Friday, March 8, 2013

'वाल्मीकि रामायण' के कुछ अंश, अनुवाद सहित ......


देर हुई है, परन्तु मेरे पाठकों के अनुरोध पर, कोमेंट ऑप्शन खोल दिया है ...
कुछ समय पहले 'वाल्मीकि रामायण' और उसका अनुवाद पढ़ा था, 'वाल्मीकि रामायण' को आदि-पुस्तक कहा जाता  है, और 'राम चरित मानस' उसी पुस्तक पर आधारित आधुनिक-पुस्तक। 
वाल्मीकि रामायण के कुछ अंश यहाँ डाल रही हूँ, आप भी पढ़ें ...
ये वाल्मीकि रामायण का हिंदी अनुवादित रूप का, एक हिस्सा है। वर्ष १९२७ में यह अनुवाद 'चतुर्वेदी द्वारकाप्रसाद शर्मा' द्वारा किया गया ...प्रकाशक हैं, रामनारायण लाल, पब्लिशर एंड बुकसेलर, इलाहाबाद।

राम मेरे कितने हैं, ये मेरा और मेरे राम के बीच का मामला है लेकिन सीता मेरी थीं, हैं और हमेशा रहेंगी।
बाकी आप लोग शुरू हो जाइये, हम बैठे हैं, हमला झेलने के लिए :):)

















34 comments:

  1. वाल्मीकि रामायण सचमुच अद्भुत है। इसके कुछ श्लोक मैंने रामचंद्र शुक्ल की पुस्तक में पढ़े थे और लगा था कि बहुत सरल भाषा में सरस प्रस्तुति की गई है। आपके द्वारा दिया गया अनुवाद सचमुच बहुत अच्छा है। राम का चरित्र अपने समय की सीमाओं में बंधा चरित्र है। वाल्मीकि ने बहुत सुंदर रूप में राम के चरित्र को प्रस्तुत किया है।
    सीता की अग्निपरीक्षा के समय में बाद के लेखकों ने ज्यादा उदार नजरिया पेश किया। उदाहरण के लिए भवभूति ने जिन्होंने वनवास भेजने के पूर्व सीता को देखते हुए राम से कहलवाया कि मैं तुम्हें उसी प्रकार वन भेज रहा हूँ जिस प्रकार अपने द्वारा पाली-पोसी गई चिड़िया को कोई बहेलिये को सौंप देता है।

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    1. अब लेखक कथा में वर्णित तथ्यों को अपने दृष्टिकोण से लिख रहे हैं.
      हालांकि यह इतना उल्लेखनीय नहीं है, पर हो सकता है आने वाली पीढ़ी इन रामायण पर बनी सीरियल से ही रामायण कथा को जाने.
      हाल में ही देखा, "सीता राम से कह रही हैं ये सोने का मृग बहुत सुन्दर है, इसे पकड़ कर ले आइये ,मैं इसे अपने आश्रम में रखूंगी. "
      जबकि रामायण ग्रन्थ में सोने के मृग के शिकार यानी वध की बात वर्णित है. पर आज के लेखक शायद यह सोचते हैं कि दर्शकों के मन में यह भावना उठेगी कि राम-सीता भगवान होकर हिंसा की बात कैसे कर सकते हैं ?? इसलिए उसे यूँ बदल दिया.

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  2. आदि कवि की दिव्य दृष्टि तो देखिये उन्होंने ऐसा वर्णन किया किया है मानो साक्षात इन दृश्यों को देख रहे हों

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    1. बहुत ही अच्छी बात कही है आपने अरविन्द जी, बहुत ही भाव-विह्वल करने वाला दृश्य है। वैसे तो पूरी रामायण ही आदि कवि वाल्मीकि की एक अप्रिम एवं अतुलनीय रचना है। संस्कृत में ऐसी रचना दूसरी नहीं है परन्तु रामायण के इस प्रसंग ने मुझे बहुत विह्वल किया है ...

