नेत्र, नयन या आँखें, हमारे शरीर का बहुत ही महत्वपूर्ण अंग...इसका सीधा संपर्क न सिर्फ शरीर से अपितु, मन एवं आत्मा से भी है...जो मनुष्य शरीर से स्वस्थ होता है उसकी आखें चंचल, अस्थिर और धूमिल होती हैं, परन्तु जिस व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर अर्थात आत्मा स्वस्थ होती है उसकी आँखें स्थिर, तेजस्वी और प्रखर होतीं हैं....उनमें सम्मोहने की शक्ति होती है...हममें से कई ऐसे हैं जो आखों को पढना जानते हैं ...आँखें मन का आईना होतीं हैं...मन की बात बता ही देतीं हैं...
आँखों की संरचना की बात करें तो इनमें...१ करोड़ २० लाख ‘कोन’ और ७० लाख ‘रोड’ कोशिकाएँ होतीं हैं , इसके अतिरिक्त १० लाख ऑप्टिक नर्वस होती है, इन कोशिकाओ और तंतुओ का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है
स्थूल जगत को देखने के लिए हमारी आँखें बहुत सक्षम हैं परन्तु सूक्ष्म जगत या अंतर्जगत को देख पाने में जनसाधारण के नेत्र कामयाब नहीं हैं....परन्तु कुछ अपवाद तो हर क्षेत्र में होते ही हैं...और ऐसे ही अपवाद हैं हमारे प्रभु भगवान् शंकर...जो इस विद्या में प्रवीण रहे...भगवान् शंकर की 'तीसरी आँख' हम सब को दैयवीय अनुभूति दिलाती है...सोचने को विवश करती है कि आख़िर यह कैसे हुआ...?
बचपन में सुना था कि तप में लीन शंकर जी पर कामदेव ने प्रेम वाण चला दिया था, जिससे रुष्ट होकर उन्होंने अपनी तीसरी आँख खोल दी और कामदेव भस्म हो गए..सच पूछिए तो इस लोकोक्ति का सार अब मुझे समझ में आया है ...जो मुझे समझ में आया वो शायद ये हो...भगवान् शंकर तप में लीन थे और सहसा ही उनकी कामेक्षा जागृत हुई होगी...तब उन्होंने अपने मन की आँखों को सबल बना लिया और अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर अपनी काम की इच्छा को भस्म कर दिया...
इसलिए ये संभव है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास तीसरी आँख है, आवश्यकता है उसे विकसित करने की..विश्वास कीजिये ये काल्पनिक नहीं यथार्थ है ..यहाँ तक कि इसका स्थान तक निश्चित है...
जैसा कि चित्रों में देखा है ..भगवान् शंकर की तीसरी आँख दोनों भौहो के बीच में है...वैज्ञानिकों ने भी इस रहस्य का भेद जानने की कोशिश की है और पाया है कि ..मस्तिष्क के बीच तिलक लगाने के स्थान के ठीक नीचे और मस्तिष्क के दोनों हिस्सों के बीच की रेखा पर एक ग्रंथि मिलती है जिसे ‘पीनियल ग्लैंड’ के नाम से जाना जाता है...यह ग्रंथि गोल उभार के रूप में देखी जा सकती है, हैरानी की बात यह है कि इस ग्रंथि की संरचना बहुत ज्यादा हमारी आँखों की संरचना से मिलती है...इसके उपर जो झिल्ली होती है उसकी संरचना बिल्कुल हमारी आखों की 'रेटिना' की तरह होती है...और तो और इसमें भी द्रव्य तथा कोशिकाएं, आँखों की तरह ही हैं...इसी लिए इसे 'तीसरी आँख' भी कहा जाता है...यह भी कहा जाता है कि सभी महत्वपूर्ण मानसिक शक्तियाँ इसी ‘पीनियल ग्लैंड’ से होकर गुज़रतीं हैं...कुछ ने तो इसे Seat of the Soul यानी आत्मा की बैठक तक कहा है...सच तो यह है कि बुद्धि और शरीर के बीच जो भी सम्बन्ध होता है वह इसी 'पीनियल ग्रंथि' द्वारा स्थापित होता है... और जब भी यह ग्रंथि पूरी तरह से सक्रिय हो जाती है तो रहस्यवादी दर्शन की अनुमति दे देती है...शायद ऐसा ही कुछ हुआ होगा भगवान् शंकर जी के साथ...
