Thursday, September 2, 2010

आज सिर्फ़ एक शेर ...आपकी नज़र..


आज सिर्फ़ एक शेर ...आपकी नज़र..

मेरी ख्वाहिशों की सरहद न पूछ
कम से कम मुझे दोआलम चाहिए

और अब एक गीत.....शायद पसंद आ जाए जी...

22 comments:

  1. जो हमने दास्तां अपनी सुनाई...बहुत सुन्दर.

    शेर: उम्दा!!!

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  2. खुदा से दो आलम तो चाहा है पर
    कभी ये भी सोच उस को क्या चाहिए

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  3. ख्वाहिश और आलम के पार भी कुछ है ...

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  4. मेरी ख्वाहिशों की सरहद न पूछ
    कम से कम मुझे दोआलम चाहिए


    कभी कहीं सुना था कि कूज़ा में समंदर उतारने का भी हुनर होता है
    आप की ये दो पंक्तियाँ इसे सही साबित कर रही हैं
    बहुत खूब और आभार इतनी अच्छी पंक्तियाँ पढ़ने देने के लिए

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  5. बेहतरीन। लाजवाब।

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  6. सुन्दर गीत बहुत पसंद आया ...धन्यवाद !
    आपको सपरिवार श्री कृष्णा जन्माष्टमी की शुभकामना ..!!
    बड़ा नटखट है रे .........रानीविशाल
    जय श्री कृष्णा

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  7. मेरी ख्वाहिशों की सरहद न पूछ
    कम से कम मुझे दो आलम चाहिए …


    आप क्यों रोये … जो हमने दास्तां अपनी सुनाई

    ख़ूब है शे'र
    … … … और गीत !
    वाऽऽह !
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  8. Girijesh ji kahin :

    दो पंक्तियाँ अर्ज हैं:

    ख्वाहिशें कहाँ रहीं जो तुम मिल गए?
    मेरी नज़र में अब कोई क्षितिज नहीं।

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  9. इस ब्लाग पर अक्सर मीना कुमारी की तस्वीर देखते हुए ये ख्याल रहा...हम तेरे प्यार में सारा आलम खो...

    तो क्या वो अब बदल गई हैं :)

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  10. है तो एक मगर दस के बराबर

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  11. बिलकुल सही...
    मैं ज्यादा नहीं मांगती!!!
    हैना!?!?!?!
    हाँ नहीं तो!
    आशीष

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  12. अच्छी पंक्तिया है .........
    ( क्या चमत्कार के लिए हिन्दुस्तानी होना जरुरी है ? )
    http://oshotheone.blogspot.com

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  13. बहुत अच्ची रचना …………।उम्दा

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  14. वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  15. हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर शेर पे दम निकले :)

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  16. वामन अवतार ने तीन डग में सारी दुनिया नाप ली थी, आपने एक शेर में दो आलम की ख्वाहिश कर दी।
    बस इतना सा ख्वाब है?
    चित्र बहुत अच्छा है, गीत तो मधुर ही होगा।

    आभार स्वीकार करें कि हमारे खुदा को ज्यादा शेर नहीं पेश किये, हां नहीं तो।

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