवा के लिए लिखा होगा....हाँ नहीं तो..!!

तुम्हें रस्म-ऐ-उल्फत निभानी पड़ेगी,
मुझे अपने दिल से मिटा कर तो देखो

तुम्हें लौट कर फिर से आना ही होगा
मेरे दर से इक बार जाकर तो देखो ।

ज़माने की बातें तो सुनते रहे हो,
ज़माने को अपनी सुना कर तो देखो,

चलो आईने से ज़रा मुँह को मोड़े ,
नज़र में मेरी समा कर तो देखो

तेरे गीत पल-पल मैं गाती रही हूँ,
मेरा गीत तुम गुनगुना कर तो देखो

मैं गुज़रा हुआ इक फ़साना नहीं हूँ
मुझे तुम हकीक़त बना कर तो देखो

तू तक़दीर की जब जगह ले चुका है
मुझे अपनी क़िस्मत बना कर तो देखो

तेरे-मेरे दिल में जो मसला हुआ है,
ये मसला कभी तुम मिटा कर तो देखो

बड़ी देर से तुझपे आँखें टिकी है,
कभी अपनी गर्दन घुमा कर तो देखो

भरोसा दिलाया है जी भर के तुमको
खड़ी है 'अदा' आज़मा कर तो देखो

बस एक धुन ली और गाने की कोशिश की है....