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    2. भूल सुधार ..
      अप्रिम=अप्रतिम

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  3. वाल्मीकि ने लेखक की निरपेक्षता को पूरी तरह निभाया है और सीता जी का चरित्र किसी भी तरह से कमतर नहीं होने दिया है। जिस प्रकार उन्होंने राम को उलाहना दी, उससे लगता है कि प्राचीन काल में नारी स्वातंत्र्य पर सीमाएँ लगाई गई थीं लेकिन यह इतना एकतरफा भी नहीं था।


    बहुत सुंदर प्रस्तुति

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    1. आपकी बातों से पूर्णतः सहमत हूँ, कि स्त्री स्वतंत्रता उलाहना देने तक तो थी ही :)
      हृदय से आभारी हूँ !

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  4. भवभूति के उत्तर रामचरितम में सीता वनवास का बहुत ही कारुणिक उल्लेख हुआ है !

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    1. उस पुस्तक को भी पढना चाहूँगी मैं।
      आपसे कई पुस्तकों के बारे में पूछना है मुझे, आशा है आप मार्गदर्शन करेंगे।

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  5. मैं इतना अभिभूत हूँ कि मुझे अब समझ में आया कि सशक्त वैदिक ऋचाओं के रचनाकारों के होने के बावजूद वाल्मीकि को आदि कवि की संज्ञा क्यों दी गई?

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    1. महर्षि वाल्मीकि जैसे श्रेष्ठ कवि इस भूमि पर दूसरा नहीं हुआ।
      संस्कृत के छोटे-छोटे श्लोकों से एक महाकाव्य ही रच देना, महानतम आत्मा का ही कार्य हो सकता है, कोई दूसरा नहीं कर सकता।
      आपका यहाँ आना मुझे संबल प्रदान कर गया, आभारी हूँ आपकी ..!

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  6. अत्यंत कारुणिक.
    वाल्मीकि रामायण ही श्रेष्ठ है. गोस्वामी तुलसीकृत रामचरितमानस के बारे में क्या कहूं...

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    1. निशांत,
      तुम्हें देख कर बहुत अच्छा लगा ...
      इतना हृदय-विदारक है यह दृश्य कि शब्द कम पड़ जाते हैं, मैंने जब-जब भी इसे पढ़ा है, खुद को कभी रोक नहीं पायी हूँ।

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  7. इन श्लोकों के अनुसार श्रीराम लंकाविजयोपरांत पुष्पक पर सीता को अयोध्या नहीं ले गए थे? सीता ने अग्निसमाधि वहीं लंका में ली थी? कतिपय अयोध्यावासियों द्वारा सीता के चरित्र पर संदेह करना यहाँ तो वर्णित नहीं है.

    ज्ञानीजन शंकाओं का समाधान करें.

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    1. नहीं निशांत, यहाँ वह प्रसंग नहीं है।
      अग्नि परीक्षा के उपरान्त, राम का राज्याभिषेक हुआ, राम-सीता बहुत दिनों तक साथ रहे। सीता गर्भवती हुईं जिसे सुन कर राम प्रसन्न हुए।
      कुबेर को रावण ने बंदी बना लिया था, युद्ध के बाद कुबेर को लँका से आज़ाद कराया गया। और कुबेर का ही पुष्पक विमान था, लेकिन वो राम की सवारी नहीं थी। कुबेर ने पुष्पक को आदेश दिया कि वह अब राम की सवारी बने, उसी आज्ञा को सुन कर पुष्पक राम जी के पास आया। तब राम और सीता पुष्पक विमान में बैठ कर एक बार फिर अशोकवाटिका में जाते हैं। अशोकवाटिका में राम सीता से पूछते हैं, की सीता की इच्छा क्या है, सीता कहती है, कि वह तपोवन देखना चाहती है, अगर वो किसी मुनि के आश्रम में एक दिन भी रहेगी तो उसे अच्छा लगेगा।
      वाल्मीकि रामायण के अनुसार, राम अपनी प्रजा का हाल चाल भरत और शत्रुघ्न से पूछते रहते हैं। राम को हर बात की खबर भरत देते रहते हैं। इसी पूछ ताछ के दौरान राम एक जासूस से कहते हैं सिर्फ अच्छी बातें मत बताओ अगर कुछ बुरी बातें भी है, तो वह भी बताओ। तब जासूस उन्हें इस अफवाह की बात बताता है।

