Friday, October 22, 2010

बाबर- एक समलैंगिक शराबी बाल-उत्पीड़क....



आज मैंने एक आलेख पढ़ा और पढ़ कर लगा कि आपको भी इसे पढ़ना ही चाहिए....कुछ सच्चाइयाँ जितनी जल्दी सामने आयें उतना ही अच्छा है....
मैं अग्निवीर साहब की शुक्रगुजार हूँ उन्होंने मुझे इसे अपने ब्लॉग पर छापने की अनुमति दी है...
यह पूरा आलेख सभार लिया गया है, निम्नलिखित लिंक से :
  • अगर किसी को अग्निवीर [Agniveer] से पूछना होगा कि हिन्दू मुस्लिम की एकजुटता की सबसे बड़ी घटना क्या रही है? तो इसका उत्तर स्पष्ट और साफ है। मैं रोमिला थापर या डी.एन. झा की तरह एक पेशेवर इतिहासकार नहीं हूँ। मैं मुहम्मद बिन कासिम, गोरी, गजनी, अलाउद्दीन खिलजी, मुगल और नादिर शाह इत्यादि कला के प्रेमियों की तरह भारत पर हमलों के सदियों के गवाह भी नहीं हूँ। इसलिए हो सकता है कि मेरे पास इस्लाम के जन्म के पिछले 1400 वर्षों में हिन्दू मुस्लिम एकता के उदाहरण और अध्यायों के सभी प्रकरणों की पूरी जानकारी नहीं है।
    इस प्रकार मैं इस बहस में भी नहीं जाना चाहूँगा कि भारत में इस्लाम तलवार के बल पर फैला है या नहीं जैसा कि हिंदु ‘कट्टरपंथियों’ का आरोप है या पश्चिम एशिया के आदिवासी आक्रमणकारियों के कलात्मक प्रदर्शनों के माध्यम से इस्लाम फैला जैसा कि जाकिर नाइकों[zakir naiks] और JNU के ‘धर्मनिरपेक्ष’ इतिहासकारों का दावा है।लेकिन मैं कुछ भी आसानी से फिर से याद नहीं दिला सकता जो कि हिंदू और मुसलमानों के एकजुटता का सबसे अनुकरणीय प्रकरण की इस घटना को पार कर जाये। हैरान मत होइए। मैं 6 दिसंबर 1992 के शुभ दिन पर बाबरी मस्जिद के विध्वंस की बात कर रहा हूँ। यह वह भव्य दिन था जब हजारों सज्जन दिल वाले देशप्रेमी हिंदुओं ने उस संरचना को नष्ट कर दिया जो कि भारत और इस्लाम के लिए सदियों से सबसे बड़ा अपमान था। उन्होने यह सब अदालतों में कई सालों तक दर्दनाक परीक्षण[trial], सभी मीडिया माफिया [जो कि इस देश पर राज करती है] के द्वारा निन्दा और राजनैतिक/सामाजिक/सांस्कृतिक जुल्मों कि कीमत पर किया। लेकिन इन सब खतरों के बावजूद , वे आगे बढ़े और उस कलंक को नष्ट कर दिया जो कि मुसलमानों के द्वारा बहुत पहले ही नष्ट कर दिया जाना चाहिए था।
    -मैं सरकार से यह अपील करना चाहूँगा कि वो आधिकारिक तौर पर 6 दिसंबर को हिंदु-मुस्लिम एकता दिवस या अभिमान दिवस या वीरता दिवस के रूप में घोषित करे-
    रुको…रुको…रुको! आप में से कुछ लोग यह सोच रहे होंगे कि अग्निवीर पागल हो गए हैं या शैतान कि तरह हिंदुओं द्वारा इस्लाम के इबादत की जगह कि बर्बादी के दिन को हिंदु-मुस्लिम एकता का दिन घोषित कर रहें हैं! आप शायद इस ऊटपटांग लगने वाले बयान के लिए स्पष्टीकरण की मांग कर रहे होंगे। जो कि आ रहा है। आगे पढ़िए।
    -मैं इस बहस में नहीं जाऊँगा कि क्या सचमें उसी बाबरी मस्जिद कि जगह पर एक राम मन्दिर था या नहीं।-
    -मैं इस बहस में भी नहीं जाऊँगा कि संपूर्ण मानवता के महानतम आदर्श श्री राम असल में यहाँ जन्में थे या कहीं और।-
    -मैं इस पर भी बहस नहीं करूँगा कि यहाँ राम मन्दिर का निर्माण होना चाहिए या एक अस्पताल बनाया जाना चाहिए, जैसा कि कई बुद्धिजीवियों का सुझाव हैं।-
    ये वे बिन्दु हैं जो कि मुद्दे से पूरे हटकर हैं। दुर्भाग्य से ये ही वे बिन्दु रहे हैं जिनपर सालों तक समय बर्बाद किया गया और ये अब भी जारी है।
    –सत्य तो यह है कि यदि कोई यह सिद्ध भी कर दे कि इस जगह पर कोई मन्दिर नहीं था या राम किसी दूसरे देश में पैदा हुए थे फिर भी बाबरी मस्जिद भारत की आज़ादी के समय ही नष्ट होने के बिल्कुल लायक ही थी।– कार सेवकों ने तो वही काम किया था जो कि सरकार को 45 साल पहले कर देना चाहिए था।
    और कारण यह है कि बाबरी मस्जिद कोई मस्जिद नहीं ही है। क्योंकि बाबर कोई मुस्लिम था ही नहीं। वह लंबे समय से ही मारा जा चुका होता यदि वह आज किसी भी मुस्लिम देश में जिन्दा होता!
    हकीकत में बाबर इस्लाम के नाम पर एक कलंक था। बाबर को बेहतर तरीके से जानने के लिए चलिये हम हिंदु ‘कट्टरपंथियों’ या पक्षपाती ‘right-winged’ इतिहासकारों पर आश्रित नहीं होएँ। इसके बजाए क्यों ना घोड़े के मुख से ही सुन लें। चलिये हम बाबर की आत्मकथा ‘बाबरनामा’ की ही समीक्षा करें जो सभी प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध है।
    इस लेख के प्रयोजन के लिए हम Annette Susannah Beveridge द्वारा अंग्रेजी अनुवाद 1922 में प्रकाशित का उल्लेख करेंगे। यह अनुवाद, उपलब्ध असली तुर्की पांडुलिपि[turkish manuscript] से किआ गया था। ये बाबर के असली चरित्र उद्घाटित करने के लिए पर्याप्त है। आप इसकी scanned कॉपी ttp://www.archive.org/details/baburnama017152mbp
    इस पते से download कर सकते हैं।
     
