Monday, October 28, 2013

आख़िर कब तक ?

आस्था बहुत ही पवित्र भाव है, लेकिन यही आस्था अगर अंधी हो जाए तो वह अपना सही अर्थ खो देती है । अंधी अस्था में लिप्त लोगों से जीत पाना मुश्किल ही नहीं असंभव प्रतीत होता है । यह एक ऐसा रोग है जिसका निदान हक़ीम लुकमान के पास नहीं भी है । दूर क्यों जाना यहीं देख लीजिये सर्वश्री आसाराम के समर्थकों को ही । आसाराम पर रेप, यौन-शोषण जैसे कई संगीन इलज़ाम लग चुके हैं, लेकिन उनपर आस्था रखने वाले अभी तक आँख-कान बंद किये उनपर विश्वास किये जा रहे हैं, और इसी आस में बैठे हैं कि कोई न कोई चमत्कार होगा जो उनके आसाराम भगवान् को बचा लेगा, और वो एकदम साफ़-सुथरे होकर बाहर आ जायेंगे, और सबकुछ पाक-साफ़ हो जाएगा । जो भक्तगण यह दिवास्वप्न, आसाराम जैसे ढोंगी के लिए देख रहे हैं, उनकी आस्था अंधी नहीं है तो और क्या है?

फिलहाल आसाराम जेल की हवा खा रहे हैं, और उनका कुपुत्र नारायण साईं पुलिस के साथ चोर-सिपाही का खेल खेल रहा है । लेकिन धन्य हैं उनदोनों के अंध समर्थक जो अब भी उनको भगवान् ही माने बैठे हैं । अब भी यही कहा जा रहा है कि दोनों को साजिश के तहत फंसाया जा रहा है। ये सच है कि सारे मामले अभी अदालत में विचाराधीन हैं और दोनों अभी तक न्यायालय द्वारा दोषी करार नहीं दिए गए हैं, लेकिन सच तो यह भी है कि बाप-बेटे के खिलाफ रेप, यौन शोषण जैसे आरोपों और कई गवाहों के सामने आने के बाद ही आसाराम को हिरासत में लिया गया और जेल में डाला गया । नारायण सांई का इस तरह सिर पर पैर रखकर भागना और पुलिस से लुक्का-छुप्पी खेलना भी उसके दोषी होने की ही चुगली खा रहा है और इतना तो साबित कर ही रहा है दोनों इतने भी निर्दोष नहीं हैं, जितना वो आज तक लोगों को दिखाते आये हैं और जितना लोगों ने उनको समझ रखा है ।

बीच में आसाराम ने ये ड्रामा किया था कि उनकी याददाश्त चली गयी है, लेकिन लाई डिटेक्टर मशीन के डर से आसाराम की याददाश्त भी वापस आ गई, इतना ही नहीं जिन काली करतूतों को आसाराम ने संत का चोला ओढ़ कर अंजाम दिया था वो भी अब धीरे-धीरे उन्हें याद आने लगे हैं । अभी तक जिस लड़की को पहचानने तक से वो बार-बार इनकार कर रहे थे, उस लड़की की भी याद उन्हें आ गई । उनकी बयानबाज़ी में ऐसे बदलाव भी सोचने को मजबूर करते हैं 'दाल में कुछ काला है ।    

लेकिन वाह रे अंधी आस्था के अंधे लोग और उनका ये अँधा बाज़ार, जहाँ बड़े-बड़े पापियों को भी संत करार दिया जाता है । संत ही क्यों कभी-कभी तो उन्हें भगवान् से भी ऊँचा स्थान दे दिया जाता है । लेकिन लाख टके की बात तो ये है कि कब तक आसाराम, साईं नारायण, निर्मल बाबा जैसे ढोंगी, सीधे-सादे लोगों को बेवकूफ बनाते रहेंगे और कब तक अंध समर्थक उनके हाथों बेवकूफ बनते रहेंगे। … आख़िर कब तक ?

