Tuesday, November 9, 2010

ज़रुरत है हिंदी साहित्य के विकास के लिए...

ज़रुरत है हिंदी पुरस्कारों के लिए,
कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की,
एक कवयित्री चाहिए,
जिसका रंग गोरा, 
कद ५ फीट ३ इंच
और बायें गाल पर तिल हो,
जिसने ख़ूब ख़ूबसूरती पाई हो,
और अपनी हर कविता में
मर्दों की, की धुनाई हो,
ऐसा हो तो और अच्छा हो 
कि उसके हर लेख में
नारी शक्ति की चर्चा हो,
एक युवा कवि चाहिए
जो लगभग ५५ का हो,
जो भी उसने लिखा हो  
कोई समझ न पाया हो,
चाहे पहले कुछ भी लिखा हो,
पर अब क्षेत्रीयता विरोध अपनाया हो,
साथ ही यह पक्का कर लेना
वो यू.पी., बिहार का जाया हो, 
दलित वर्ग का भी कवि देखो
वह पैदायशी दलित होना चाहिए, 
मोटा-ताज़ा ना हो
दलित ही दिखना चाहिए,
एक और कैटेगोरी आई है
जो धर्म निरपेक्षता कहलाएगी,
इसमें सिर्फ़ और सिर्फ़ 
मुसलमान कवि ही आएगा,
जो अलीगढ़ के आस-पास 
ही पाया जाएगा, 
कैसे भी पकड़ कर लाओ 
उसको हमारे पास,
बस हिन्दू-विरोधी न हो
यह बात होनी है ख़ास,
बाल कवियों की भी श्रेणी है
यह कवि उस जगह पाओगे, 
जहाँ बच्चे ग़ायब होते ज्यादा 
ढूँढने का बस तुम कर लो इरादा,
मझोले कद का हो और शक्ल से
शरीफ लगता हो,
अन्दर से चाहे घाघ हो,
पर ऊपर से ख़ूब जंचता हो,
इतने से ही हमारा सारा काम
अजी चल जाएगा,
वर्ना हिंदी-विकास का कोटा
साफ़-साफ़ रुल जाएगा, 
अरे जल्दी कुछ करो भाई
वर्ना समझो कि शामत आई,
फण्ड अलोकेशन समाप्त होने का 
महीना आया है,
और ट्रेजरी ने भी 
जम कर याद दिलाया है
अगर ये राशि नहीं खर्ची तो,
वो सारे पैसे ले जायेगी
और हिंदी साहित्य पुरस्कार की
नैयाँ ऐवें ही डूब जायेगी,
हिंदी विकास का धंधा 
फिर मंदा हो जाएगा,
और जाने कितनों के 
घर का चूल्हा,
भी ठंडा हो जाएगा ...


Sunday, November 7, 2010

अप्रत्याशित दुर्घटना .....!!!!!


सुना है,  
शायद... आज वो पकड़ी गई...
उसका नकारा पति, आवारा देवर, और वहशी ससुर 
उसे बाल से पकड़ कर घसीटते हुए ले आये होंगे
लात, घूसे, जूते से मारा होगा  
सास की दहकती आँखें,
उस दहकते हुए सरिये से कहाँ कम रही  होगी,
उसका मुंह बाँध दिया गया होगा,
आवाज़ हलक में हलाक़ हो गई होगी,
दहकता हुआ सरिया नर्म चमड़ी पर,
अनगिनत बार फिसल गया होगा,
दाग दो साली नीपूती, कुलटा को,
आँखों में दहशत, 
काठ बन गई होगी, 
कुलच्छिनी, कमीनी, वेश्या,
घर की इज्ज़त बर्बाद कर दी है...
इसका ख़त्म हो जाना ही बेहतर है ..
यही फैसला हुआ होगा 
और फिर सबने उसे उठा कर फेंक दिया होगा...
रसोई घर में...
तीन बोतल किरासन तेल में, 
उसके सपने, अरमान, विश्वास, आस्था 
सब डूब मरे होंगे,
पहली बार उत्तेजित.. उसके पति ने, 
जिसकी इज्ज़त से वो खेलती रही थी !!
ने दियासलाई सुलगा दी होगी...
स्थिर आँखों से उसने अपने पति को देखा होगा
"काश !!"
फिर छटपटाती आँखों से उसने पूछा भी  होगा
'क्यों' ??

किसी ज़िबह होते जानवर सी वो घिघियाई होगी 
नज़रों के सामने कितनी रातें तैर गयीं होंगी
जब उसने खुद को तलहटी तक नीचे गिराया था ..
काँपा तो होगा हाथ उसके पति का...
पर उससे क्या ???
आज वो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट बन गई, 
'कुँवारी' बताया है उसे..!!
सुबह, एक और रिपोर्ट आई थी...डाक्टर की
जो रसोई घर में घटित ....
इस अप्रत्याशित दुखद दुर्घटना 
में जल कर राख हो गई....!!!