      उसी समय वो द्वारपाल को राम आज्ञा देते हैं कि भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न को तुरंत उनके कक्ष में भेज जाए। तीनो भाई कक्ष में आते हैं और राम उनसे इस अफवाह की बात कहते हैं, साथ ही लक्ष्मण से सीता को तपोवन दिखाने के बहाने से वन में छोड़ आने को कहते हैं। ये भी कहते हैं कि किसी भी प्रकार का कोई प्रश्न कोई नहीं पूछेगा, यह मेरी आज्ञा है और कल सुबह इसका पालन हो जाना चाहिए। लक्ष्मण सुबह सौमित्र से रथ तैयार करने को कहते हैं, और सीता जो अपनी इच्छा की पूर्ती होती देख बहुत खुश होती है, लक्ष्मण के साथ ख़ुशी-ख़ुशी चल पड़ती है, नदी पार करते वक्त लक्ष्मण सीता को उनके वन में छोड़ कर आने की बात बताते हैं, साथ ही कहते हैं,'काश मुझे इस जाल में न फंसा जाता '
      मैं कल इस को भी डालूंगी, पढ़ लेना ...

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    2. भूल सुधार ..
      सौमित्र=सुमंत

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  8. The Uttara Kanda is regarded to be a later addition to the original story by Valmiki.[13] and concerns the final years of Rama, Sita, and Rama's brothers. After being crowned king, many years passed pleasantly with Sita. However, despite the Agni Pariksha (fire ordeal) of Sita, rumours about her purity are spreading among the populace of Ayodhya.[57] Rama yields to public opinion and reluctantly banishes Sita to the forest, where sage Valmiki provides shelter in his ashrama (hermitage). Here she gives birth to twin boys, Lava and Kusha, who became pupils of Valmiki and are brought up in ignorance of their identity.

    Valmiki composes the Ramayana and teaches Lava and Kusha to sing it. Later, Rama holds a ceremony during Ashwamedha yagna, which the sage Valmiki, with Lava and Kusha, attends. Lava and Kusha sing the Ramayana in the presence of Rama and his vast audience. When Lava and Kusha recite about Sita's exile, Rama becomes grievous, and Valmiki produces Sita. Sita calls upon the Earth, her mother, to receive her and as the ground opens, she vanishes into it.[57][58] Rama then learns that Lava and Kusha are his children. Later a messenger from the Gods appears and informs Rama that the mission of his incarnation was over. Rama returns to his celestial abode.[5

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  9. @There has been discussion as to whether the first and the last chapters of Valmiki's Ramayana were composed by the original author. Some still believe they are integral parts of the book in spite of some style differences and narrative contradictions between these two chapters and the rest of the book

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  10. बहुत अच्छा किया इन अंशों को यहाँ पोस्ट कर के

    इन्हें पढ़कर या किसी भी ग्रन्थ को पढ़कर उनमे वर्णित चरित्रों के प्रति अपनी धारणा बनाना यह खुद के स्व विवेक पर निर्भर है.
    इसे पढ़कर राम का अद्भुत पराक्रम , पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर सिंहासन का त्याग, वनवास गमन , रावण को हराने के बाद अयोध्या में उंच-नीच,छोटे -बड़े का भेदभाव किये बिना कुशल शासन की स्थापना ये सारी बातें धूमिल नहीं पड़तीं पर सीता के साथ उन्होंने जो व्यवहार किया, वह भी एक कटु सत्य है .
    अब यह अपना अपना नजरिया है कि सीता से दो बार अग्निपरीक्षा का आग्रह, गर्भवती सीता को जंगल में छोड़ आना कई लोगो को गौण लग सकता है क्यूंकि राम जी का यह व्यवहार उनके द्वारा किये गए दुसरे कार्यों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है.
    और वहीँ किसी के मन में यह भी ख्याल आता है कि सीता का भी एक अलग अस्तित्व था ,वे राम जी की पत्नी थीं पर कोई संपत्ति नहीं कि जब चाहा जैसा व्यवहार कर डाला.
    सीता जी भी सुख -चैन की ज़िन्दगी त्याग कर अपने पति के साथ जंगल जंगल विचरती रहीं, रावण के हाथो अपहृत हो, असीम मानसिक कष्ट झेला, उसके बाद वापस रानी बनने के बाद भी अपने बच्चों के साथ जंगल का कष्टमय जीवन बिताया .उनके चरित्र पर संदेह किया गया. उन्हें क्या सुख नसीब हुआ ? उन्हें भी सुखमय जीवन बिताने का अधिकार था , जिसे उनके पति द्वारा ही छीन लिया गया .

