Friday, October 11, 2013

उफ़क से ये ज़मीं क्यूँ, रूबरू नज़र आए.....


तेरा जमाल मुझे क्यूँ, हर सू नज़र आए
इन बंद आँखों में भी, बस तू नज़र आए

सजदा करूँ मैं तेरी, कलम को बार-बार
हर हर्फ़ से लिपटी मेरी, आरज़ू नज़र आए

गुज़र रही हूँ देखो, इक ऐसी कैफ़ियत से
ख़ामोशियों का मौसम, गुफ़्तगू नज़र आए

फासलों में क़ैद हो गएये दो बदन हमारे 
पर उफ़क से ये ज़मीं क्यूँ, रूबरू नज़र आए

वो संदल सा गमके 'अदा' और कुंदन सा दमके 
उसकी बेक़रार सी आँखें, क्यूँ पुर-सुकूँ नज़र आये 

उफ़क= क्षितिज
जमाल=खूबसूरती
कैफ़ियत= मानसिक दशा
गुफ़्तगू=बातचीत
रूबरू=आमने-सामने

10 comments:

  1. आपकी लिखी रचना की ये चन्द पंक्तियाँ.........
    तेरा जमाल मुझे क्यूँ, हर सू नज़र आए
    इन बंद आँखों में भी, बस तू नज़र आए
    सजदा करूँ मैं तेरी, कलम को बार-बार
    हर हर्फ़ से लिपटी मेरी, आरज़ू नज़र आए
    शनिवार 12/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    को आलोकित करेगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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  2. दीदी
    शुभ प्रभात
    वो......
    संदल सा गमके
    'अदा'
    और कुंदन सा दमके
    सादर
    उसकी बेक़रार सी आँखें, क्यूँ पुर-सुकूँ नज़र आये

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  3. बहुत ही सुन्दर, एक स्तर ऊँचा निकला जा रहा है पर, अब बुढ़ापे में उर्दू कहाँ से सीखें।

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  4. सुन्दर प्रस्तुति ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (12-10-2013) को "उठो नव निर्माण करो" (चर्चा मंचःअंक-1396) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. Bahut Khoob Likha Aapne, Hum Aapke Abhari Hain, Hume Kavityen Padhne Ka Shuak Bachpan Se Hi.

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  6. बहुत खूबसूरत
    गुज़र रहे हैं अजब मरहलों से दीदाओ दिल
    सुबह की आस तो है ज़िन्दगी की आस नहीं

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  7. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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