Tuesday, November 5, 2013

रिपोर्ट....रिपोर्ट.....एक सच्ची घटना....



सुना है,  आज वो पकड़ी गई...
शायद,
उसका नकारा पति, आवारा देवर, और वहशी ससुर 
उसे बाल से पकड़ कर घसीटते हुए ले आये होंगे
लात, घूसे, जूते से मारा होगा  
सास की दहकती आँखें,
उस दहकते हुए सरिये से कहाँ कम रही होगी,
जो बड़े एहतियात से मुट्ठी में ज़ब्त होगी, 
उसका मुंह बाँध दिया गया होगा,
आवाज़ हलक में हलाक़ हो गई होगी,
दहकता हुआ सरिया नर्म चमड़ी पर,
अनगिनत बार फिसल गया होगा,
'दाग दो साली नीपूती कुलटा को',
आँखों की दहशत काठ बन गई होगी, 
'कुलच्छिनी, कमीनी, वेश्या,
घर की इज्ज़त बर्बाद कर दी है...
इसका ख़त्म हो जाना ही बेहतर है ..'
यही फैसला हुआ होगा 
और फिर सबने उसे उठा कर फेंक दिया होगा...
रसोई घर में...
तीन बोतल किरासन तेल में, 
उसके सपने, अरमान, विश्वास, आस्था 
सब डूब मरे होंगे,
पहली बार उत्तेजित.. उसके पति ने, 
जिसकी इज्ज़त से वो खेलती रही थी !!
ने दियासलाई सुलगा दी होगी...

स्थिर आँखों से उसने अपने पति को देखा होगा
"काश !!"
फिर छटपटाती आँखों से उसने पूछा भी  होगा
'क्यों' ??

किसी ज़िबह होते जानवर सी वो घिघियाई होगी 
नज़रों के सामने कितनी रातें तैर गयीं होंगी
जब उसने खुद को तलहटी तक नीचे गिराया था ..

काँपा तो होगा हाथ उसके पति का...
पर उससे क्या ???
आज वो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट बन गई, 
'कुँवारी' बताया है उसे..!!
सुबह, एक और रिपोर्ट आई थी...डाक्टर की
जो रसोई घर में घटित ....
इस अप्रत्याशित दुखद दुर्घटना 
में जल कर राख हो गई....!!!

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (05-11-2013) भइया तुम्हारी हो लम्बी उमर : चर्चामंच 1420 पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    दीपावली के पंचपर्वों की शृंखला में
    भइया दूज की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर एवं मार्मिक भावाव्यक्ति..

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  3. स्थिर आँखों से उसने अपने पति को देखा होगा
    "काश !!"
    फिर छटपटाती आँखों से उसने पूछा भी होगा
    'क्यों' ??....................इन दो पंक्तियों ने इतना कुछ कह दिया कि मन ही मन में आपकी संवेदना के साथ खड़ा हूँ। कविता पढ़कर झिरझिराहट हो आई।

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  4. उफ़्फ़ क्या कहूँ ... अत्यंत मार्मिक पोस्ट ...सच्चाई का आईना दिखती सार्थक भावअभिव्यक्ति ...

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  5. राक्षसों का कोई अलग गाँव नहीं होता। ये हमारे बीच ही रहते हैं, घुले-मिले। इसी समाज में। उफ़्फ़...।

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  6. ओह्ह!! कैसा लोमहर्षक चित्र खींचा है..पढ़ते वक़्त तो हम जल्दी से एक पंक्ति से दूसरी पंक्ति तक पहुँचने को आतुर थे क्यूंकि पढ़ना मुश्किल हो रहा था ...पर लिखना एक आग का दरिया से गुजरने जैसा रहा होगा. यही सब गुजरा होगा पीडिता के मन में , जिसकी कल्पना भी इतनी भयावह है.
    , कल ही एक खबर पढ़ी...एक सत्रह साल की लड़की अपने प्रेमी के साथ शादी कर गाँव से भाग कर मुम्बई आ गयी थी ...पिछले आठ महीने से उनलोगों ने अपनी गृहस्थी यहाँ बसा ली थी . एक दिन उसके गाँव के एक आदमी ने उन्हे देख लिया कर उसके पिता को खबर कर दी...पिता ने मिलने के बहाने बेटी को बुलाया और उसका रेप करके उसकी ह्त्या कर दी...अपना पिता और ऐसी हरकत.. लिखते वितृष्णा हो रही है...पर ये स्थिति है समाज में स्त्रियों की .

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    1. छी: छी: !!
      कभी-कभी ऐसा लगता है ये दुनिया अब रहने के लायक नहीं रही :(

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  7. जुल्म की दास्तान

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  8. मर्म-स्पर्शी

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