    इस कडवे सच को कितना भी चाशनी की परत में लपेट लिया जाए .कडवाहट नहीं जायेगी .

    और कैसा हमला ?? तुमने अपने मन से नहीं लिखा बस उस ग्रन्थ के कुछ अंश उद्धृत किये हैं.
    {वैसे ब्लॉग जगत में हमले की कभी कोई वजह नहीं होती :):) }

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    1. तेरा कमेन्ट वैसे भी मेरे लिए बहुत मायने रखता है ...ऐसा क्यूँ है मैं जो कहना चाहती हूँ तू समझ जाती है :)

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  11. had read this earlier - read it once again today.

    thanks for sharing..

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  12. ज्ञान इतना नहीं की किसी महान ग्रन्थ के किसी भी छोटे से छोटे अंश या पात्र पर कुछ कहा जाये . ठीक इसी प्रकार बाल्मीकि जी रचित और विद्वान श्री चतुर्वेदी द्वारका प्रसाद शर्मा जी द्वारा अनुवादित रामायण का अंश पूर्ण ग्रन्थ के अवलोकन अध्ययन पश्चात ही टिपण्णी योग्य उचित होगा . संदर्भो के निचे ऊपर होने पर भी अर्थ स्पष्ट नहीं बन पड़ते हालांकि आपने पृष्ट 1252 से 1269 तक के श्लोकों को दिखलाया हैआपके द्वारा वर्णित श्लोकों में जनक नंदनी सीता जी और मनुज चरित श्री राम की मर्यादित जीवन चरित का उल्लेख किया गया .वंदनीय और विचारणीय बन पड़ा।
    मेरी जानकारी में शायद रामचरित मानस या रामायण में ब्रह्म राम का वर्णन है तब मनुज अवतारी राम पर मेरी टिपण्णी यथेष्ट कहाँ होगी।

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    1. बड़े भईया,
      काश कि मैं पूरा महाकाव्य यहाँ डाल पाती :(

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  13. पोस्ट पर और इसकी सुंदर टिप्पणियों को पढ़कर बहुत आनंद मिला। रामकथा हमारे जीवन से अभिन्न अंग है। मैथिलीशरण गुप्त जी की सुंदर पंक्तियाँ याद आती हैं राम तुम्हारा चरित ही काव्य है कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है। क्लासिक ग्रंथों पर ऐसी सुंदर बहस चलती है तो दिल को गहरा सुकून मिलता है। आभार

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    1. पूर्णतः सहमत हूँ|
      मैथिलीशरण गुप्त का कथन अतिश्योक्ति नहीं है। राम के चरित्र ने कई महाकवि दिए हैं, कुछ से तो हम सभी परिचित हैं हीं, उदाहरणार्थ आदि कवि वाल्मीकि।
      विमर्श, अच्छी पुस्तकों पर होता है, तो अच्छा ही लगता है। अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं, जो महानायकों के चरित्र को नए आयाम देते हैं और उन चरित्रों को समृद्ध ही बनाते हैं।

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  14. सोच रहा हूँ कि इस पोस्ट पर ये कह के खिसक लूँ कि ये अंश मूल रामायण का हिस्सा नहीं है बीच में आकर कोई गडबड कर गया होगा।