    बाबर- एक समलैंगिक शराबी बाल-उत्पीड़क[child molester] :-
    आत्मकथा साफ़ तौर से सिद्ध करती है कि बाबर एक समलैंगिक शराबी बाल-यौन-उत्पीड़क था। अतः वे लोग जो बाबरी मस्जिद के समर्थक है उन्हे सबसे पहले यह स्पष्ट रूप से समझाना चाहिए कि क्या इस्लाम समलैंगिकता और बाल-यौन-उत्पीड़न को मंजूरी देता है? यही नहीं, तो बाबर इस्लाम के नाम पर कलंक था और इसीलिए जो भी ढाँचा उसके द्वारा बनवाया गया था वह भी इस्लाम के नाम में कलंक है।
    [1] आत्मकथा के पृष्ठ 120-121 में वह कहता है कि उसे अपनी बीवी में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी लेकिन बाबरी नाम के एक लड़के पर वह पागल हो गया था। वह कबूलता है कि वह किसी और को इतना प्यार नहीं करता है जैसे वह इस लड़के के लिए पागल था। वह लड़के के प्यार में कविताएँ लिखता था। जैसे – “कोई नहीं है आशिक, मुझे छोडकर, जो कि इतना दुखी भावुक और अपमानित है। और मेरे आशिक से ज्यादा बेरहम और मनहूस कोई भी नहीं है !” “There has been no lover except me who is so sad, passionate and insulted. And there is no one more cruel and wretched than my lover!”
    [2] वह कहता है कि बाबरी उसके ‘करीब’ आया करता था जिससे बाबर इतना उत्तेजित[excited] हो जाता था कि वह एक शब्द भी नहीं निकाल पाता था। क्योंकि नशे धुत्त होने के कारण वह बाबरी से उसके प्यार के लिए शुक्रिया भी नहीं बोल सकता था ।
    [3] एक बार बाबर अपने दोस्तों के साथ घूम रहा था जब बाबरी एक गली में उसके सामने आया। बाबर कि जबान बंद हो गई और वह उसे उत्तेजना के कारण देख तक नहीं सका । उसने कहा [naratted]- “मैं शर्मिंदा हो जाता हूँ मेरे आशिक को देखकर। मेरे दोस्त मुझे कपट से देखते हैं और मैं किसी और को देखता हूँ” ”I get embarrassed looking at my lover. My friends leer at me and I leer someone else.”
    [4] वह मानता है कि जुनून और जवानी कि इच्छा में[passion and desire of youth] वह पागल हो गया था और नंगे सिर और नंगे पैर घूमा करता था बिना किसी दूसरी चीज़ देखे।
    [5] वह लिखता है – “मैं उत्तेजना और जुनून में पागल हो जाता हूँ। मई यह नहीं सोच सकता था कि आशिकों को इसका सामना करना पड़ता है। मैं तुमसे दूर नहीं जा सका, ना ही मैं ऊँचे दर्जे कि उत्तेजना के कारण तुम्हारे साथ रह सकता हूँ । तुमने मुझे पूरी तरह से पागल कर दिया है , ओ मेरे [मर्द] आशिक !”
    अब ये बिना किसी संदेह के साबित है कि:-
    [अ] बाबर और उसका गिरोह समलैंगिक और बाल-उत्पीड़क [child molesters] थे। इन के लिए सजा के रूप में इस्लामी शरीयत के अनुसार, मौत है [death by stoning]। यह आज भी प्रचलित है इस्लामी देशों में।
