Tuesday, September 14, 2010

तिनका ही था कमज़ोर सा, उसका मुक़द्दर, देखना ....


किस्मत की वीरानियों का, मेरा वो मंजर, देखना 
हैराँ हूँ घर की दीवार के, उतरे हैं सब रंग, देखना 

उड़ता रहा आँधियों में वो, जाने कितना दर-ब-दर 
तिनका ही था कमज़ोर सा, उसका मुक़द्दर, देखना

पोशीदा है ज़मीन के, हर ज़र्रे पर दिलकश बहार 
उतरो ज़रा आसमान से, आएगी नज़र वो, देखना

सोया किया क़रीब ही, फ़रिश्ता दश्त-ए-दिल का 
ख़ुशबू सी उसकी बस गई, महका है शजर, देखना 

7 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ....
    अच्छी पंक्तिया सृजित की है आपने ........
    भाषा का सवाल सत्ता के साथ बदलता है.अंग्रेज़ी के साथ सत्ता की मौजूदगी हमेशा से रही है. उसे सुनाई ही अंग्रेज़ी पड़ती है और सत्ता चलाने के लिए उसे ज़रुरत भी अंग्रेज़ी की ही पड़ती है,
    हिंदी दिवस की शुभ कामनाएं

    एक बार इसे जरुर पढ़े, आपको पसंद आएगा :-
    (प्यारी सीता, मैं यहाँ खुश हूँ, आशा है तू भी ठीक होगी .....)
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_14.html

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  2. कमजोर तिनका न कहो, हवा सुन लेगी,
    हमने आँसू में बहता हुआ तिनका देखा।

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  3. प्रत्येक शब्द दिल में उतर गया..........शुभकामनाये

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  4. क्या बात है!! बहुत खूब!


    हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

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  5. "सोया किया क़रीब ही, इक फ़रिश्ता दिल के दश्त में
    ख़ुशबू सी उसकी बस गई, महका है शजर, देखना"
    बेहद खूबसूरत पंक्तियां लगी ये भी, आभार स्वीकार करें।

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  6. ज़मीन के हर ज़र्रे में पोशीदा बहार का ख्याल , दर दर उड़ते फिरते तिनके के मुकद्दर का तिलस्म तोड़ ही देगा एक दिन ! मैंने पहले भी कहा है कि आपकी रचनाओं में छुपकर बैठी यही आस मुझे भाती है !

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  7. बहुत सोचने पर भी शब्द नहीं मिले ...
    इसलिए अली जी की टिप्पणी मेरी भी मानी जाए ..!

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