Thursday, October 3, 2013

कोई-कोई ही यहाँ, माहिर संगतराश है....



आदमियत खो गई, आदमी हताश है  
हुज़ूम-ए-आदमी में अब, आदमी की तलाश है 

दोज़-ज़िन्दगी हो गई, साग़र की गोद में  
पर ख़ुश्क-खुश्क़ गला रहा, और हर तरफ प्यास है  

वो चीज़ हमारी भी है, और चीज़ हमारी नहीं  
उस ख़ुदा ने रच दिया, इक ग़ज़ब कयास है  

हबीब रह रहे यहाँ, अजनबी लिहाफ़ में 
कुछ जिस्म अजनबी से हैंबे-तक़ल्लुफ़ लिबास है   

सम्हल-सम्हल के चल रहे, इश्क़ के मक़ाम तक

कई जगह फ़रेब का, दिख रहा निवास है  


वो सर-बसर हो गया, मेरी क़ायनात पर 
मेरी ही जान जाने क्यों, थोड़ी सी उदास है 

है फ़रेब इक फ़न 'अदा',और सारे फ़नकार नहीं 
कोई-कोई ही यहाँ, माहिर संगतराश है

26 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार - 04/10/2013 को
    कण कण में बसी है माँ
    - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः29
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  2. आपकी लिखी रचना की ये चन्द पंक्तियाँ.........
    आदमियत खो गई, आदमी हताश है
    हुज़ूम-ए-आदमी में अब, आदमी की तलाश है
    दोज़-ज़िन्दगी हो गई, साग़र की गोद में
    और ख़ुश्क-खुश्क़ गला रहा, हर तरफ प्यास है
    शनिवार 05/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    को आलोकित करेगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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    1. शुक्रिया, करम, मेहरबानी,
      जुग-जुग जीओ यशोदा रानी :)

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (04-10-2013) लोग जान जायेंगे (चर्चा -1388) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. हृदय से आभार शास्त्री जी।

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  4. हर सतरें इक आह उकेरती हुईं

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  5. कोई-कोई ही यहाँ, माहिर संगतराश है....


    आदमियत खो गई, आदमी हताश है
    हुज़ूम-ए-आदमी में अब, आदमी की तलाश है

    दोज़-ज़िन्दगी हो गई, साग़र की गोद में
    और ख़ुश्क-खुश्क़ गला रहा, हर तरफ प्यास है

    वो चीज़ हमारी भी है, और चीज़ हमारी नहीं
    उस ख़ुदा ने रच दिया, इक ग़ज़ब कयास है

    हबीब रह रहे यहाँ, अजनबी लिहाफ़ में
    कुछ जिस्म अजनबी से हैं, बे-तक़ल्लुफ़ लिबास है

    सम्हल-सम्हल के चल रहे, इश्क़ के मक़ाम तक
    कई जगह फ़रेब का, दिख रहा निवास है

    वो सर-बसर हो गया, मेरी क़ायनात पर
    मेरी ही जान जाने क्यों, थोड़ी सी उदास है

    है फ़रेब इक फ़न 'अदा',और सारे फ़नकार नहीं
    कोई-कोई ही यहाँ, माहिर संगतराश है

    सारे अशआर सम्भाल के रख लो यारों वक्त बे -वक्त काम आयेंगे

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    1. शर्मा जी, बेशक़ सम्हाल लिया जाये
      कौन जाने, आड़े वक्त, क्या काम आ जाए :)

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  6. वो चीज़ हमारी भी है, और चीज़ हमारी नहीं
    उस ख़ुदा ने रच दिया, इक ग़ज़ब कयास है !

    मिल जाए तो मिटटी है , खो जाए तो सोना है !!

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    1. दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है !

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  7. दोज़-ज़िन्दगी हो गई, साग़र की गोद में
    पर ख़ुश्क-खुश्क़ गला रहा, और हर तरफ प्यास है

    अरी अदा !! नमकई नमक हो गया :-)

    बहुत बढ़िया ग़ज़ल...
    अनु

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    1. अरी !! वोई तो :)
      ज़ुबां पे लागा, लागा रे नमक……:)

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  8. सम्हल-सम्हल के चल रहे, इश्क़ के मक़ाम तक
    कई जगह फ़रेब का, दिख रहा निवास है
    बहुत उम्दा ग़ज़ल
    नवीनतम पोस्ट मिट्टी का खिलौना !
    नई पोस्ट साधू या शैतान

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    1. और ज़िन्दगी हाय बाय है :)

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    1. बहुत धन्यवाद और खूब आभार !

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  11. Har shabd har line khubsurat aur behatarin
    LOVE IT

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  12. आदमियत खो गई, आदमी हताश है
    हुज़ूम-ए-आदमी में अब, आदमी की तलाश है ....
    वो चीज़ हमारी भी है, और चीज़ हमारी नहीं
    उस ख़ुदा ने रच दिया, इक ग़ज़ब कयास है
    संगतराश की क़ाबलियत को कैसे कोई चुनोति दे सकता है.

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  13. सच है..क्या कीजियेगा.

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