    [ब] बाबरी मस्जिद बाबर के sex पार्टनर की याद में बना ढाँचा है और कुछ नहीं।
    क्या इस्लाम किसी sex perverts के द्वारा बनाया गया या उसके नाम पर बनाया गए स्मारक को मस्जिद मानता है? या शर्म का प्रतीक ?
    अतः यह साफ है कि बाबरी मस्जिद समलैंगिकता और बाल-उत्पीड़न का प्रतीक है और कुछ नहीं । मैं यह नही जानता कि इस विध्वंस के पीछे किन लोगों का हाथ था। पर जो भी वे हों , उन्होने हिंदुओं और मुसलमानों के लिए शर्म के ढांचे को नष्ट कर दिया है।
    -यह सबसे ज्यादा शर्म कि बात है कि जो ढाँचा ‘भारत की sexual perverts द्वारा हार’ का प्रतीक है उसे विरासत स्थल [heritage site] समझा जाता था। अगर ऐसा है तो शायद मुम्बई सीएसटी, जहाँ पाकिस्तानी आतंकवादियों ने खुलेआम मासूम लोगों पर फ़ाइरिंग की थी , वह ‘कसाब भूमि’ नामक नया विरासत स्थल[heritage] होगा !
    #बाबर – बर्बर हत्यारा, लुटेरा, बलात्कारी, शराबी और drug-addict :-
    (केवल बाबर के इस बर्बर अश्लील आत्मकथा से कुछ नमूने प्रदान की जा रही है क्योंकि यह बहुत क्रूर और विस्तृत रूप से पढ़ने के लिए अशिष्ट है.)
    -पृष्ठ 232: वह लिखता है कि उसके गिरोह ने उन लोगों के सर काट दिये जो उसके पास संघर्ष विराम के लिए आए थे , और फिर इन सिरों से एक स्तंभ बनाया। ऐसा ही करतब Hangu में दोहराया गया था, जहां 200 अफगानी सिर एक स्तंभ बनाने के लिए मारे गए थे।
    -पृष्ठ 370: क्योंकि बजौर के लोग इस्लाम पर विश्वास नहीं करते थे, इसीलिए 3000 से भी ज्यादा लोगों कि हत्या कर दी गई और उनके बीवियों और बच्चों को बन्दी बनाकर रख लिया गया।
    -पृष्ठ 371– जीत कि खबर फैलाने के लिए कब्जा किए गए बंदियों के बहुत सारे कटे हुए सिरों को Kabutl, Balkh और दूसरी जगहों पर भेजा गया।
    -पृष्ठ 371– जीत का जश्न मनाने के लिए कटे हुए बहुत से सिरों से एक खम्बा बनाया गया।
    -पृष्ठ 371– ‘मुहर्रम के दिन एक शराब पार्टी हुई जहाँ पर हमने पूरी रात पिया’। (अनुवाद करने वाला यहाँ टिप्पणी करता है कि बाबर अपने अंतिम समय तक बहुत ज्यादा शराबी था) Baburnama का एक बड़ा भाग इन शराब पार्टियों वर्णन करता है।
    -पृष्ठ 373– बाबर ऐसे नशीले पदार्थ लेता था कि वह एक बार अपने नमाज के लिए भी नहीं जा सका। वह आगे लिखता है कि यदि वह उन नशीले पदार्थ को आज लेता तो वह आधे नशे को भी पैदा नहीं कर पाता।
    पृष्ठ 374– बाबर ने अपने वैश्यालय कि कई औरतों से कई बच्चे पैदा किए थे। उसकी पहली बीवी ने उन सभी नाजायज औलादों को अपनाने का वादा किया, जब भी वो भविष्य में जन्में, क्योंकि उसकी कोख से जन्में कई सारे बच्चे जिंदा नहीं रह सके। ऐसा लगता है कि बाबर का वेश्यालय चिकन उत्पादन के लिए एक पोल्ट्री फार्म के जैसे था !