Friday, November 5, 2010

मंगल दीप जले....!


मेरे सभी मित्रों एवं पाठकों को दीपोत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएं...!

हम सभी भाग्यवान हैं...जो अंतरजाल जैसी सुविधा मिली है....दूर होते हुए भी आपस में निकटता बढ़ी है....कम से कम मन से तो बहुत पास हैं, हम सभी....इस निजता को और निखारते हुए, कुछ बहुत ही अच्छा कर जायेंगे तो आने वाली पीढ़ी कृतज्ञ रहेगी हमारी.....तो आज इस प्रकाश पर्व में इस शुभ काम की शुरुआत करते हैं....आइये न...!!
इसी भावना को सामने रखते हुए मेरी यह कविता समर्पित है....आपको..आपको...और आपको भी...
स्वीकार कीजिये ...!!!!

जन जन के धूमिल प्राणों में
मंगल दीप जले

तन का मंगल, मन का मंगल
विकल प्राण जीवन का मंगल
आकुल जन-तन के अंतर में
जीवन ज्योत जले
मंगल दीप जले

विष का पंक ह्रदय से धो ले
मानव पहले मानव हो ले
दर्प की छाया मानवता को
और ना व्यर्थ छले
मंगल दीप जले

आज अहम् तू तज दे प्राणी
झूठा मान तेरा अभिमानी
आत्मा तेरी अमर हो जाए
काया धूल मिले
मंगल दीप जले


Thursday, November 4, 2010

ऐ बेटा, तनी डोरवा तो बंद कर दो...तनी राइस्वा तो लीजिये

 
संस्कृति, संवेदना, शिष्टाचार, सभ्यता ...ये मानवीय मूल्य हैं ...किसी एक देश की थाती नहीं है...
ऐसा नहीं है कि सिर्फ हमारा देश ही इसमें अग्रणी है...बहुत से देश है....ज़रुरत है अपने सामान्य ज्ञान को पजाने की ....

हम बस  इसी ठसक में जीते रहते हैं कि हम सोने की चिड़िया वाले देश के हैं....हमारी संस्कृति के आगे किसी की संस्कृति नहीं है.....लेकिन पारिवारिक मूल्य बहुत से देशों में, बहुत मज़बूत है...मसलन  कनाडा, इटली, फ़्रांस, मक्सिको, ethiopia वैगेरह वैगेरह ...दरअसल इन मूल्यों को दरकिनार किया ही नहीं जा सकता ..कारण स्पष्ट है 'मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है'...

कहा जाता है कि फिल्में अक्सर समाज का दर्पण होती हैं..और सच पूछिए तो कितनी ही बातों को उजागर कर जातीं हैं...बहुत पहले एक फिल्म देखी थी 'father of the bride ' उसे देख कर लगा था.. ये सब कुछ तो हमारे देश के जैसा ही तो है...ठीक उसी तरह लड़की का पिता खर्चे से परेशान, ठीक उसी तरह फरमाईश की फेहरिश्त....ठीक वैसा ही पिता का खुद पर कम से कम खर्च करने की कोशिश करना...कहने का मतलब ये है कि बेटी का बाप...जहाँ का भी हो बिलकुल वैसा ही होता है...जैसा होना चाहिए...

इन देशों में भी अपने बच्चों के प्रति माता-पिता का बहुत प्रेम देखने को मिलता है ...हाँ हमलोगों की  तरह अँधा प्रेम नहीं होता है...आखिर हर किसी को अपना जीवन जीना ही पड़ता है तो फिर समय से उसे जीवन की  सच्चाई से दो-चार करा देने में बुराई क्या है...और यही यहाँ के माँ-बाप करते हैं...१८ वर्ष का जब बच्चा हो जाता है, उसे दुनिया में संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते हैं..