पीनियल ग्रंथि
'पीनियल ग्रंथि' सात रंगों के साथ साथ ultraviolet अथवा पराबैगनी किरणों को तथा लाल के इन्फ्रारेड को भी ग्रहण कर सकती है, इस ग्रंथि से दो प्रकार के स्राव निकलते हैं ‘मेलाटोनिन’ और DMT (dimethyltryptamine)...यह रहस्यमय स्राव मनुष्य के लिए जीवन दायक है....यह स्राव anti-aging में सहायक होता है...मेलाटोनिन हमारी नींद के लिए बहुत ज़रूरी है...इसका स्राव बढ़ जाता है जब हम बहुत गहरी नींद में होते हैं....मेलाटोनिन और DMT मिलकर – सेरोटोनिन का निर्माण करते हैं , इसलिए 'पीनियल ग्रंथि', सेरोटोनिन उत्पादन का भंडार है, इसी से मस्तिष्क में बुद्धि का निर्माण और विकास होता है....मानसिक रोगों के उपचार में 'सेरोटोनिन' ही काम में लाया जाता है..
प्रकृति में भी बहुत सी चीज़ें हैं जिनमें 'सेरोटोनिन' प्रचुर मात्रा में पाया जाता है...जैसे केला, अंजीर, गूलर इत्यादि...अब मुझे लगता है, शायद भांग और धतूरे में भी ये रसायन पाया जाता हो...क्यूंकि शंकर भगवान् उनका सेवन तो करते ही थे...आज भी उन्हें भांग, धतूरा और बेलपत्र ही अर्पित किया जाता है...
भगवान् गौतम बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति बोधी वृक्ष के नीचे हुई थी...यह भी संभव है कि उस वृक्ष के फलों में 'सेरोटोनिन' की मात्रा हो...जो सहायक और कारण बने हों, जिससे उन्हें 'बोधत्व' प्राप्त हुआ...
'पीनियल ग्लैंड' पर शोध और खोज जारी है..हम सभी जानते हैं कि हमारा मस्तिष्क बहुत कुछ करने में सक्षम है..परन्तु हम उससे उतना काम नहीं लेते...हमारे मस्तिष्क का बहुत बड़ा हिस्सा निष्क्रिय ही रह जाता है...और बहुत संभव है कि उसी निष्क्रिय हिस्से में 'तीसरे नेत्र' अथवा 'छठी इन्द्रिय' का रहस्य समाहित हो...जिसके अनुभव से साधारण जनमानस वंचित रह जाता है....
चलते चलते एक बात और कहना चाहूँगी...शिवलिंग को अक्सर लोग, पुरुष लिंग समझा करते हैं...लेकिन गौर से 'पीनियल ग्लैंड' को देखा जाए तो इसकी आकृति गोल और उभरी हुई है, शिवलिंग की संरचना को अगर हम ध्यान से देखें तो क्या है उसमें....एक गोलाकार आधार, जिसमें उभरा हुआ एक गोल आकार, जिसके एक तरफ जल चढाने के बाद जल की निकासी के लिए लम्बा सा हैंडल...अब ज़रा कल्पना कीजिये मस्तिष्क की संरचना की ..हमारा मस्तिष्क दो भागों में बँटा हुआ है..दोनों हिस्से अर्धगोलाकार हैं और 'पीनियल ग्लैंड' ठीक बीचो-बीच स्थित है अगर हम मस्तिष्क को खोलते हैं तो हमें एक पूरा गोलाकार आधार मिलता है और उस पर उभरा हुआ 'पीनियल ग्लैंड'...किनारे गर्दन की तरफ जाने वाली कोशिकाएँ निकासी वाले हैडल की तरह लगती हैं...