    -पृष्ठ 385-388– बाबर हुमायूँ के जन्म से इतना खुश हो गया कि वह अपने दोस्तों के साथ नाव में गया और पूरी रात शाराब पिया और नशीले पदार्थों को खाया। फिर वे सभी शराब के नशे में झगड़ने लगे और पार्टी खतम हो गई। एक ऐसी ही पार्टी के बाद, उसने बहुत उल्टी कर दी और सुबह तक सब कुछ भूल गया।
    -पृष्ठ 527– आगरा के एक गुंबददार इमारत के खंबेदार बरामदे में एक पार्टी दी गई थी (ताज महल कि ओर संकेत कर रहें है जिसका नाम शाहजहाँ से गलती से जोड़ा जाता है)।
    बाबर कि आत्मकथा के लगभग सभी पन्नों में यही लिखा है कि कैसे उसने लूटपाट की, धमकी दी, हत्या की, और जहाँ भी वो गया लूटपाट किया और ‘हराम’ वाला मांस खाया। यहाँ ध्यान देना कि जिस तरह से बाबर अपनी आत्मकथा में यह सब लिख रहा है इसका यही तात्पर्य है कि वह इन सब कामों पर गर्व करता था।
    और जिन दूसरे अपराधों का ज़िक्र उसने अपने आत्म-प्रशंसा करने वाले आत्म-कथा में नहीं किया उनकी कल्पना करके आप काँप सकते हैं।
    सारांश :-
    [अ] बाबर सबकुछ था लेकिन इस्लाम का अनुयायी नहीं। उसके कुकर्म किसी भी इंसान को इंसानियत के लिए शर्म और कलंक बना सकते हैं। और यदि वास्तव में कोई विकृत पुरुष बाबर को अभी भी उनके द्वारा इस्लाम की परिभाषा से मुस्लिम करार देता है , तो फिर इस्लाम कि उस परिभाषा से घिनौना और कुछ भी नहीं हो सकता।
    [ब] बाबरी मस्जिद , जो कि बाबर के समलिंगी साथी बाबरी के नाम पर राखी गई थी, एक खूनी और बलात्कारी के यौन विकृति का प्रतीक है। इसे ‘विरासत’ कहना और जिन लोगों ने ‘बर्बर विकृति’ का ऐसे प्रतीक को नष्ट किया , उन्हे फँसाना यही साबित करता है हम इतिहास के मामले में कितने नीच बन चुके हैं। उस परिवार के बारे क्या कहा जा सकता है जो ऐसे व्यक्ति को आदर देता है जो कि अपने ‘माँ’ के साथ बलात्कार करता है , उसकी महिमा का वर्णन करने के लिए उसे अपने पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाते हैं और ऐसे स्थलों की रक्षा करने का संकल्प लेते हैं जो उन बलात्कारों की घटनाओं से संबंधित है। (कठोर भाषा के लिए खेद है, लेकिन इससे बेहतर इस लूट के काम को कुछ अलग तरीके से समझाया नहीं जा सकता। )
    [स] मुसलमानों को आरएसएस/वीएचपी और उन सभी ‘सही’ पक्ष वालों के दल में सम्मिलित हो जाना चाहिए जिन्होने इस ‘शर्म’ के प्रतीक को नष्ट करने में हिस्सा लिया ,जो की इस्लाम के नाम पर सदियों से कलंक था।