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    1. राजन बहुत संभव है ऐसा हुआ हो ...गड़बड़ करनेवाले आज से ३००० साल पहले भी रहे ही होंगे :(

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    2. वैसे यह अनुवादित वाल्मीकि रामायण पूरी की पूरी मेरे पास है, धीरे-धीरे ब्लॉग पर मैं इसे डाल सकती हूँ, अगर पाठकों को पढने की इच्छा है तो। वैसे मेरा मानना है लोगों को पढना ही चाहिए इसे।

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  15. Kaushlendra Ji ne kaha:

    वहाँ टिप्पणी पोस्ट नहीं हो सकी अस्तु ...
    दो बातें कहना चाहूँगा – 1- प्राचीन भारतीय साहित्य/ संहिताओं आदि में प्रक्षिप्ताशों के षड्यंत्रों को नकारा नहीं जा सकता, राजन जी की आशंका सही हो सकती है।
    2- किसी भी रचनाकार को किसी चरित्र के बारे में लिखने के लिये उस चरित्र को अपने अन्दर अनुभव करना पड़ता है। अतः कोई भी रचनाकार एक साथ कई चरित्रों को जीता है, किंतु इस प्रक्रिया में रचनाकार का मौलिक स्वरूप भी कुछ न कुछ अंश में बना ही रहता है। तुलसी एवं वाल्मीकि आदि ने भी अपनी-अपनी मौलिकता के साथ राम और सीता के चरित्र को गढ़ा। इस गढ़न में एक रचनाकार के भीतर का आम आदमी भी निरंतर अस्तित्व में बना रहता है। पाठक को रचना के माध्यम से सत्य का प्रत्यक्ष करना होता है जिसमें भिन्नता स्वाभाविक है।
    3- बस्तर के बैगा-गुनिया लोग अतीन्द्रिय शक्तियों से अपने कल्याण के लिये याचना करते हैं। उन्हें कुछ भौतिक वस्तुओं की भेंट देते हैं, फिर भी काम न बने तो अपने आराध्य को उल्टा-सीधा बोलकर उसके साथ झगड़ा भी करते हैं। यह एक सरल और सच्चे आदमी का सहज चरित्र है जिसे कोई साधक अपने तरीके से जीने का प्रयास करता है। इसीतरह रचनाकार भी अपने प्रतिपाद्य विषय या पात्रों के साथ इतना तन्मय हो जाता है कि उसके साथ किसी भी सीमा तक चला जाता है। राम ने सीता के प्रति सन्देह किया ...यह एक अवतार का चरित्र न होकर साधारण मानव का चरित्र था। यह रचनाकार की स्वतंत्रता है कि वह अपने आराध्य को कैसा देखे....
    4- हम केवल तथ्यों की चर्चा करें तो प्राचीन काल से लेकर आज तक स्त्री के प्रति पुरुष के दृष्टिकोण की संकीर्णता से निराशा होती है। हम त्रेता के प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं कि वास्तव में हुआ क्या था। हम एक निहायत आम आदमी की दृष्टि से विचार करें तो त्रेता की घटनायें लोगों को अपनी-अपनी दृष्टि से प्रेरणा लेने के लिये अवसर प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिये कोई अपराधीवृत्ति का व्यक्ति फ़िल्मों से अपराध सीखता है तो कोई दूसरा सावधानव्यक्ति बचाव के तरीके तो कोई तीसरा व्यक्ति सत्कर्म की प्रेरणा। अब हम व्यवहार के धरातल पर आकर यह जानना चाहेंगे कि रामायण से अभी तक हमने क्या सीखा ..कितना सीखा ..और कितना अपने जीवन में उतारा? दामिनी की लोमहर्षक घटना हमें यह सोचने को बाध्य करती है कि रामायण का कितना प्रभाव भारतीय जन-जीवन पर पड़ सका है? और इतना ही क्यों, हमें यह भी चिंतन करना होगा कि इन प्राचीन भारतीय गाथाओं का वर्तमान भारत के सम्यक चरित्र पर क्या प्रभाव पड़ सका है? इस सारे विमर्श के बीच हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि शीला दीक्षित जहाँ दिल्ली में अपनी बेटी को असुरक्षित पाने का वक्तव्य देती हैं वहीं वे यौनदुष्कर्म के जघन्य अपराधियों को पेरोल पर छोड़ने की सिफ़ारिश भी करती हैं। राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी यौन दुष्कर्म के प्रसंग पर कानून में परिवर्तन की वकालत करती हैं तो वहीं उनके सुपुत्र यौन दुष्कर्म का विरोध करने वाली महिलाओं के प्रति अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हैं। फिर वही प्रश्न कि आख़िर रामायण से हमने क्या सीखा?

