Wednesday, April 4, 2012

नज़र रखें...


अभी पिछले हफ्ते की ही बात है..मेरे बच्चों की दोस्त लीज़ा घर आई थी...खाने पर बुलाया था उसे, इसलिए वो सीधी अपने काम से ही आ गयी थी...लीज़ा एक मेडिकल सेंटर में, अपना co-op  प्रोग्राम कर रही है, उस दिन लीज़ा मुझे बहुत परेशान लग रही थी...उसका सुन्दर चेहरा कुम्हलाया हुआ लग रहा था...वैसे लीज़ा बहुत ही खुश मिजाज़ लड़की है, उसके आते ही घर में रौनक आ जाती है, लेकिन उस दिन वो खामोश थी...मैंने पूछ ही लिया क्या बात है...मेरा इतना पूछना था कि लीज़ा फूट-फूट कर रो पड़ी...

उसने जो बताया वो इस तरह है ...आज उसके मेडिकल सेंटर में एक १३ साल की साउदी बच्ची के बलात्कार का केस आया था, बच्ची बहुत डरी हुई और तकलीफ में थी, उस नाजुक सी बच्ची की हालत देख कर, लीज़ा सकते में आ गयी थी, सारे डॉक्टर्स पूरी सहानुभूति के साथ, उस मासूम की चिकित्सा में लगे हुए थे, पुलिस भी उसके साथ बहुत हमदर्दी से पेश आ रही थी, बच्ची अपनी शारीरिक, मानसिक तकलीफ को झेलते हुए, सबकी बातों का भी जवाब देती जा रही थी....मेडिकल सेंटर के स्टाफ उसे हर तरह का आराम देने की कोशिश में लगे हुए थे..पूरे मेडिकल सेंटर में एक सनसनी, और दुःख का माहौल हो गया था ... 

लेकिन उस बच्ची के माँ-बाप, जो उस वक्त वहीँ थे...अपनी ही बच्ची पर अपना गुस्सा उतार रहे थे, इस हादसे का पूरा दोष, वो अपनी बच्ची को ही दे रहे थे....घायल बच्चे के प्रति, जो भी स्नेह, ममता, सहानुभूति होनी चाहिए, ऐसा कुछ भी न उनके चेहरे पर था न ही उनके व्यवहार में था....उनकी बातों से वो बच्ची और आहत होती जा रही थी, मात्र १३ साल की बच्ची पर, इस तरह गुस्सा उतारना और उसे ही कसूरवार ठहराना, लीज़ा को समझ में नहीं आ रहा था, और यही बात उसे खाए जा रही थी...उसने कहा 'She is a kid, only 13 years old. How come her parents blame her for this mishap.' 

लीज़ा की बात बिलकुल सही है...इस तरह के हादसों के लिए हमेशा, लड़कियों को ही दोष दिया जाता है...चाहे उसकी उम्र जो भी हो...उस बच्ची का पिता यह भूल रहा था...कि ऐसी घिनौनी हरक़त करने वाला, उसी का दोस्त था, जो उसकी दोस्ती की वज़ह से उसके घर आया करता था, क्या यह उसका फ़र्ज़ नहीं था कि वो, दोस्ती सही लोगों के साथ रखता, क्या वो नहीं समझ पाया था कि, उसके दोस्त की नियत कैसी है ? क्या उसे अपने परिवार की सुरक्षा का जिम्मा नहीं लेना चाहिए था ?? 

उस हैवान को सबक सिखाने के लिए, पुलिस का साथ देने के बजाय, उस बच्ची की माँ अपनी क़िस्मत और उस बच्ची को ही कोसती रही, उसने एक बार भी अपनी बच्ची से प्यार से बात नहीं की...ऐसे समय में जब उनकी बच्ची को उसकी सहानुभूति, उसके प्रेम की आवश्यकता है..माँ-बाप दोनों ही अपनी बेवकूफियों और नाकामियों का सारा बोझ उस मासूम पर डाल रहे थे..

मैं पूछती हूँ, क्या माँ-बाप का फ़र्ज़ नहीं बनता, कि वो सोच-समझ कर दोस्ती करें, क्या उनका फ़र्ज़ नहीं बनता कि घर में, किसे आने-जाने का प्रश्रय मिले, इसके बारे में सही फैसला करें ???