अब कोई ये कह सकता है कि फिर इसे शिवलिंग क्यूँ कहा जाता है...ज़रूर ये सोचने वाली बात है... लेकिन..सोचने वाली बात यह भी है कि ...'पीनियल ग्लैंड' का आकर लिंग के समान दिखता है...और कितने लोगों ने 'पीनियल ग्लैंड' देखा है ? आम लोगों को अगर बताया भी जाता 'पीनियल ग्लैंड' के विषय में तो शायद वो समझ नहीं पाते...वैसे भी आम लोगों को किसी भी बात को समझाने के लिए आम उदाहरण और आम भाषा ही कारगर होती है...मेरी समझ से यही बात हुई होगी..और तथ्यों से ये साबित हो ही चुका है कि भगवान् शिव औरों से बहुत भिन्न थे...बहुत संभव है उनके भिन्न होने का कारण उनका विकसित, और उन्नत 'पीनियल ग्लैंड' ही हो...और जैसा मैंने ऊपर बताया, बहुत हद तक सम्भावना यह भी हो कि शिवलिंग विकसित 'पीनियल ग्लैंड' का द्योतक हो, ना कि पुरुष लिंग का...और यह बात ज्यादा सटीक भी लगती है...
'देवदासी' इस नाम का अर्थ होता है 'ईश्वर की सेविका', किन्तु यह एक प्रथा है, यूं तो इस प्रथा को भारत में १९४० में निषिद्ध कर दिया गया था, परन्तु यह प्रथा आज भी मौजूद है,
भारत के दक्षिण राज्यों में आज भी यह प्रथा बहुत आराम से चल रही है.... कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, उडीसा जैसे राज्यों के मंदिरों में देवदासियों का चलन जोरशोर से बरकरार है, हालांकि मानवाधिकार, नारीवादी संगठन और शिक्षाविद इसे एक सामाजिक समस्या ही मानते हैं...और इसे बलात वेश्यावृत्ति के रूप में देखा जाता है ...सच पूछा जाए तो 'देवदासी' संस्कृति और आस्था के बीच एक नुकसानदेह तंतु की तरह नज़र आती है...
इस परम्परा का विकास वैदिक युग के बाद हुआ था ....अब आप ये जानिये कि देवदासियाँ बनतीं कैसे हैं ? परिवार से किसी भी बालिका का चयन माँ-बाप स्वयं करते हैं, उसे मंदिरों के समारोहों में नृत्य करने को प्रेरित करते हैं, उसमें ईश्वर के प्रति समर्पण का भाव जगाने का प्रयत्न करते और बाद में उसे 'देवदासी' के रूप में मंदिर को दान कर देते हैं...साथ ही यह प्रचलित कर दिया जाता है कि इस कन्या का विवाह भगवान् से हो चुका है... और वो पुजारियों के सुपुर्द कर दी जाती है, ताकि ये धर्म के ठेकेदार उसे अपनी यौन तुष्टि की सामग्री बना सके...इन लड़कियों को विवाह करने की आज्ञा नहीं होती ...क्योंकि जैसा मैंने कहा उनका विवाह 'ईश्वर' से कर दिया जाता है.....
आदिकाल में ये देवदासियाँ दक्ष नृत्याँगनायें, संगीत में प्रवीण और अच्छी सलाहकार हुआ करतीं थी...ये मंदिरों के आयोजनों में बढ़-चढ़ कर भाग लेतीं थीं...लेकिन अब ऐसा नहीं है... ये देवदासियाँ सीधे-सीधे 'सेक्स वर्कर' के रूप में काम करतीं हैं, जिनका इस्तेमाल मंदिर के कार्यकर्त्ता और गाँव के वरिष्ठ नागरिक बिना किसी रोक-टोक के आसानी से करते हैं...और त्रासदी यह है कि इसे बुरा भी नहीं माना जाता है...मंदिरों के संरक्षक अपनी मनमानी प्राचीन काल से करते आ रहे हैं...
