Monday, September 20, 2010

तुझको मुबारक हों तेरे बन्दूक औ तमंचे....




न मंदिर न मस्जिद न कोई धरम चाहिए
इंसानियत मिले वो दैर-ओ-हरम चाहिए

मेरी ख्वाहिशों की मुझसे सरहद न पूछ
कम से कम मुझे दोआलम चाहिए
 
तुझको मुबारक हों तेरे बन्दूक औ तमंचे
मुझको तो बस मेरी कलम चाहिए
 
मौत से मुझे कोई शिकायत ही नहीं  
फिलहाल ज़िन्दगी का भरम चाहिए 

दैर-ओ-हरम=मंदिर-मस्जिद 
दोआलम=दोनों जहान
माँ को देख कर बचपन में पहुँच गई हूँ....इस समय तीन पीढियां एक साथ रह रहीं हैं...:):)

 

27 comments:

  1. अदा जी आजकी ग़ज़ल के तो क्या कहने. वाह बहुत सुंदर.

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  2. न मंदिर न मस्जिद न कोई धरम चाहिए
    इंसानियत मिले वो दैर-ओ-हरम चाहिए

    बहुत सुन्दर ... इंसानियत खुद धरम है.
    तीन पीढियाँ एक साथ .. त्रिवेणी

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  3. तुझको मुबारक हों तेरे बन्दूक औ तमंचे
    मुझको तो बस मेरी कलम चाहिए..
    जब काम सुई कर सकती है , तलवार की जरुरत क्या है ...
    ये हुई ना कोई गल समझदारी वाली ...:):)
    माँ ,बाबूजी को प्रणाम कहियेगा ...!

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  4. @तुझको मुबारक हों तेरे बन्दूक औ तमंचे
    मुझको तो बस मेरी कलम चाहिए

    सही है दीदी , क्योंकि राइटर [मतलब फाइटर ] हमेशा जीतता है :)

    फोटो दोनों बढ़िया लगे

    हाँ अब बात फेमिली फोटो की
    सबसे पहले तो हम से ये बेहद प्यारी तस्वीर शेयर करने का आभार
    आप से तो ब्लॉग पर बात होती रहती है
    इ - भांजी तक भी स्नेह आपने पिछली बार पहुंचा ही दिया था
    इस बार खासतौर से माता जी जो प्रणाम और चरण स्पर्श कहियेगा
    आप तीनो ही बड़े क्यूट लग रहे हो

    ये मेरा फोटो
    (\__/)
    (='.'=)
    (")_(")

    दोआलम ??
    दैर-ओ-हरम ??

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  5. तुझको मुबारक हों तेरे बन्दूक औ तमंचे
    मुझको तो बस मेरी कलम चाहिए
    ..बहुत खूब।

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  6. ्सुंदर विचारों की अभिव्यक्ति

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  7. bahut hi umdaah rachna....
    ----------------------------------
    मेरे ब्लॉग पर इस मौसम में भी पतझड़ ..
    जरूर आएँ..

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  8. खूबसूरत...इंसानियत के ज़ज्बे से भरपूर पोस्ट ! पर ...

    बन्दूक औ तमंचे वो रखें , कलम आप रखिये, हमें तो बस 'की-बोर्ड' की दरकार है :)

    आज बस एक सुझाव ...कम्प्यूटर के सामने से फ़ौरन हटिये ! जाइये बिटिया की नज़र उतारिये ! भले ही मैं पुरातनपंथी लगूं तो भी !

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  9. दीदी,

    अली जी के सुझाव से मैं भी सहमत हूँ :)

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  10. कविता में चित्र और चित्र में कविता।
    संग्रहणीय चित्र है, भावों से साराबोर।
    माता जी को मेरा प्रणाम।

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  11. @ गौरव...
    तुम्हारा सन्देश दे दिया है..माँ ने तुम्हें ढेर सारा आशीर्वाद दिया है...
    जिन शब्दों के अर्थ तुमने पूछे थे वो लिख दिया है मैंने..

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  12. धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
    मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
    पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
    कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला...

    जय हिंद...