आप भी, अपने बच्चों पर तो नज़र रखें ही, उनपर भी नज़र रखें जो आपके घर आते-जाते हैं...फिर चाहे वो आपके कितने ही अभिन्न-मित्र क्यों न हों...आपने अगर अपने घर में, किसी काम से किसी मजदूर को भी बुलाया हो, तो उसपर भी आपकी पूरी नज़र होनी चाहिए...आप नहीं जानते किसकी नियत कैसी है, और कब वो आपको डंस ले... ख़ास करके अगर घर में कोई बच्ची है तो, यह और भी ज़रूरी हो जाता है...जैसे ही आप किसी को अपने घर के अन्दर आने देते हैं...आपका घर अनजाना नहीं रह जाता...और घात लगाने वाले तो इसी मौके की तलाश में रहते हैं...जहाँ तक हो सके, घर के अन्दर तक, उसे ही लाइए, जिसकी नियत और चरित्र पर आपको, अपने आप से ज्यादा विश्वास हो...!!

हाँ नहीं तो..!!



महिलायें 'कम क़ीमत के सामान के लिए, बहुत भारी क़ीमत चुका रही हैं".....


स्त्री-पुरुष विमर्श कोई नया विषय नहीं है, ब्लॉग जगत के लिए ..गाहे-बगाहे इस पर नज़र पड़ती ही रहती है..और अनगिनत बार उठा-पटक हो चुकी है....

अपने देश से दूर दराज़ बैठी, अक्सर सोचती हूँ..कि हमारे देश की महिलाएं कितनी जागरूक हैं...अगर ऐसा नहीं होता तो क्या हम, लक्ष्मीबाई, चाँद बीवी, रज़िया सुलतान, इंदिरा गाँधी, सरोजिनी नायडू और न जाने कितनी वीरांगनायें और महान महिलाओं की वंशज हो पातीं क्या...??  शायद नहीं...!!

फिर भी अभी बहुत कुछ करना है...आम घरों की महिलाएं अगर ज्यादा नहीं, तो कुछ तो पीसी, घुटी आज भी हैं....

दो साल पहले  मैं रांची में थी, और अपनी एक ज़मीन पर, बाउंडरी वाल करवा रही थी...मेरा काम contract पर था...मुझे पता चला कि पुरुष मजदूर की मजदूरी,  महिला मजदूर की मजदूरी से अधिक है...सुन कर कुछ अजीब तो लगा था, फिर भी, यहाँ, बात समझ में आती है, महिला मजदूर शारीरिक रूप से, पुरुष मजदूर से कम शक्तिशाली होती है..इसलिए यह भेद किया गया होगा...क्योंकि मजदूरी के काम में, कुछ ऐसे भी काम होते हैं, जिन्हें शायद महिला मजदूर न कर पाती हों...

वापिस आने के बाद, कहीं एक आर्टिकल पढने को मिला, 'वालमार्ट' (WALMART), जो शायद दुनिया का सबसे बड़ा रिटेल स्टोर है...वहां भी महिलाओं और पुरुषों में wage gap है, मैं उन पदों की बात कर रही हूँ, जिनमें शारीरिक नहीं,  मानसिक काबिलियत की बात होती है, उस पदों पर नियुक्त महिला और पुरुष कर्मी, के वेतन में अगर, भेद-भाव है, तो यह सोचनीय स्थिति होगी ।

'वालमार्ट' जैसी कंपनी इस तरह का, सौतेला व्यवहार किस आधार पर करती है, एक ही तरह के काम के लिए महिला कर्मचारी और पुरुष कर्मचारी की तनख्वाह में भेद कैसे कर सकती है ? यह चौंकाने वाली बात है,  क्योंकि ऐसा व्यवहार, कम से कम इन कंपनियों से अपेक्षित नहीं है... सोचनेवाली बात यह भी है कि, इस नीति के बारे में आम जनता को मालूम भी है ...त्रासदी यह भी है कि, यहाँ की तथाकथित प्रगतिशील सरकार भी, इस बारे में अच्छी तरह जानती है, फिर भी उनका, अपने कान में तेल डाल कर बैठे रहने की वजह, समझ में नहीं आता ??...हैरानी भी होती है कि,  ये उन्नत देश इस तरह की, अन्यायपूर्ण मानसिकता न सिर्फ रखते हैं, उनको धड़ल्ले से अभ्यास में भी लाते हैं... और अग्रणी देश भी कहाते हैं....वाह...!!!