वर्षों से यह प्रथा बेलगाम, बीजापुर, रायचूर, कोप्पल, धारवाड़, शिमोगा, हावेरी, गडग और उत्तर कर्नाटक के अन्य जिलों में प्रचलित है.. कर्नाटक में आज 25,000 के आसपास देवदासियाँ हैं..इन सभी राज्यों में यह कुरीति, सामाजिक रूप से स्वीकृति प्राप्त कर चुकी है...बहुत ही चतुराई से इस प्रणाली को ईश्वर के नाम से चलाया जाता है, अशिक्षित माता-पिता को यह महसूस कराया जाता है कि यह सब भगवान् के लिए किया जा रहा है..और इससे उन्हें आशीर्वाद ही मिलना है...यह सुनिश्चित किया जाता है कि मंदिरों में जो शोषण हो रहा उससे किसी को आपत्ति न हो...और समाज के धर्मभीरु लोग भगवान् के नाम पर अपनी बेटियों का बलिदान ख़ुशी ख़ुशी कर देते हैं...
देखने वाली बात ये भी है कि इस प्रथा में आम तौर पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति और पिछड़े वर्ग के ग़रीब परिवार की बालिकाएं ग्रास बनती हैं.. वाह रे दोहरापन ! जिस वर्ग के लोग मंदिर में पाँव नहीं धर सकते, उसी वर्ग की कन्याएं इस योग्य अवश्य मानी जाती हैं, जो तथाकथित पुजारियों की और गाँव के विशिष्ठ लोगों की अंकशायिनी बन सकें...इसका एकमात्र कारण बस इतना ही हो सकता हैं कि ये परिवार न तो आर्थिक रूप से सबल होते हैं ना ही विरोध की आवाज़ उठा सकने योग्य होते हैं...इसतरह का परिवार सिर्फ़ इस बात से ख़ुश रहता है कि उसने अपनी बेटी ईश्वर को दान कर दिया और बदले में उन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए कुछ पैसे मिल रहे हैं...यह सरासर वेश्यावृति है.... लेकिन हमारा समाज बस आँखें बन्द करके इस अति को पत्थर के भगवान् और छद्मी पुजारियों के नाम से स्वीकार किये बैठा है....
अन्यथा मन के भाव,
संचित होकर,
हृदय-भूगर्भ में
उमड़-घुमड़,
न जाने कितने
बंध-अनुबंध,
तोड़ना चाहेंगे ...
देखो ना !!
कितने बादल घिर आये हैं,
मन-आकाश में |
.....कल.... प्रतीक्षारत नयन,
मुखरित हो जायेंगे
भाव, झमा-झम बरसेंगे
छटेंगे बादल
संशय के,
पारदर्शी हो जायेंगी दिशायें, हवाएँ सत्य की
हृदय को छूकर गुजरेंगीं और
हो जाएगा ऋतु परिवर्तन
मेरे-तुम्हारे
मन का.....
अभी न जाओ छोड़ कर ....ये गीत सिर्फ़ २ मिनट ४६ सेकेंड का है...बाकी ख़ाली है..असुविधा के लिए खेद है...
