Monday, August 9, 2010

उलटबाँसी ....


समय का युधिष्ठिर फेंकता जाता कितने ही पाँसे
और शकुनी खाता जाता  हर कदम पर  झांसे
कर्ण असत्य का बना हुआ हर दिन ही पर्याय
कुंडल-कवच बचाने  का  सोच रहा उपाय
उत्तरा अभिमन्यु के शव पर अब कभी विधवा ना होगी
और दु:शासन  की ताल पर ही द्रौपदी नृत्य करेगी
कृष्ण  बन गए  हैं सारथि दुर्योधन के रथ का
अर्जुन का गांडीव मुग्ध हुआ है भ्रष्टतम पथ का
गुरु  द्रोण को एकलव्य ने दिया पटकनी लगाय
मलयागिरि की भीलनी ज्यूँ  चन्दन देत जराय
देखो भीम का पराक्रम भी धूसर पड़ा दिखाई
नकुल-सहदेव की बात हम अब का करें मेरे भाई
गांधारी है आँखों वाली और नयन लिए धृतराष्ट्र
सुबह-शाम अब  बेच रहे हैं धूम-धाम से राष्ट्र
अब रामायण कहाँ है, है पग-पग में कुरुक्षेत्र
अंतःकरण हैं मृतप्राय मूँद गए हैं नेत्र
कभी तो कोई बात बनेगी कहीं तो होगा न्याय
वो दिन जब भी आए प्रभु मुझे दीज्यो बताय 






22 comments:

  1. गांधारी है आँखों वाली और नयन लिए धृतराष्ट्र
    सुबह-शाम अब बेच रहे हैं धूम-धाम से राष्ट्र...
    क्या उलटबांसी है ...
    कलियुग का यह पल इतना उल्टा...इतना लम्बा ...अभी तक वहीँ थमा है ...!
    शब्दों के इस दंगल में गुम हुए हम तो ...!

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  2. प्रभु बताये या न बताये , हमें पता चलते ही अवश्य बता देंगे जी ।
    इंतजार तो हमें भी है उस दिन का ।

    वर्तमान परिवेश पर सटीक व्यंग्दा रचना ।

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  3. कृष्ण बन गए हैं सारथि दुर्योधन के रथ का
    अर्जुन का गांडीव मुग्ध हुआ है भ्रष्टतम पथ का
    bahut badhiyaa

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  4. अदा जी,
    कविता कॉमनवेल्थ गेम्स के 'खेल' पर भी बड़ी सटीक बैठ रही है...

    जय हिंद...

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  5. कर्ण असत्य का बना हुआ हर दिन ही पर्याय
    कुंडल-कवच बचाने का सोच रहा उपाय
    गांधारी है आँखों वाली और नयन लिए धृतराष्ट्र
    सुबह-शाम अब बेच रहे हैं धूम-धाम से राष्ट्र...

    बहुत ही खूब कहा अदा जी !

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  6. आज के परिपेक्ष्य में सटीक है यह उलटबाँसी....

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  7. अब तो यही दिशा लगती है समाज की।

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  8. @ अदा जी ,
    बहुत सही ! हम इंसानों नें धरती की सेहत खराब कर डाली है ! सुखद अहसास ये कि जैसे योग गुरु अदा नें धरती को शीर्षासन के लिए राजी कर लिया हो :)

    भले ही इतनें विशाल ब्रह्मांड में हमारे द्वारा तयशुदा दिशायें अर्थहीन हों और धरती अलग एंगल से अलग ही नज़र आती हो पर...हमारे नज़रिये से दोपायों का दर्प तोड़ने के लिए यह चित्र काफी प्रभावशील लग रहा है !

    आपकी कविता भी चित्र की तरह से कहर बरपा रही है !

    शुक्रिया !

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  9. Aapki rachnaye kuchh aisa sach pesh kartee hain,ki,kuchh kahne ke qaabil nahee chhodteen!

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  10. सुबह-शाम अब बेच रहे हैं धूम-धाम से राष्ट्र
    अब रामायण कहाँ है, है पग-पग में कुरुक्षेत्र
    अंतःकरण हैं मृतप्राय मूँद गए हैं नेत्र
    कभी तो कोई बात बनेगी कहीं तो होगा न्याय
    वो दिन जब भी आए प्रभु मुझे दीज्यो बताय
    बहुत ही अच्छा !! चिंता जाएज़ है !

    समय हो तो पढ़ें

    ख़ामोशी के ख़िलाफ़ http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_08.html

    शमा-ए-हरम हो या दिया सोमनाथ का http://saajha-sarokaar.blogspot.com/2010/08/blog-post.html

    शहरोज़

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  11. भारतीय समाज की जड़ीभूत उँच नीच और घनाधरित लूट खसोट को इस "उलटबाँसी ...." के माध्‍यम से बखूबी समझा जा सकता है।
    कविता में मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रासंगिक उपयोग, लोकजीवन के खूबसूरत बिंब कवयित्री के काव्‍य-शिल्‍प को अधिक भाव व्‍यंजक तो बना ही रहे हैं, उन्‍हें विशिष्‍ट भी बनाते हैं।

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  12. बहुत अच्छा लिखा आपने, आज का महाभारत यही है।

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  13. बहुत अच्छा लिखा आपने, आज का महाभारत यही है।

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  14. आप बात बहुत सलीके से रखते हैं। आपके ब्लाग पर आकर अच्छा लगा।

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  15. "कभी तो कोई बात बनेगी कहीं तो होगा न्याय
    वो दिन जब भी आए प्रभु मुझे दीज्यो बताय"

    जब वो दिन आए तो अपने ब्लाग के माध्यम से बताना ना भूलें :)

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  16. @ cmpershad ji,
    aap bahut dinon baad nazar aaye hain...aasha hai ab aap swasthy hain..
    aapka dhanywaad..

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  17. बहुत सही है। अच्छा लगा पढकर .. उलटबांसी।

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  18. इस उलटी दुनिया को देखने का सीधा रास्ता
    या
    सीधे रास्ते की टेढ़ी चाल,
    जो भी है अंदाज मजेदार लगा।

    तस्वीर शानदार है पर आपकी धरती से हम यानि भारत गायब, एक और उलटबांसी.. हा हा हा

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  19. Sundar prastuti............

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  20. कर्ण बन गया असत्य का पर्याय
    कुन्डल कवच बेचने का कर रहा उपाय।

    बहुत अच्छी रचना।

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  21. bahut achhi kavita rachi hai aapne...
    aage bhi aise hi likhte rahiyega...
    Meri Nai Kavita padne ke liye jaroor aaye..
    aapke comments ke intzaar mein...

    A Silent Silence : Khaamosh si ik Pyaas

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  22. Namashkaar :)

    सुबह-शाम अब बेच रहे हैं धूम-धाम से राष्ट्र
    अब रामायण कहाँ है, है पग-पग में कुरुक्षेत्र
    अंतःकरण हैं मृतप्राय मूँद गए हैं नेत्र
    कभी तो कोई बात बनेगी कहीं तो होगा न्याय
    वो दिन जब भी आए प्रभु मुझे दीज्यो बताय

    Bahut hi badiya rachna hai...
    Itni khoobsuratti se sajaaya hai aapne ...
    What a brilliant sketch about reality!!

    Regards,
    Dimple

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