    [द] मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस करने का एक बड़ा मौका खो दिया और अपने ‘अमन’ और ‘चरित्र’ के मज़हब की सुरक्षा करने के लिए ‘सही’ ताकतों पर आश्रित होना पड़ा। -लेकिन अब उन्हे मथुरा और कांशी में स्थित दो और ‘शर्म’ के प्रतीकों, फिर बाद में सेक्स के पागलों द्वारा निर्मित मस्जिदों और मक़बरों, जो की आतंकवादी,बर्बर,हत्यारे और अपराधी शासकों जैसे- मुहम्मद बिन कासिम और उसके बाद के औरंगजेब, शाहजहाँ, अकबर, हुमायूं, जहांगीर आदि के द्वारा बनवाए गए थे , को नष्ट करने के लिए सक्रीय हो जाना चाहिए ।
    [ई] बाबर की आत्मकथा इस बात का पर्याप्त उदाहरण है कि भारत में इस्लाम कैसे फैला। आदर्श यही होगा कि भारत के सभी मुस्लिम पागल आक्रमणकारियों द्वारा लाये गए पंथ को छोडकर अपने मूल धर्म – मानवता का धर्म – वैदिक धर्म में वापस लौट आयें ।
    लेकिन यदि गलत सूचनाओं के साथ प्रचलित सामाजिक/राजनीतिक/आर्थिक मजबूरी के कारण यह करना थोड़ा ज्यादा जल्दी है तो भी उन्हे :-
    –इस भ्रम में रहना बन्द कर दीजिये कि इस्लाम तलवार के अलावा किसी और विधि से फैला है और अपने आपको उन पागल लुटेरों और आतंकवादियों के विकृत दुष्कर्मों के साथ जोड़ना बन्द कर दीजिये । और यह कि यदि मुस्लिम ,मुस्लिम ही बने रहना चाहते हैं, तो भी कम से कम, इन अपराधीयों को मुस्लिम और सभ्य पूर्वज कहना बन्द कर दो। इसके बजाए हमारे सच्चे महान पूर्वजों जैसे श्री राम और कृष्ण को खुद से जोड़ो ।
    –उन मस्जिदों और मक़बरों में जाना बन्द कर दो जो उन पागल आतंकवादियों द्वारा बनाए गए थे।
    –ऐसा विश्वास करना बन्द कर दो कि इन मानसिक रोगियों ने कोई कलात्मक भवनों का निर्माण किया था और यह एहसास करो कि ये सभी स्मारक जो कि इन आक्रमणकारियों द्वारा बनाए गए थे असल में प्राचीन भवन थे जिनको उन लोगों ने कब्ज़ा किया था ।
    —और आखिरकार , सबसे ताकतवर अल्लाह का अपमान करने वाले उन आतंकवादियों द्वारा बनाए गए सभी मस्जिदों को तबाह करने के लिये आंदोलन की शुरुआत करो। काशी और मथुरा अच्छी शुरुआत होगी।
    मै सभी मुस्लिम भाइयों और बहनों से अपील करता हूँ कि इन ‘सही’ ताकतों से हाथ मिलाइए जिन्होने इस्लाम के नाम पर कलंक- बाबरी मस्जिद को नेस्तेनाबूत किया । और इस हिंदु-मुस्लिम एकता के महानतम उदाहरण को एक कदम आगे बढ़ाएं ।
    ये ‘सही’ ताक़तें मुसलमानों के सबसे बड़े दोस्त और देश के सच्चे देशभक्त हैं।
    मै सभी हिंदुओं और मुसलमानों से यह भी अपील करता हूँ कि 6 दिसम्बर को ‘प्रतिष्ठा दिवस’(इज्ज़त का दिन) या ‘हिंदु-मुस्लिम एकता दिवस’ या ‘राष्ट्रीय विजय दिवस’ के रूप में सक्रियता से मनाना शुरू कर दीजिये। मुस्लिम इस दिन को ‘इस्लाम की शोभा का दिन’ की तरह भी पालन कर सकते हैं।
    वन्दे मातरम ।