हे भगवान् !..आज फिर देर हो जायेगी ..ओ भईया ज़रा जल्दी करना ...मैंने रिक्शे वाले से कहा ..वो भी बुदबुदाया ..रिक्शा है मैडम हवाई जहाज नहीं...और मैं मन ही मन सोचे जा रही थी...ये भी न ! एक कप चाय भी नहीं बना सकते सुबह, रोज मुझे देर हो जाती है और डॉ.चन्द्र प्रकाश ठाकुर की विद्रूप हंसी के बारे में सोचती जाती...ठाकुर साहब को तो बस मौका चाहिए, मेरी तरफ ऐसे देखते हैं जैसे अगर आँख में जीभ होती तो निगल ही जाते, फिर बुलायेंगे मुझे अपने ऑफिस में और देंगे भाषण...हे भगवान् ! ये मेरे साथ ही क्यूँ होता है....
अब एक इत्मीनान मुझ पर हावी होने लगा था ...शुक्र है पहुँच गई ..मैंने पर्स से बीस का नोट निकाला, रिक्शे वाले के हाथ में ठूंसा और लगभग छलांग मारती हूँ ऑफिस की सीढियां चढ़ने लगी., ओ माला ...! माला ..! मुझे उस वक्त अपना नाम दुनिया में सबसे बेकार लगा था, अब ये कौन है...कमसे कम रजिस्टर में साईन तो कर लेने दो यार, ये बोलते हुए मैं मुड़ी...सामने थी एक बड़ी दीन-हीन सी महिला, मेरे चेहरे पर हजारों भाव ऐसे आए, जो उसे बता गए ...तुम कौन हो मैडम ? मुझे ऐसे आँखें सिकोड़ते देख उसने कहा अरे मैं हूँ रीना...हम एक साथ थे सेंट जेविएर्स में...मेरा मुँह ऐसे खुल गया जैसे ए.टी.एम्. का होल हो, वह मेरे आश्चर्य को पहचान गई ..और कहा..तू कैसे पहचानेगी..जब मैं ही ख़ुद को नहीं पहचानती...
लेकिन तब तक मेरी याददाश्त ने मेरा साथ दे दिया , अरे रीना ! तू SSSSSSS ! मैंने झट से उसे गले लगा लिया, और झेपते हुए कहा ..अरे नहीं री !...इतने सालों बाद तुम्हें देखा न...इसलिए., लेकिन देख ५ सेकेंड से ज्यादा नहीं लगाया...और बता तू कैसी है.? तू तो बिल्कुल ही ॰गायब हो गई...मैं बोलती जाती और उसको ऊपर से नीचे तक देखती भी जाती....हमदोनों वहीं बैठ गई , बाहर बेंच पर, अब जो होगा देखा जाएगा...सुन लेंगे ठाकुर सर का भाषण और झेल लेंगे उनकी ऐसी वैसी नज़रें ..हाँ नहीं तो...:)
मैं उसका मुआयना करती जाती थी और सोचती जाती थी क्या इन्सान इतना बदल सकता है...इतनानानाना ????
रीना हमारे कॉलेज की बेहद्द खूबसूरत लड़कियों में से एक थी...जितनी खूबसूरत थी वो , उतनी ही घमंडी भी थी, नाक पर मक्खी भी बैठने नहीं देती थी, किसी का भी अपमान कर देना उसके लिए बायें हाथ का खेल था...मैं उससे थोड़ी कम खूबसूरत थी शायद, लेकिन गाना बहुत अच्छा गाती थी..इसलिए उससे ज्यादा पोपुलर थी...और रीना को यह बिल्कुल भी गंवारा नहीं था...उसने मुझसे कभी भी सीधे मुँह बात नहीं की थी...हमारे कॉलेज में सौन्दर्य प्रतियोगिता हुई ..मुझे तो ख़ैर घर से ही आज्ञा नहीं थी ऐसी प्रतियोगिता में भाग लेने का...लेती भी तो हार जाती ..रीना बाज़ी मार ले गई ...और उसके बाद वो बस सातवें आसमान में पहुँच गई....इसी प्रतियोगिता में किसी बहुत अमीर लड़के ने उसे देखा था...और फर्स्ट इयर में ही उसकी शादी हो गई...उसके बाद, वो एक दिन आई थी कॉलिज अपने पति के साथ और फिर हमारी कभी उससे मुलाक़ात नहीं हुई ...
