Saturday, August 17, 2013

फिर भी बनाऊँगी मैं, एक नशेमन हवाओं में........

मेरे इश्क़ का ज़ुनून, रक़्स करता है इन फिज़ाओं में,
तेरे फ़रेब कुचलते हैं मुझे, मेरे दर्द की छाँव में
हर साँस से उलझती है मेरी, हर लम्हा ज़िन्दगी की, 
लिपटती जाती है हर रोज़, उम्र की ज़ंजीर पाँव में
अब ये पागलपन मेरा, बरामद करवाएगा मुझे,
कब तक छुपूँगी मैं कहो, सदियों की गुफाओं में 
आंधियाँ मुझसे अब भी, हर दुश्मनी निभातीं हैं,
फिर भी बनाऊँगी मैं, इक नशेमन हवाओं में...!

रक्स=नृत्य
नशेमन=घोंसला

10 comments:

  1. हौंसला हवाओं को बाँध ले जायेगा।

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  2. घोंसले की आशा अच्‍छी है।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल रविवार (18-08-2013) को "नाग ने आदमी को डसा" (रविवासरीय चर्चा-अंकः1341) पर भी होगा!
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. इसमें कोई गाना काहे नहीं है?

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  5. सुन्दर प्रस्तुति

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  6. जानते हैं जिद्दी तो आप हैं ही :)

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  7. मसूबे जबर्दस्त हैं -आगे खुदा खैर करे :-)

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  8. ये हौसले....ये अदा............
    क्या बात है :-)

    अनु

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  9. आंधियाँ मुझसे अब भी, हर दुश्मनी निभातीं हैं,
    फिर भी बनाऊँगी मैं, इक नशेमन हवाओं में...!

    बुलंद हौसले के लिए बधाई

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  10. बहुत सुंदर ! जितनी सार्थक रचना उतनी ही कलात्मक ! शुभकामनायें !
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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