अंग्रेजी मईया की किरपा....



इस बात में दो राय नहीं  कि हिंदी की दुर्दशा दिखाई देती है, कारण सिर्फ बाजारवाद नहीं, अंग्रेजी की चमक इतनी तेज़ है कि लोग उससे बच नहीं पाते...और हमारी सरकार भी छीछा-लेदर  करने से बाज़ नहीं आती, हिंदी के उत्थान की आवश्यकता, उतनी नहीं है जितनी उसे दिल से अपनाने की है, हिंदी आज शक़ के घेरे में है, हिंदी पर अब लोगों को विश्वास नहीं है, अपनी बात हिंदी में कहने में लोग कतराते हैं....उन्हें ये लगता है कि सामने वाले पर धौंस ज़माना हो, तो बात हिंदी में नहीं, अंग्रेजी में करो...और सच्चाई भी यही है...जो बात आप हिंदी में कहते हैं, वो कम असर करती, और जैसे ही आपने अंग्रेजी में बात करनी शुरू की, आपका स्तर सामने वाले की नज़र में एकदम से उछाल मारता है ...बेशक आपने अंग्रेजी की टांग ही तोड़ कर रख दी हो....ब्लॉग जगत में भी अंग्रेजी के वड्डे-वड्डे तीर चलते हुए देखा है, और लोगों को चारों खाने चित्त होते हुए भी...हाँ, तो हम बात कर रहे थे, इसी फार्मूले की...ये मेरा आजमाया हुआ फ़ॉर्मूला है...कसम से हम कहते हैं, एकदम सुपट काम करता है..
पेशे ख़िदमत है एक आपबीती  ...