संस्कृति का ह्रास भारत में जितनी तेज़ी से हो रहा है शायद अन्य किसी भी देशों में नहीं हो रहा है ....आप खुद अपने आस-पास देख लीजिये....पाश्चात्य सभ्यता को गाली देने वाले लोगों के ही घरों में देखिये ...क्या वो सभी उसी के ग्लैमर में नहीं चौन्धियाये हुए हैं....कहने को तो सभी बढ़-चढ़ कर विदेशों और विदेशी सभ्यता को गाली देते हैं, लेकिन पहला मौका मिलते ही ..विदेशी बन जाते हैं....घर बाहर, अन्दर भीतर सब जगह पश्चिमी लबादा ओढ़े ही लोग मिलेंगे....बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढाना,  अंग्रेजी पहनावा, अंग्रेजी स्टाइल में रहना......ये जिम, ये McDonald, ये फास्ट फ़ूड...हज़ारों बातें....ये माल, ये flyover ...नक़ल करने में हमारा देश सबसे आगे है....लेकिन पलट कर गाली देने में भी कम नहीं है.... शुक्र मानिए कि विदेशों के दर्शन की वजह से कुछ अच्छी बातें हो रहीं हैं...मसलन रेलवे stations अब बहुत साफ़ हैं...लोगों में civic sense में बढ़ोतरी हुई है... विदेशी कम्पनियों के कारण काम करने के माहौल में फर्क आ रहा है...लोग समय के पाबन्द हो रहे हैं...याद कीजिये जब  बैंको से  अपना पैसा निकालने के लिए घंटों लाइन में खड़े होना पड़ता था......शुक्र हैं विदेशी बैंकों का जिन्होंने ...ऐसे ऐसे timings और facilities दी कि भारतीय बैंकों को नाकों चने चबवा दिए...अब उनके कॉम्पिटिशन की वजह से ये भी सुधर रहे हैं....

हमलोग कितने अजीब हैं...अपने बच्चों को अंग्रेजी बोलते देख ख़ुश होते हैं.....घर में अंग्रेजी बहू आ जाए तो ...गर्व से सीना चौड़ा कर लेते हैं .....विदेश का वीजा मिल जावे तो फट से हवाई जहाज में बैठ जावें, भारत में,  बेशक उनके बच्चे सारा दिन अंग्रेजी में गिटिर-पिटिर करते रहें....और अंजेलिना जोली-ब्रैड पिट बने घूम रहे हों...लेकिन गाली ज़रूर देंगे...अंग्रेजी सभ्यता को ...

क्यों नहीं हम इनकी सिर्फ़ अच्छाईयों को अपनाते हैं, मसलन  ईमानदारी, समय की पाबन्दी, कानून को मानना...सोचने वाली बात ये हैं कि वैसे ही हमारे समाज में भ्रष्टाचार, चोरी, घूसखोरी, पाखण्ड जैसी बीमारियाँ तो हैं ही, इनके भी दुर्गुण अगर हम अपना लेवेंगे तो क्या हाल होगा हमारा और हमारे समाज का..

हम तो हैरान थे देख कर...जब निपट देहात में लोग कहते हैं....'ऐ बेटा, तनी डोरवा तो बंद कर दो'  या फिर 'तनी राइस्वा तो लीजिये'   
शायद भारतीयता का अर्थ अब 'दोहरापन' हो गया है...हाँ नहीं तो...!!
 
 

Tuesday, November 2, 2010

कर लो जो भी करना है....!


सीने में ...
इक दाग़ लगा था
जो,
अब दिल बन बैठा है
लत लगवा दी,
जान-बूझ कर
और कहा 
जीवन इक समझौता है
आवाज़ मेरी धोखे से
क़ैद कर ली पाबंदियों ने,
अब भी बन्द हैं
मेरे ख़्वाब
बस इक काजल की डिब्बी में 
अगर...
यही विरासत है मेरी
तो.....
बिटिया मुझसे ये नहीं पाएगी
पंख लगा कर वो उड़ेगी
लाखों ख़्वाब सजाएगी
साँस लेगी, चहकेगी वो
निर्मल सरिता सा बहना है
पाबन्दी-वाबंदी वालों
कर लो जो भी करना है....!

मेरे बाबा की तबियत अब बहुत अच्छी है...हमलोगों ने बहुत सारी बातें की...वो बहुत ख़ुश हैं...हम सभी बहुत ख़ुश हैं ...माँ की गोद, बाबा का आशीर्वाद, और बच्चों की ऊंट-पटाँग बातें...इतनी व्यस्तता के बीच, ये समय अनमोल बीत रहा है....हमलोगों ने अन्ताक्षरी खेली...हा हा हा...मेरी माँ की पसंद का ये गीत, माँ को सुनाया था...सोचा आपलोग भी फिर से सुन लें...

Monday, November 1, 2010

माना कि दरिया में कई क़तरे होते हैं.....


माना कि...
दरिया में कई क़तरे होते हैं,
पर दरिया को मालूम कहाँ,
कितने क़तरे होते हैं,
दरिया के बग़ैर क़तरे की,
न कोई हकीक़त, न ही वज़ूद
फिर भी तेवर लिए हुए,
ये क़तरे होते हैं,
मिटने का ग़ुरूर कहें
या कहें किस्मत इनकी, 
बस ज़ज्ब-दरिया में 
फ़ना क़तरे होते है,
क़तरे से दरिया का
रिश्ता है अजीब,
नाचीज़ क़तरे होते हैं,
जब दरिया से जुदा होते हैं
बेताबी दरिया की,
अब क्या बताये 'अदा'
दरिया का अंजाम भी तो
आख़िर क़तरे होते हैं !!