Monday, August 2, 2010

बात वो दिल की ज़ुबां पे कभी लाई न गई...



बात वो दिल की ज़ुबां पे कभी लाई न गई
चाह कर भी उनको ये बात बताई न गई

नीम-बाज़ आँखें लगा जातीं हैं सेक हमें
आब में डूबे रहे पर आग बुझाई न गई

कौन हैं हम, हैं कहाँ,क्यों हैं ये पूछा तुमने
थी खबर हमको मगर तुमसे बताई न गई

दर्द का दिल पे असर बड़ा है मुश्किल गुज़रा
बात यूँ बिगड़ी के फिर बात बनाई न गई

जुनूँ-ए-इश्क ने फिर ख़ाक में मिला ही दिया
सलवटें माथे की हमसे तो मिटाई न गई

हम यहाँ आधे बसे, आधे हैं अब और कहीं
ज़िन्दगी बँट गई पर दूरी मिटाई न गई

राह में उनकी नज़र हम हैं बिछाए बैठे
अब शरर ढूंढें कहाँ, रौशनी पाई न गई

कुछ तो है बात के चेहरे पे कई सोग दिखे 
हंसती है कैसे 'अदा' रुख से रुलाई न गई



18 comments:

  1. नीम-बाज़ आँखें लगा जातीं हैं सेक हमें
    आब में डूबे रहे पर आग बुझाई न गई


    -वाह! बहुत बेहतरीन!

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  2. दर्द का दिल पे असर बड़ा है मुश्किल गुज़रा
    बात यूँ बिगड़ी के फिर बात बनाई न गई

    लाजवाब

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  3. कौन हैं हम, हैं कहाँ,क्यों हैं ये पूछा तुमने
    थी खबर हमको मगर तुमसे बताई न गई

    बहुत बढ़िया है !!

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  4. हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गया,

    याद रह जाती है और वक्त गुज़र जाता है,
    फूल खिलता ही है, और खिल के बिखर जाता है,
    सब चले जाते हैं, कब दर्द-ए-जिगर जाता है,
    दाग जो तूने दिया, दिल से मिटाया न गया,

    हमसे आया न गया, तुमसे बुलाया न गया,
    फासला प्यार में दोनों से मिटाया न गया...

    जय हिंद...

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  5. aah nikli hai jo yoon daad ke badle uski..

    kuchh to samjhaa hai mere she'r se matlab meraa...

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  6. सुना डाले थे तुम्हे किस्से जहाँ के,
    जो बात कहनी थी सुनाई न गई।

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  7. दर्द का दिल पे असर बड़ा है मुश्किल गुज़रा
    बात यूँ बिगड़ी के फिर बात बनाई न गई...

    कितना मुश्किल हो जाता है ना कई बार बिगड़ी बात का बनना ...

    हम यहाँ आधे बसे, आधे हैं अब और कहीं
    ज़िन्दगी बँट गई पर दूरी मिटाई न गई...

    आज इतना दर्द कहाँ से भर लाई हो ग़ज़ल में ...
    हमें तो हंसती मुस्कुराती और ताने कसती अदा ही अच्छी लगती है ...

    लबों पर जिसके उदास मुस्कराहट तक हमें मंजूर नहीं
    सिसकियाँ लेकर जार -जार रुलाता है वही ...!

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  8. नीम-बाज़ आँखें लगा जातीं हैं सेक हमें
    आब में डूबे रहे पर आग बुझाई न गई


    जुनूँ-ए-इश्क ने फिर ख़ाक में मिला ही दिया
    सलवटें माथे की हमसे तो मिटाई न गई

    बहुत खूबसूरत गज़ल...

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  9. बहुत सुन्दर रचना, बेहद प्रभावशाली!

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  10. नीम-बाज़ आँखें लगा जातीं हैं सेक हमें
    आब में डूबे रहे पर आग बुझाई न गई


    -वाह! बहुत बेहतरीन!

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  11. बहुत जज़्बाती गज़ल लिखी है आपने।
    एक एक शेर तारीफ़ के काबिल है।
    आभार स्वीकार करे।

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  12. अरे दी क्या हुआ आज ये उदासी की चादर , ये माथे पर सिलवट .. ए दिल-अ-नादाँ तुझे हुआ क्या है?

    आशार गज़लों के बहुत शोर कर रहे हैं.
    दर्द के तरानों में जज़्बात ढल रहे हैं.

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  13. awesome! especially this line
    नीम-बाज़ आँखें लगा जातीं हैं सेक हमें
    आब में डूबे रहे पर आग बुझाई न गई

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