एक ज़माने के बाद, मैं आज देख रही हूँ रीना को...मुझे याद है शादी के बाद, जिस दिन वो आई थी कॉलेज अपने पति के साथ ..कितनी सुन्दर जोड़ी लग रही थी...कार के उतरी थी वो, उसका पति स्मार्ट , खूबसूरत, ऊंचा...रीना तो बस रीना राय ही लग रही थी..मेंहदी भरे हाथ, चूड़ा , गहने, कीमती साड़ी और गर्वीली चाल, ऊँची एडी में,
कॉलेज में कितनों के दिल पर साँप लोट गया था उस दिन, मैं भी कहीं से जल ही गई थी, लेकिन इस समय मेरी नज़र उसके हाथों से नहीं हट पा रही थी, हाथ कुछ टेढ़े से लग रहे थे मुझे, उसने भी मेरी नज़र का पीछा किया और अपने हाथ साड़ी में छुपा गई...
मेरी चोरी पकड़ी गई थी, उसके हाथों को देखते हुए, झेंप मिटाने के लिए, मैंने पूछ लिया, कैसा चल रहा है सब कुछ ? बोलते हुए मेरी नज़र उसकी माँग पर गई, माँग में कोई सिन्दूर नहीं था, लेकिन आज कल किसी के बारे में इससे कहाँ पता चलता है...कि वो शादी-शुदा है या नहीं, मैं नज़रों से उसे टटोलते हुए बोल रही थी...बोलो न, कितने बच्चे हैं ? वो फुसफुसाई....एक बेटा है ..मानू! और फिर तो जैसे अल्फाजों, भावों का बाँध टूट गया हो....माला..शादी के दो साल बाद ही मैं विधवा हो गई, जीवन के सारे रंग मिट गए...मैं कितनी ख़ुश थी माला...भगवान् ने मुझे क्या नहीं दिया था, खूबसूरत पति, बड़ा घर, गाड़ी, रुपैया-पैसा, नौकर-चाकर, एक बेटा...लेकिन एक ही झटके में सब कुछ चला गया... वो थोड़ा रुकी...फिर कहने लगी...
मैं, मेरे पति और मेरा बेटा हम तीनों शिमला गए थे घूमने, वापसी में एक्सीडेंट हो गया, इस एक्सीडेंट में मेरे पति चल बसे, मुझे बहुत चोट आई..मेरे हाथ पाँव,रिब्स टूट गए थे...बच्चा सुरक्षित था ...मुझे ठीक होने में महीनों लग गए अस्पताल में...जब मैं वापिस ससुराल आई तो मेरा सब कुछ जा चुका था ..मेरे ससुराल वालों ने मुझे घर से निकाल दिया, अपने बच्चे के साथ मैं सड़क पर ही आ गई थी, इतना कहते-कहते उसका गला रुंध गया था ..मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरना शुरू कर दिया था, वो बोलती जा रही थी...माँ-बाप भी रिटायर्ड हैं, तुझे पता ही है मैंने पढाई पूरी नहीं की थी, उन्होंने ही मुझे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया, अब नर्स बन गई हूँ, यहीं जो सदर हॉस्पिटल है ,वहाँ दो दिन पहले ही ट्रान्सफर लेकर आई हूँ, अचानक तुझे देखा तो कितनी ख़ुशी हुई मुझे, बता नहीं सकती माला , तू तो बिल्कुल नहीं बदली रे, बिल्कुल वैसी ही लगती है तू...सच.!