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  13. अमन का संदेश, सार्थक प्रस्तुति! बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    समझ का फेर, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वरूप की लघुकथा, पधारें

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  14. मेरी ख्वाहिशों की मुझसे सरहद न पूछ
    कम से कम मुझे दोआलम चाहिए

    तुझको मुबारक हों तेरे बन्दूक औ तमंचे
    मुझको तो बस मेरी कलम चाहिए
    अदा जी बहुत खूब कहा। बधाई।

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  15. हमारी कामना तो ये है कि मंदिर भी हो, मस्ज़िद भी हो और इंसानियत उनसे पहले हो। और यकीन मानिये इंसानियत मरी नहीं है, मर सकती भी नहीं।

    आपका अकेला शेर शेरों की बिरादरी में आकर और भी जम रहा है।
    बंदूक तमंचों के मुकाबिल कलम ज्यादा ताकतवर और धारदार होती है, ऐसे ही आपकी कलम चलती रहे, यही कामना है।
    दो माँओं और दो बेटियों वाली पारिवारिक तस्वीर(त्रिवेणी)भी अच्छी लगी।

    आभार।

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  16. न मंदिर न मस्जिद न कोई धरम चाहिए
    इंसानियत मिले वो दैर-ओ-हरम चाहिए

    वाह क्‍या रचना है !!
    तीन पीढियां एक साथ .. रांची पहुंच गयीं क्‍या ??

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  17. भई सच कहूँ तो शेरो शायरी समझने में मैं हु कमजोर

    पर कल आज और कल का मिलन फैलाये खुशियाँ चहुँ ओर.

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  18. ‘मेरी ख्वाहिशों की मुझसे सरहद न पूछ’
    हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी की हर ख़्वाहिश में दम निकले :)

    तीन पीढियों के सुंदर चित्र के लिए आभार। तीन पीढियां फलती-फूलती रहे, यही प्रार्थना ॥

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  19. न मंदिर न मस्जिद न कोई धरम चाहिए
    इंसानियत मिले वो दैर-ओ-हरम चाहिए
    अदा जी, बहुत ही सारगर्भित पंक्तियों का सृजन किया है आपने। जयशंकर प्रसाद जी ने कहा था, "इंसानियत का एक पक्ष यह भी है जहां वर्ण, धर्म और देश को भूल कर इंसान, इंसान के लिए प्यार करता है।" (एक घूंट) और उन्होंने यह भी कहा था, "जिसे काल्पनिक देवत्व कहते हैं, वही तो सम्पूर्ण इंसानियत है।" (अजातशत्रु)और उन्होंने यह भी कहा था "इंसानियत का नाश करके कोई धर्म नहीं रह सकता है।" (दैवरथ) आपने एक शे’र में ये बातें कह दी है। आपको सलाम।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

    और समय ठहर गया!, ज्ञान चंद्र ‘मर्मज्ञ’, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

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  20. बहुत ही खूबसूरत एहसासों को ग़ज़ल के रूप में उकेरा है आपने. मंदिर और मस्जिद लोगों में एकता बढ़ने के लिए बनाए जाते हैं, अगर किसी धर्म स्थल का लोग दुश्मनी बढ़ने के लिए प्रयोग करते हैं, तो कोई आवश्यकता नहीं है उसकी.

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  21. आपके कलम वाले शेर को पढ़कर दिनकर की वो पंक्तियाँ याद आती हैं

    दो में से तुम्हें क्या चाहिए कलम या कि तलवार,
    मन में ऊँचे भाव या तन में शक्ति अजेय आपार

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  22. अरे नहीं संगीता जी...
    हम राँची में होते तो आपको पता नहीं होता क्या..?
    मा-पिताजी कनाडा आए हुए हैं...

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  23. तुझको मुबारक हों तेरे बन्दूक औ तमंचे
    मुझको तो बस मेरी कलम चाहिए
    वाह क्या बात कही है ....और इस तस्वीर के तो कहने ही क्या आपके चहरे पर माँ के आचल को पाने का सुकून साफ़ दिखाई देता है .

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  24. यदि लोग हथियारों की ताकत कि बजाए कलम और शब्दों कि ताकत का प्रयोग करना सीख जाएं तो आपसी रंजिश का समाधन कितना आसान हो जाये।
    किंतु फिर नेता लोग क्या करेंगे? उनका क्या होगा? उनकी रोज़ी रोटी कैसे चलेगी?

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