वालमार्ट के विरुद्ध, एक क्लास सूट भी कोर्ट में डाला गया था, जिसे वहाँ की सुप्रीम कोर्ट ने, सीधे से ख़ारिज कर दिया...कारण बताया गया कि, एक साथ हज़ारों हज़ार  Employee,  इतना बड़ा क्लास सूट नहीं कर सकते, लेकिन इस कारण के पीछे, जो असली कारण,  समझ में आता है, वो ये होगा, अगर वालमार्ट के Employee केस जीत जाते तो, वालमार्ट के पास सिवा Bankrupt होने के और कोई विकल्प नहीं होता....जो बहुत बड़ा  नुक्सान होता, अमेरिका के लिए...कुछ भी हो, वालमार्ट बिलियन्स डालर्स का बिजिनेस तो लाता ही है बाहर से, अपने देश में....सुप्रीम कोर्ट का ऐसा एकतरफा फैसला लेना, ये भी साबित करता ही है, कि वाल मार्ट,  अमेरिकन सुप्रीम कोर्ट तक को, अपनी आस्तीन में रखता है....

वालमार्ट के ८०% कर्मचारी, महिलाएं हैं..जिनको पुरुषों की अपेक्षा, कम तनख्वाह मिलती है और प्रोमोशन के लिए भी अधिक इंतज़ार करना पड़ता है...

वालमार्ट, भूलता है कि, आज वो अगर, दुनिया में, सबसे बड़े रिटेलर होने की, गद्दी पर बैठा है, वो उसे वहाँ तक पहुंचाने के लिए, महिलाओं ने ही अपना खून-पसीना बहाया है...और राज़ की बात ये भी है, कि इस ८०%  महिला कर्मचारियों में,  ९०% महिलाएं विजिबल माइनोरिटी की हैं...अर्थात, हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी, अफ्रीका मूल की या अन्य देशों की महिलाएं....

आप विश्वास कीजिये, इन देशों के, किसी भी वालमार्ट में आप चले जाएँ...आपको महिला कर्मचारी ज्यादा नज़र आयेंगीं...उनमें से अधिकतर महिला कर्मचारी, भारतीय मूल की ही होंगी....मतलब ये हुआ कि, हमारी बहनें, सिर्फ भारत में ही दोयम दर्ज़ा नहीं पा रहीं, भारत से बाहर भी सेकेंड ग्रेड सिटिज़न हैं...इसमें कोई शक नहीं, हमारी, महिलायें 'कम क़ीमत के सामान के लिए, बहुत भारी क़ीमत चुका रही हैं".....

हाँ नहीं तो..!!

Tuesday, April 3, 2012

'बोल्ड' पोस्ट...???

आज एक पोस्ट पढने को मिली,  मुझे नहीं मालूम वो गद्य है या पद्य,  न ही मैं स्वयं को इस काबिल समझती हूँ, कि किसी कविता की संरचना, विधा पर टिप्पणी करूँ, लेकिन आज वहाँ, जिस तरीके से, जो बात कही गयी है...कहीं से भी, अच्छी नहीं लगी...विषय और उसकी प्रस्तुति, दोनों ही अश्लील हैं...

टिप्पणी कर चुकी हूँ वहाँ, उस पोस्ट पर....शायद लेखिका व्यस्त होंगी...अभी तक नहीं छपी है मेरी टिप्पणी...मेरे यहाँ अभी सुबह हुई है...इसलिए सोचा एक पोस्ट लिख ही दूँ...


अगर यही पोस्ट किसी पुरुष ने लिखा होता, तो आज यहाँ, नारीवादिता पत्थर बरसा रही होती...लेकिन इतनी सहजता से इस अश्लीलता को,  लोग न सिर्फ सहन कर गए, हौसला भी बढ़ा गए ...क्या सिर्फ इसलिए कि यह किसी नारी ने लिखा है...???????