अरे नहीं रे ...देख न मेरे भी दो-चार बाल अब सफ़ेद हो रहे हैं...हा हा हा, चल, ये तो बहुत अच्छा है..तू यहाँ पास में ही है ..अब तो रोज़ मिला करेंगे लंच में ...सुन तेरे को देर हो रही होगी, उसने जैसे मुझे सोते से जगाया हो, मेरी आँखों के सामने फट से ठाकुर साहब आ गए , और उनकी वही कुटिल मुस्कान ! मैंने झट से उनके ख्याल को झटक दिया , चल फिर कल मिलते हैं लंच में ...तू यहीं आ जाना मैंने उसे हिदायत दी, पक्का आ जाऊँगी बोल कर वो फिर मुझसे लिपट गई , आँखें मेरी भी नम हो गईं, और वो ख़ुद को समेटती अपना पर्स सम्हालती चल पड़ी..
मैं खड़ी होकर पीछे से उसे जाती देखती रही ...नर्स !! सेवा और त्याग का पर्याय..अपने अभिमान के चूर-चूर होने का तमाशा देखने के बाद ..इससे बेहतर पेशा और क्या हो सकता था उसके लिए ..!
अंकित बेटे तुमने बहुत ही अच्छी जानकारी भेजी है.....तुम्हारा दिल से शुक्रिया...
Foie Gras का अर्थ होता है 'फैट लीवर'... यह बहुत ही लग्जरीमेनू आइटम माना जाता है, इस व्यंजन का अविर्भाव फ़्रांस में हुआ था..
चलिए इस व्यंजन का स्रोत देखते हैं...इस व्यंजन के लिए बतख़ को वसा खिला खिला कर लीवर रोग से ग्रस्त किया जाता है...ताकि पक्षी का ज़िगर बड़ा और वसायुक्त हो जाए..
इसके लिए बतख़ को वसा खाने को मजबूर किया जाता है, भले उसे खाने की इच्छा न हो....
अगर बतख़ खाना नहीं चाहता हो तब धातु की पाइप उसके पेट तक डाल कर खाना खिलाया जाता है...
पक्षियों के पिंजरे बहुत छोटे बनाये जाते हैं और उनको एक ही स्थिति में रहने के लिए वाध्य किया जाता है, जिससे उनके शरीर की ऊर्जा जाया न जाए और वो वसा में परिवर्तित हो जाए...
ऐसी हालत में उनकी आँखें कितनी उदास लगतीं हैं...आप देख सकते हैं
रोज़-रोज़ एक ही स्थिति में खड़े रहने के कारण उनके पाँव सूज जाते हैं...उनको सोने नहीं दिया जाता ... बार-बार उनको खाने के लिए जगाया जाता है ...
हालांकि वो इससे बचने की भरपूर कोशिश करते हैं लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकलता है...
इनकी ऐसी दशा देख कर मन कह उठता है...ये भी कोई ज़िन्दगी है ?
इन निरीह प्राणियों को तब तक वसा खिलाया जाता है जब तक इनके प्राण पखेरू उड़ नहीं जाते ...उनका शरीर इस अति को झेल नहीं पाता है...
देखिये...इनकी मृत्यु पश्चात भी भोजन इनके मुँह में है...
बाक़ी जो जीवित बच जाते हैं, उनका अधोभाग संक्रमित रहता है...रक्त आसानी से गन्दगी के साथ निकलता रहता है...
इन पक्षियों के मुँह, गले और पेट में पीड़ा होती रहती है , पाँव सूजे हुए होते है, घूमने फिरने की इजाज़त नहीं होती...खुले आसमान और बहते पानी से ये कोसों दूर होते हैं...
जिस खूबसूरत और सफ़ेद लीवर को पाने के लिए इतनी वहशत की जाती है ...वो ऐसा दिखता है...उसके साथ लीवर का सामान्य रूप भी दिखाया गया है...
और अब डिब्बा-बन्द Foie Gras
पशु-पक्षियों के प्रति इस तरह की क्रूरता का बहिष्कार होना ही चाहिए...ऐसे उत्पादनों को खरीदने से ख़ुद को रोकें ..
माँग पर रोक लगायें, आपूर्ति स्वयं समाप्त हो जायेगी...