मैं रांची में थी और मुझे इन्टनेट कनेक्शन चाहिए था ...उसके लिए जाने क्या-क्या कार्ड्स चाहिए थे और मेरे पास वो कार्ड्स नहीं हैं, ख़ैर मेरी दोस्त उर्सुला ने मेरा उद्धार करने की सोची ...उसने आवेदन दिया, हमलोगों ने टाटा का फ्लैश ड्राइव खरीदा और कनेक्शन के लिए हमलोगों से ये वादा किया गया कि दूसरे दिन तक हो जाएगा ...मैं अपना लैपटॉप लेकर तैयार बैठी थी...दूसरे दिन दोपहर तक कनेक्शन का नाम-ओ-निशाँ नहीं था...मैंने फ़ोन लगाया उसी जगह जहाँ से इन्टरनेट कनेक्शन लिया था ...उनका कहना था कि आपको कनेक्शन इसलिए नहीं मिला, क्योंकि हम पता का सत्यापन अर्थात एड्रेस वेरिफिकेशन के लिए गए थे लेकिन वहाँ कोई नहीं था...मेरा अगला सवाल था आप कब गए थे वेरिफिकेशन के लिए ...उन्होंने जवाब दिया जी ११ बजे के क़रीब गए थे....मैंने तपाक एक और सवाल दागा..आप इस वक्त कहाँ हैं ...उनका जवाब था जी हम तो ऑफिस में हैं...मैंने कहा अभी कितने बज रहे हैं ...उन्होंने कहा जी १२.३० ...मैंने कहा आप ऑफिस में क्यों हैं...आपको तो घर पर होना चाहिए था...वो बन्दा कुछ उलझा-उलझा सा हो गया...कहने लगा क्यों मैम घर पर क्यों, मैंने कहा कि मुझे लगा आप भी वेले ही बैठे हो.. तो घर में रहो...क्योंकि अगर आप ११ बजे एड्रेस वेरिफिकेशन के लिए किसी के घर जाते हो...और ये उम्मीद करते हो कि वो घर में ही पलंग पर बैठा हो...तो बंदा तो वेल्ला ही होगा न...वर्ना शरीफ लोग जो नौकरी-चाकरी करते हैं, वो तो ९ बजे ही दफ़्तर पहुँच जाते हैं न ! बन्दा समझदार था...समझ गया था कि ग़लत जगह पंगा ले रहा है...कहने लगा मैम आपकी बात सही है...लेकिन मैं तो बस एक मुलाजिम हूँ...आप क्यों नहीं हमारे मैनेजर से बात करती हैं...मैंने कहा, बच्चे, अब मैं मनेजर नहीं मैनेजिंग डाइरेक्टर से बात करुँगी...अब मुझे उनका फ़ोन नम्बर दो...ख़ैर उसने मुझे एम्.डी. का नंबर दिया, मैंने फ़ोन किया और जब तक मैं हिंदी में बात करती रही, एम्. डी. साहेब मुझे टहलाते रहे, उनकी बन्दर गुलाटी देख मैंने भी अपना रंग बदलने की  सोची....और जैसे ही मैंने अपना रंग बदला, वो मुझे सिरिअसली लेने लगे, फिर मैंने वो अंग्रेजी झाड़ी कि उन्हें भी लगने लगा ...I can leave angrej behind  ...मेरा इन्टरनेट कनेक्शन १५ मिनट में लगा ..बिना तथाकथित एड्रेस वेरिफिकेशन के, यही नहीं एम्.डी. साहब ने पूरे समय मेरा इंतज़ार किया फ़ोन पर, जब तक मेरा इंटरनेट कनेक्शन...ऊ का कहते हैं कि कनेक्टेड नहीं हो गया....और तो और दूसरे दिन, फिर तीसरे दिन भी फ़ोन करके पूछा कि सब ठीक-ठाक चल रहा है न...!
तो ई है जी अंग्रेजी मईया की किरपा....
हाँ नहीं तो..!