मैं इस पोस्ट की भर्त्सना करती हूँ...

हालांकि इसे मुद्दा बना कर मैं इस पोस्ट को महत्व ही देने की गलती कर रही हूँ...लेकिन मुझे मेरा विरोध भी दर्ज करना है...हाँ नहीं तो..!! 

पोस्ट का पता नीचे है...


 http://vandana-zindagi.blogspot.in/2012/04/blog-post_02.html


Monday, April 2, 2012

सिंगल मदर...( लघुकथा )


अगर सोचो तो, चलने की प्रक्रिया, कितनी सहज लगती है,पहले एक पाँव आगे रखो, फिर दूसरा, पहला पाँव फिर खुद ही, उठ कर आगे पहुँच जाता है, न दूसरा पाँव कभी सोचता, कि पहला पाँव कैसे रखा था, और न ही पहला पाँव, कभी दूसरे पाँव से कुछ पूछता है...ठीक वैसे ही, बाप के गुण बेटे में कब और कैसे आ जाते हैं, कहाँ पता चलता है...वो तो बस आ जाते हैं...


रात के २.३० बजे हैं, अभी अभी वो हॉस्पिटल से लौटी है, बाथरूम में आईने के सामने खड़ी होकर, वो सोच रही है, पहले और अब के चेहरे में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है....उन दिनों, आईने में उसका चेहरा, एब्सट्रैक्ट पेंटिंग की तरह लगा करता था, जिसपर उसके पति द्वारा भरे गए काले, नीले, लाल रंग होते थे, और अब भी वो एब्सट्रैक्ट पेंटिंग ही लगता है, फर्क सिर्फ इतना है, अब रंगों की जगह, वक्त के थपेड़ों और जीवन की गुत्थियों की सारी लकीरों ने, ले ली है..


शादी के बाद ही उसे पता चल गया था कि, पति के हाथों से पीटने के लिए, कोई विशेष कारण का होना आवश्यक नहीं...अगर पालक में हल्दी डाल दे, तो पिट जाती है, कि पालक में हल्दी क्यूँ डाली, न डाले तो पिट जाती है, के पालक में हल्दी क्यों नहीं डाली, पति के आक्रोश की वजह जो भी हो, पिटना उसे ही होता था, दो बच्चे हो चुके थे, अब बड़ा बेटा १६ साल का था, और छोटा १२ साल का...


धीरे-धीरे उसने पेंटिंग बनना, अस्वीकार कर दिया, और उस घर की दीवार से, खुद को उतार लिया .. कठिन था सब कुछ, बहुत कठिन, बच्चे कहाँ समझ पाए थे, ऐसा क्यूँ हुआ था..??


अब तो, ७ साल हो गए उसे सिंगल मदर बने हुए, उसने अपनी कोशिश में कोई कमी नहीं रखी, लेकिन हर काम अकेले करना भी, कौन सा आसान है, जब तक बच्चे छोटे थे, समस्याएं, काबू में थीं...बढ़ते लड़कों की अपनी समस्याएं होतीं हैं, जिनको पिता ही समझ सकता है, लेकिन उसके घर में, पिता जैसी चीज़ है भी कहाँ, वही है अकेली, पिता भी और माता भी,  कारण जो भी था, बड़ा बेटा आज तक अपनी माँ को ही, दोषी मानता रहा, उनके तलाक़ के लिए, किसी दूसरे पुरुष से, वो अपनी माँ को, बात भी करते हुए देख लेता...तो अन्दर तक उबल जाता है, टीनेज बच्चों को पालना अकेली माँ के लिए, आसान नहीं होता, उनके शारीरिक परिवर्तन की समस्याएं, उनके होम वर्क, उनके एक्स्ट्रा करीकुलर एक्टिविटी, उनकी इच्छाएं, उनकी कुंठाएं, सब कुछ तो होता हैं, आखिर वो अपने आप में, एक पूरा जीवन जो होते हैं...इन बच्चों के जीवन के साथ-साथ, उसका अपना जीवन, अपनी समस्याएं, घर का काम, नाते-रिश्ते, सामाजिक जिम्मेदारियां और नौकरी, कुलमिला कर, वो खुद को आकंठ डूबी हुई पाती है, अपने आप में और अपने बच्चों में...