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (28-10-2013)
    संतान के लिए गुज़ारिश : चर्चामंच 1412 में "मयंक का कोना"
    पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. हम अपने गुणों के अनुसार जैसा गुरु चाहते हैं, मिल जाता है। चाह गहरी रहेगी तो राह बहरी कभी नहीं होगी।

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  3. मुझे तो ये मानवीय प्रवृत्ति ही लगती है कि अमूमन हम जिस मनोवृत्ति के होते हैं उससे मेल खाते हुए को ही अपने गुरु का मान देने लगते हैं , उसके बाद तो वो तथाकथित गुरु अपना लाभ भी देखने लगता हैं और अपनी सुविधानुसार अपनी मानसिकता का परिचय देने लगता है .......

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  4. अन्ध विस्श्वास को फैलाने वाले और उसका पोषण करने वाले यही धर्म के ठेकेदार ही है ,अंध विश्वासी नहीं रहेंगे तो आशा राम जैसों की दुकानदारी कैसे चलेगी ? धर्म जो सामाजिक कर्तब्य से सम्बन्ध रखता है ,जानबूझकर आध्यात्मिकता से जोड़कर लोगों में भ्रम फैलाया गया है .
    नई पोस्ट सपना और मैं (नायिका )

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  5. विकट परिस्थिति है। देखिए आगे क्‍या होता है। पर दिन गुजरने के साथ गम्‍भीर से गम्‍भीर और अति संवेदनशील घटनाएं सामूहिक विस्‍मृति का शिकार होती जा रही हैं। ऐसे में सामाजिक उपाय होना दूभर लगता है।

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  6. करीब बारह साल पहले , टी.वी. पर उनका प्रवचन आ रहा था और मेरी सासु जी देख रही थीं ..आसाराम ने महिलाओं के लिए कुछ ऐसी derogatory बातें कहीं....जो मुझे बहुत ही निंदनीय लगीं और उसके बाद से ही मेरे लिए उनका कोई अस्तित्व नहीं है ...लोग इन बाबाओं के पास क्यूँ जाते हैं...इसपर तो शोध होना चाहिए .

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    1. वही तो! कुछ लोगों की असलियत किसी भी तरह छिप नहीं पाती। उसके बावजूद भी इतने अनुयायियों का जोश देखकर आश्चर्य होता है। दुर्भाग्य से हमारी न्याय व्यवस्था कमजोर और जटिल तो है ही, उसमें फ़ाल्स नेगेटिव स्वीकार्य हैं, फ़ाल्स पॉज़िटिव नहीं। इसलिए हज़ार गुनहगार आराम से बरी हो सकते हैं, होते ही हैं। आश्रम में अपराध हुये हैं यह तो स्पष्ट है। ज़िम्मेदारी किसी पर सिद्ध हो पाये या नहीं, वह अलग बात है।

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  7. दरअसल लोग इन बाबाओं के पास मन की सुख शांति और भविष्य में कुछ अच्छा हो जाये, इसके लिये जाते हैं, परंतु ये धूर्त बाबा लोग इन सबका गलत फ़ायदा उठाते हैं, यह भी बहुत बड़ा व्यापार हो गया है जिस पर कोई आयकर नहीं है कोई भी अन्य कर नहीं है। जैसा कि हमारे पुराणों में कहा गया है कि ज्ञान पाने के लिये गुरू का होना जरूरी है, बस लोग इतनी सी बात को पकड़ लेते हैं, परंतु उन्हीं पुराणों में गुरू में क्या होना चाहिये यह भी बताया गया है, वह नहीं समझते ।

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  8. many woman who have impotent husband are taken by their mother in laws to these people for "treatment " they come back and they are found to be ''pregnant"

    teenager girls are taken by their parents to these people because parents find these girls violent and unruly and want them to be submissive

    they come back after treatment and are found to be "subdude" and "silent" and also such girls many a times insist to be taken back for "treatment "

    the lesser said is better but yes its important to raise our voices against such people and you did
    thanks

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  9. उघरे अंत न होई निबाहू कालनेमि जिमी रावण राहू

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