Thursday, September 30, 2010

इक ज़रा मेरी भी नज़र, भर जाए तो अच्छा है....




आज मेरी आँख से तू, उतर जाए तो अच्छा है
इस दिल से निकल अपने घर, जाए तो अच्छा है

नाज़ुक है बड़ा ख्वाब जो, मैंने छुपा रखा है
छूटे वो हाथों से, बिखर जाए तो अच्छा है

माना ग़ज़लगोई, पेचीदगियों का मसला है
इक शेर हमसे भी, अब सँवर जाए तो अच्छा है

बिठाया है दरबान, इस दिल के दरोदाम पर
तू इनकी नज़र बचा, गुज़र जाए तो अच्छा है

घटाएँ घटाटोप 'अदा', रेत की घिर आई हैं
इक ज़रा मेरी भी नज़र, भर जाए तो अच्छा है

15 comments:

  1. दुनिया की निगाहों में,
    भला क्या है, बुरा क्या है,
    ये बोझ अगर दिल से,
    उतर जाए तो अच्छा,
    ये जुल्फ अगर खुल के,
    बिखर जाए तो अच्छा...

    जय हिंद...

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  2. रिपीट ब्लॉग्कास्ट है न ये?
    लेकिन कहा बहुत खूब है। और चित्र...आपका चित्र संयोजन भी बहुत उम्दा है।

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  3. एक शेर अब हमसे भी संवर जाए तो अच्छा ...
    क्या बात है ...
    चित्रों का आपका कलेक्शन और सलेक्शन शानदार है ...!

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  4. घटाएँ घटाटोप 'अदा', रेत की घिर आई हैं
    इक ज़रा मेरी भी नज़र, भर जाए तो अच्छा है

    बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल है.... हर एक शेर खूबसूरत है.


    एक नज़र यहाँ भी डालें:
    राष्ट्रमंडल खेल

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  5. अच्छेपन के साथ इतनी सारी उम्मीदें ! अच्छाई के लिए इतनी सारी दुआएं ...अच्छी लगीं :)

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  6. कुछ एकाद दिन की खोमोशी के बाद,
    तेंदुलकर यूँ फोर्म में आए तो अच्छा है.

    बढ़िया ग़ज़ल, लिखते रहिये ....

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  7. लाजवाब !

    वाह वाह बहुत ख़ूब ग़ज़ल..........

    आपको बाँच कर मुझे भी मेरी इसी ज़मीन पर लिखी गई एक पुरानी ग़ज़ल याद आ गई

    बधाई हो !

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  8. `नाज़ुक है बड़ा ख्वाब जो, मैंने छुपा रखा है’
    मुझ से मत पूछ मेरे इश्क में क्या रखा है :)

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  9. सब कुछ बहुत अच्छा है ।

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