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    1. कौशलेन्द्र जी,
      आपके विचार स्वागत योग्य हैं।
      वाल्मीकि रामायण का ही यह अनुवाद है, यह तो मैं भी नहीं कह सकती। जो लिखा हुआ है मैं वही बता सकती हूँ, और मैंने इसे वाल्मीकि रामायण मान कर कर ही पढ़ा है।
      सिर्फ शंका व्यक्त करने से कि इस प्रसंग में फेर-बदल हुई है, यह साबित नहीं होता कि फेर-बदल हुई है। साक्ष्यों की आवश्यकता होती है। अब यह तो लोगों का काम है, यह साबित करना कि इसमें फेर-बदल हुई है। मैं तो नहीं कर सकती।
      शंका तो किसी भी धर्म पुस्तक के बारे में हो सकती है, चाहे वो रामायण हो, महाभारत हो या रामचरित मानस, या फिर बाईबल या कुरआन। इस बात की ही क्या गारन्टी है कि रामचरित मानस वही रामचरित मानस है जिसे तुलसी ने लिखा था। यह तो मानने की बात है। अगर हम अच्छी बातें देखते हैं तो मान लेते हैं कि यही सही है, लेकिन कहीं भी कुछ हमारे मत से भिन्न होता है, हम शंका कर बैठते हैं।

      हर रचनाकार अपनी रचना अपनी, कल्पना, साक्ष्य और अपनी दृष्टिकोण से लिखता है, और हर पाठक उसे पढ़ कर अपना व्यक्तिगत अर्थ ढूंढ लेता है। क्योंकि पाठक उस रचना के पात्रों से स्वयं को एकसार करने की कोशिश करता है। यह सत्य किसी भी काल, सन्दर्भ में रची गयी रचनाओं के लिए है। पाठक के दृष्टिकोण पर न रचनाकार अंकुश लगा सकता है न ही दूसरे पाठक। समस्या तब आती है जब हम दूसरों पर अपना मंतव्य थोपने की कोशिश करते हैं। अपनी जगह से देखने पर हर व्यक्ति को अपनी बात सही ही लगती है। जैसे दूसरे इसी प्रसंग को राम की तरफ से देख रहे हैं जबकि मैं उसी प्रसंग को सीता की तरफ से देख रही हूँ।

      इस कथा से क्या सीखा है जनसमुदाय ने यह तो, आज का समाज और आजकी सामजिक स्थिति ही बाताएगी, आकलन करने के लिए सभी
      स्वतंत्र हैं, क्योंकि मैं जो देखती हूँ और दूसरे जो देखते हैं, उस देखने-देखने में भी फर्क होगा ही।
      पुनः आपका धन्यवाद, आपके अमुल्य विचारों के लिए...

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  16. अत्यन्त गाढ़े भावों से भरा है यह प्रकरण, जो व्यक्ति अपनी पत्नी का वियोग, कुल की मर्यादा और युद्ध सा कर्म सह रहा हो, उसके मुख से क्रोध से प्रतीत होने वाले वचन स्वाभाविक हैं। मर्यादा और त्याग को महानतम आदर्श मानने वाले युगल से और क्या निचोड़ लेना चाहते हैं आज के विद्ववत्जन। मैं तो राम का चरित्र जितनी बार पढ़ता हूँ, आँखों में आँसू आ जाते हैं।

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  17. असली रामायण पुस्तक कहाँ मिल सकती है?

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