कल उसे अपने 'unit की programming ' हर हाल में पूरी कर देनी है, सबके units , testing  में कल पहुँच जाने हैं, उसे एक module में प्रॉब्लम हो रही है, इसलिए आज उसने विशी को बुलाया है घर पर ही, C ++  में मास्टर है वो, विशी समय से आ गया था, उसे उम्मीद थी कि काम, दो-तीन घंटे का होगा, लेकिन बात उतनी सिम्पल नहीं थी, जितना उसने सोचा था, काम करते-करते रात हो ही गयी, और विशी को उसे डिनर, ऑफर करना ही पड़ा..आखिर ९-३० बजे काम ख़त्म हुआ और विशी चला गया...


कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है, आज इतिहास ने खुद को दोहराने की दिशा में पहला कदम रखा है...आज उसे लगा कि, क्रोध, आक्रोश वंशानुगत बीमारियाँ भी हो सकतीं हैं, आज उसे अपने बड़े बेटे में भी यही लक्षण, बहुत साफ़-साफ़ परिलक्षित हुए थे, बिलकुल उसके बाप की तरह...'रात के ११ बजे, म्यूजिक इतनी तेज़ क्यूँ बजाते हो, बस इतना ही तो कहा था, उसने अपने १६ साल के बेटे से ...और उसी पल उसने, अपने १६ साल के बेटे को, अपने पिता में तब्दील होते हुए देखा, १६-१७ साल के लड़के डील-डौल में भी कम नहीं होते, ये तो अच्छा हुआ कि वो झट से झुक गयी थी, वर्ना बेटे का घूंसा, उसके चेहरे पर ही पड़ना था, घूंसा शीशे की खिड़की तोड़कर, बाहर निकल गया था, और बेटे के हाथ पर शीशे ने लम्बा चीरा लगा दिया, इतना खून देख कर उसका कलेजा मुँह को आ गया था, आखिर था तो वो उसका बेटा ही...और वो, एक अदद माँ....सबकुछ भूल कर उसने, अपने बेटे को समेटा था....भाग कर वो उसे अस्पताल ले कर गयी थी, १२ टाँके लगे हैं, डॉक्टोर्स को बात कुछ जम नहीं रही थी, डॉक्टर ने तो एक पुलिसवाला भी बुला लिया था, उन्हें शक हो रहा था, बात ज़रूर कुछ और है, वो उससे बार-बार पूछते रहे थे, क्या हुआ था, और एक ही झूठ, वो बार-बार कहती रही...मेरे जूतों से उलझ कर मेरा बेटा गिर पड़ा था...

अब वो सोच रही है...क्या झूठ बोल कर, उसने अपने बेटे को सचमुच बचा लिया ? नहीं ! मुझे इतिहास को बदलना होगा, इस 'अब्यूस' को यहीं रोकना होगा, कल ही वो पुलिस को, सबकुछ बता देगी, उसके बेटे को उसकी मदद चाहिए, अभी ही सही समय है, बाद में देर हो जायेगी, और यही एक तरीका है, दूसरा कोई नहीं, यही सही रास्ता भी है, शायद बेटे को Juvenile Detention में रखा जायेगा, अब रखा जाएगा तो रखा जाएगा, क्या कर सकते हैं, वर्ना इस शुरुआत का अंत कहाँ होगा ? बहुत ज्यादा क्रोध, बीमारी है और हाथ उठाना 'अब्यूस', इसका इलाज होना ही चाहिए, समय रहते अगर बेटा ठीक हो गया, तो शायद, कहीं एक और कैनवास बच जाएगा, रंगे जाने से....मन में एक विश्वास लिए, वो हो गयी बिस्तर के हवाले, कल शायद होगी, एक नयी सुबह  !!


वोई तो..!!

छोटी-छोटी बातें...!!


