Tuesday, October 29, 2013

ग़र कोई आरज़ू हो तो अब मोहलत नहीं रही....

मामून कहीं रह जाऊँ, अब वो हाजत नहीं रही
ये दामन कहीं बिछ जाए, मुझे आदत नहीं रही

जिस्मों में ग़ैरों के भी यहाँ लोग जी लेते हैं 
हमको तो ख़ुद से भी अब, निस्बत नहीं रही

सलवटें आँखों पे, और माथे पे हैं पेचीदगियाँ 
बुझती शक्लों को आईने की ज़रुरत नहीं रही 

यूँ तो कई जन्मों के हैं, तेरे-मेरे मरासिम  
इक लम्हा मुझे मिलने की तुम्हें फुर्सत नहीं रही  

गुजरेंगे अब चार दिन 'अदा' पूरे अज़ाब में
कोई आरज़ू हो तो अब कोई मोहलत नहीं रही

मामून=सुरक्षित
हाजत=इच्छा/तमन्ना/ज़रुरत 
निस्बत=सम्बन्ध  
मरासिम=रिश्ता  
अज़ाब=ख़ुदा का क़हर

10 comments:

  1. बहुत ही उम्दा गजल....

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (30-10-2013) त्योहारों का मौसम ( चर्चा - 1401 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. यूँ तो कई जन्मों के हैं, तेरे-मेरे मरासिम
    इक लम्हा मुझे मिलने की तुम्हें फुर्सत नहीं रही ...

    गज़ब का शेर है इस गज़ल का ... हकीकत बयान है इस शेर में जीवन की ...

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  4. गहरी बातों से युक्‍त गजल।

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  5. इतने अच्छे शेर लिख कैसे लेती हैं आप
    और फिर भी कभी शायरा नहीं कहलाईं

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  6. दीपावली पर्व की हार्दिक बधाई शुभकामनाएं ....

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  7. सुन्दर ग़ज़ल

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