Thursday, August 19, 2010

'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!




हर मकान की,
हर ईंट,
मूक साक्षी है,
प्यार, तिरस्कार
लगाव, अलगाव
करुणा, क्रूरता
सम्मान, अपमान
विश्वास, अविश्वास
जैसी अनगिनत 
संवेदनाओं की,
दर्ज हो जाते हैं
प्रत्यक्ष, परोक्ष
रिश्तों के अनगिनत रंग
और
बाशिंदों के मनोभाव
इन्हीं पत्थरों में
जो काल में उतरने लगते हैं,
अफ़सोस !
बेमौसम...
जगमग होते मकानों में
विश्वास के दीये
कितने बुझे होते हैं,
जब तक...
विश्वास का
एक दीया नहीं जगेगा
'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!

अब एक गीत ...अरे सुन भी लीजिये...इतना भी बुरा नहीं है...!

32 comments:

  1. जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!

    ये पंक्तियाँ पढ़ते हुए चेहरे पर एक निर्मल मुस्कराहट आ गयी और मुख से निकला "वाह , क्या भाव हैं "
    [गाना सुनना अभी बाकी है]

    ReplyDelete
  2. सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

    ReplyDelete
  3. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  4. जगमग होते मकानों में
    विश्वास के दीये
    कितने बुझे होते हैं,
    जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!


    बेहतरीन भाव लिए आपकी रचना अच्छी लगी

    ReplyDelete
  5. जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!
    यकीनन .. मकाँ को घर बनाने के लिये विश्वास का दीया तो जरूरी है ही ...
    बेहद खूबसूरत भाव

    ReplyDelete
  6. आप की रचना 20 अगस्त, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

    ReplyDelete
  7. जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!
    सच्चाई को वयां करती अच्छी रचना ,बधाई

    ReplyDelete
  8. इस भौतिक जगत में यह कविता समय चक्र के तेज़ घूमते पहिए का चित्रण है। कविता की पंक्तियां बेहद सारगर्भित हैं।

    ReplyDelete
  9. विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!


    Subhaanallah!!! kahe bina nahin rah sake

    ReplyDelete
  10. सहमत हूं मैं आपकी बात से.

    ReplyDelete
  11. बहुत ही खूब सूरत रचना है ....
    मकान से घर तक का शफर रिश्तों की बुनियाद पर ही तय होता है

    ReplyDelete
  12. विश्वास के दियों का प्रकाश ही ईटों में भाव भरता है।

    ReplyDelete
  13. Bilkul sahi baat kahi aapane is sundar rachana ke madhyam se ....dhanywaad.

    ReplyDelete
  14. सुन्दर कविता है अदा जी.

    ReplyDelete
  15. कामना करते हैं कि हर मकाँ में विश्वास के दीये जगमगायें और घरों की सँख्या बढ़े।

    वैसे चित्र तो एकदम जगमग-जगमग है और गाना हमेशा की तरह शानदार। हमारी पसंद की आवाज के बारे में बुरा, इतना भी बुरा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने पर आप पर अवमानना का मुकदमा दायर किया जा सकता है, सोच लीजियेगा। फ़िर बेशक आप कहती रहें कि हम तो मज़ाक कर रहे थे,हां नहीं तो......।

    ReplyDelete
  16. कविता पढ़ी.. पढ़ी.. पढ़ी और बढ़िया लगी..

    ReplyDelete
  17. बहुत सुन्दर रचना!
    --
    गीत भी अच्छा है!

    ReplyDelete
  18. जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!

    कितनी सही बात कही है ।

    ReplyDelete
  19. जब तक विश्वास का दिया नहीं जलेगा ...
    मकान घर नहीं बनेगा ...

    बिलकुल सही बात ....

    मकानों में अक्सर घर को ढूंढते रहे हैं लोंग ...अपनी एक पुरानी कविता याद आ गयी ...देखूं पलट कर डायरी में शायद मिल जाए ..!

    ReplyDelete
  20. सही कहा आपनें ईंटें केवल साक्षी हो सकती हैं,शॆष सभी कुछ इंसानों से तय होना है ,प्रेम,
    स्नेह,करुणा,विश्वास से घर या फिर नफरत,
    क्रूरता, हिंसा से क़त्लगाह ,मकबरा !

    ReplyDelete
  21. बहुत अच्छी कविता।

    ReplyDelete
  22. जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....

    -बहुत जबरदस्त!

    ReplyDelete
  23. जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!
    yakeenan

    ReplyDelete
  24. बेमौसम...
    जगमग होते मकानों में
    विश्वास के दीये
    कितने बुझे होते हैं,
    जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा..

    बहुत सटीक और सार्थक रचना ....

    ReplyDelete
  25. घर के लिये यह ज़रूरी शर्त है

    ReplyDelete
  26. जब तक...
    विश्वास का
    एक दीया नहीं जगेगा
    'मकाँ', 'घर' नहीं बनेगा....!!
    Sahee kahaa aapne !

    ReplyDelete
  27. जबतक
    विश्वास का एक दिया नहीं जेगेगा
    "मकाँ" घर नहीं बनेगा.....

    क्या बात कह दी है आपने....आपके और आपके कलम के आगे नतमस्तक हूँ...

    ReplyDelete
  28. बेहतरीन गाया है, ये सच है की पहले पुराने गीतों को सुनते ही मुझे चेनल बदलने की में ही "फील गुड फेक्टर " नजर आता था
    आजकल परिस्थितिया बिलकुल उलट हैं, मुझे जानने वालों के लिए ये एक आश्चर्य है और तो और तमिल और तेलुगु सोंग्स पर भी मेरी खोज जारी है :)

    ReplyDelete