मेरी एक सहेली का, मायका और ससुराल हमारे ही शहर में है, मेरी जैसी के लिए, ये बहुत ही बड़ी बात है, मुझे तो अपने मायके और ससुराल दोनों से मिलने के लिए, सात समुन्दर पार जाना पड़ता है, कम से कम १५ दिन की छुट्टी, चाहिए होती है, जिसमें से, आने जाने में ही ५ दिन निकल जाते हैं, बाकी के दस दिन, भाग-भाग कर मिलने का कार्यक्रम होता है, और हिल जाता है, पूरा बजट...हाँ नहीं तो..!! फिर भी जो ख़ुशी मिलती है, उसकी तुलना में ये सारी बातें कोई मायने नहीं रखतीं हैं..

खैर, तो बात हो रही थी, मैं और मेरी सहेली की...एक दिन हम साथ-साथ शौपिंग करने गए, लौटते वक्त हमदोनों उसके मायके भी चले गए, अभी बैठे हुए कुछ ही देर हुई थी, कि मेरी सहेली की माता जी आ गयीं, आते साथ ही उन्होंने ने मेरी सहेली के, सारे ससुराल वालों को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया, सास-ससुर, ननद, देवर, जेठ किसी को भी नहीं छोड़ा, यहाँ तक कि मेरी सहेली को भी डांटने लगीं, कि तुमने अपनी ननद को फलाँ चीज़ क्यूँ दी, अपनी सास को पैसे क्यूँ दिए...इत्यादि-इत्यादि, 
मैं सारी बातें सुन कर स्तब्ध थी, और मेरी सहेली एम्बेरेस्ड, वो क़ातर नज़रों से मेरी तरफ देख रही थी, उसकी आँखों में मुझे अपने मायके ले कर आने का पछतावा साफ़ झलक रहा था...

मुझे मेरी सहेली की माता जी की बातें, बिलकुल भी पसंद नहीं आयीं, लगा, बच्चों की पहली गुरु तो माँ ही होती है, और अगर बुनियाद की पहली ईंट ही, सही नहीं पड़े तो ईमारत का क्या कसूर !! इसीलिए सोचा, अपना यह अनुभव आप लोगों से साझा कर लूँ, आखिर हममें से भी तो, कितनी माएँ हैं, और शायद कुछ बेटियों की ही माँ हों, कम से कम मैं तो हूँ ही...

हर माँ को अपनी बेटी को, ससुराल में मिल-जुल कर रहने की ही सीख देनी चाहिए, ना कि घृणा और कटुता के बीज बो कर, रहना बताना चाहिए...

बहुत सारी युवतियाँ, ऐसी ही स्थिति से गुज़रती हैं, जो बुद्धिमानी और विवेक से काम लेती हैं, उनका जीवन शांति से बितता है, लेकिन कुछ ऐसी भी होती होंगी, जो इस तरह की गलत सीख को अपनाती हैं और जीवन में मुसीबत मोल ले लेती हैं, खुद तो परेशान रहतीं ही हैं..घर की सुख-शान्ति भी समाप्त कर देतीं हैं...

इसलिए समझदार माँओं को चाहिए, कि अपनी बेटियों को छोटी-छोटी बातों को, नज़रंदाज़ करने की सीख दें और ससुराल में सहयोगात्मक रवैय्ये के साथ, हंसी-ख़ुशी रहने को प्रेरित करें...

Sunday, April 1, 2012

वो सेकेण्ड बेस्ट ही है...


एक गाना बहुत पहले सुना करते थे 'कितना आसाँ है कहना भूल जाओ...कितना मुश्किल मगर है भूल जाना '..आज समाज में जितनी सकारात्मकता तलाक़ को दी जा रही है, उतना ही कम ध्यान शादी पर दिया जा रहा है, जोड़ों में सहिष्णुता की बहुत कमी होती जा रही है, छोटी-छोटी बातों का सोल्यूशन लोग तलाक़ में ढूँढने लगे हैं...जबकि, अंततोगत्वा ये एक समस्या हो सकती है, समाधान नहीं...

कोई भी आपको कभी नहीं बतायेगा, कि तलाक़ में बिखरे हुए जीवन की आवाज़ आपको, आपके जीवन के अंतिम क्षणों तक सुनाई पड़ेगी, आपको ये ज़रूर बताया जाएगा, कि यह एक कठिन फैसला होता है, इससे गुज़रना बहुत दुखद अनुभव होता है, शायद यह दुनिया के टॉप दुखों में से एक होता है...लेकिन इसका असर कितना गहरा होता है, ये आपको कोई नहीं बतायेगा, तलाक़ सिर्फ दो व्यक्तियों के, जुदा होने का नाम नहीं है, इस एक हादसे से दरक जाते हैं, कितने ही आने वाले पल...