Thursday, October 21, 2010

'शाही' इमाम ....



कल एक समाचार पर नज़र पड़ी..जहाँ 'शाही इमाम' अपना कुछ मंतव्य रख रहे थे...समाचार जो भी था वो तो जाने दीजिये, लेकिन इस नाम पर ही मेरी आँखें ठहर गई और मेरी सोच की चक्की चल पड़ी... हमारी समझ में ये बात नहीं आ रही थी कि ये 'शाही इमाम' कौन हैं भला...भारत एक लोकतंत्र देश है...अब न तो यहाँ बादशाह हैं, न शाह, न शाहज़ादे और न ही राजा-रजवाड़े ...फिर ये 'शाही' शब्द का तात्पर्य क्या हुआ ? आदरणीय 'शाही' इमाम अहमद शाह बुखारी, सिर्फ़ जनता के इमाम हैं और लोकतंत्र में रहते हैं ...'शाही' शब्द ही अटपटा लगा था मुझे ...जब बादशाह नहीं रहे, फिर 'शाही' जैसी उपाधि का क्या अवचित्य है भला... और इससे भी बड़ी बात यह उपाधि उन्हें मिली कहाँ से ? किस शाह ने दी है ? 

इस नाम में तबदीली होनी ही चाहिए...वो जनता के द्वारा और जनता के लिए हैं ...जनता के साथ जुड़े रहने के लिए 'शाही' नाम छोड़ना चाहिए उन्हें....'शाही' नाम ही राजतन्त्र का बोध कराता है और प्रजातंत्र में इसकी कोई आवश्यकता नहीं है....भारत जैसे लोकतंत्र में 'शाही इमाम' 'राज पुरोहित' जैसे नामों की क़तई भी ज़रुरत नहीं है...
हाँ नहीं तो..!

Wednesday, October 20, 2010

रिश्तों की एलास्टिक ...

पुरानी प्रविष्टी आपकी नज़र ...


तुम बार-बार मुझे,
ऐसे ही सताते हो,
पहले क़रीब लाते हो,
फिर दूर हटाते हो,
जानती हूँ ,
तुम्हें अच्छा लगता है,
मुझे रुलाना,
और बाद में
मनाना,
अपनी मर्ज़ी के
इल्ज़ाम लगाना,
इल्ज़ामों के वज़ूद को
जबरन पुख्ता बनाना,
ये अच्छा नहीं है
कहे देती हूँ,
इस तरह बार-बार
खींचोगे तो,
रिश्तों की एलास्टिक
ख़राब हो जायेगी,
फिर बाद में वो,
ज़रबंद के भी
काम नहीं आएगी....

चुपचाप....


यूँ हीं ...
हम निकले थे, 
ज़रा सा बाहर,
कि मिल गई
बिखरी सी ज़िन्दगी,
रिश्तों की डोरी,
खुशियों के मंज़र,
दुश्मनों के खंज़र
दोस्तों के पत्थर,
अपनों की नज़र ,
आँखों के समंदर,
यादों की कतरन, 
और सुलगती सी
आग
हमने समेट लिया
सब कुछ
सीने के अन्दर
चुपचाप..!

Tuesday, October 19, 2010

क्या जाने मार डाले, ये दीवानापन कहाँ....


तेरे बग़ैर, सुरूर, लुत्फ़-ओ-फ़न कहाँ
ज़िक्र न हो तेरा, फिर वो सुख़न कहाँ

मिलते हैं सफ़र में, हमसफ़र, रहबर कई
वीरान से रस्तें हैं, पर वो राहजन कहाँ

हैरत में पड़ गई हैं, ख़ामोशियाँ हमारी
मैं झूलती क़वा में, मुझमें जीवन कहाँ

तेरे हुज़ूर में ही, मेरा ये दम निकले 
क्या जाने मार डाले, ये दीवानापन कहाँ

बस इंतज़ार में ही, आँखें बिछी हुईं हैं 
सब पूछते हैं मुझसे, कि तेरा मन कहाँ