जब-जब भी आप देखेंगी, अपने दोस्तों, माँ-बाप, रिश्तेदारों को शादी की साल गिरह मनाते, कहीं न कहीं आपके अन्दर कुछ न कुछ टूटेगा,  जब आप ये देखेंगी की आपके माँ-बाप ने ५० साल या ६० साल अपना विवाहित जीवन जीया है, आपके मन में एक अपराध-बोध तो आ ही जाएगा, शादी से समाज में एक सम्मान तो मिलता ही है, बच्चों में सुरक्षा की भावना बनी रहती है, तलाक़ के साथ सबसे पहले आप, अपने बच्चों का विश्वास खो देते हैं, उनका विश्वास उसी दम टूट जाता है.. आपके बच्चे आपको, निडर और साहसी देखना चाहते हैं, एक हारा हुआ इंसान नहीं, और तलाक़ भगोड़ों का काम है, यह कमज़ोरी की निशानी है, जीवन की परेशानियों से भागने का नाम तलाक़ है, और ऐसा व्यक्ति कभी भी मज़बूत नहीं माना जाएगा, न ही अनुकरणीय...

दूसरी तरफ, तलाक से बच्चे, सिर्फ माँ-बाप नहीं खोते, वो खो देते हैं, घर , परिवार, पारिवारिक जीवन की निरंतरता, अपने जन्म से लेकर उस समय तक की जीवन यात्रा, वो खोते है अपना आराम और अपनी सुरक्षा...दरअसल, तलाक़ के बाद आप अपने बच्चों को वो सुरक्षा दे ही नहीं पाते, जो आपको, अपने माता-पिता से, बिना किसी शर्त के मिली होती है...और जिसके लिए आप अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञं रहते हैं, सारी उम्र... 

विवाह कितना भी अपूर्ण हो, पूर्णता का अहसास कराता है, विवाह में, सिर्फ अच्छे पलों को तलाशना स्वार्थ होगा....क्योंकि जीवन ही खट्टे-मीठे अनुभवों का मिश्रण है, और शादी जीवन का ही हिस्सा है, आप अपने बच्चों का जन्मदिन मनाते हैं, उनका Graduation , उनकी उपलब्धियां, अपनी निराशाएं, अपनी सफलताएं, बच्चों की शादी, और अनगिनत उतार-चढ़ाव जीवन के...कुछ अच्छे लम्हें और कुछ बुरे वक्त, अपने साथी के साथ एन्जॉय करते हैं, या साथ-साथ भुगत लेते हैं, जिसका अपना ही एक संतोष होता है...

सुखी दाम्पत्य जीवन, सिर्फ हर तरह के सुख-साधन का होना नहीं होता, वो निर्भर करता है एक दूसरे के प्रति विश्वास, निस्वार्थ प्रेम और एक दूसरे की ख़ुशी के लिए त्याग करने में ...
हर तलाक़ को देखने के बाद मेरा विश्वास,  विवाह पर और बढ़ जाता है, क्योंकि आज तक मैंने किसी भी तलाक़ में, जीवन की परेशानियों का जवाब नहीं पाया ...नहीं देखा तलाक़ के बाद, किसी भी आँगन में  सच्ची ख़ुशी को, हाँ ये ज़रूर देखा है, जुदा होने का फैसला सिर्फ दो इंसानों का होता है, लेकिन तबाह कई जिंदगियां होतीं हैं, विडंबना, ये भी होती है, कि हम किसी को अपनी ज़िन्दगी से निकाल कर सोचते हैं, वो चला/चली  गया/गयी, लेकिन ऐसा होता नहीं है, वो कभी नहीं जाता/जाती,  सिर्फ यादें धुंधली हो जातीं हैं, वो कभी मिटती नहीं हैं...

एक बात और, तलाक़ के बाद अगर आप फिर से घर बसाते हैं, आपका साथी कितना भी परफेक्ट हो, होता वो सेकेण्ड बेस्ट ही है... 

हाँ नहीं तो..!!