Friday, August 13, 2010

वो एक बार फिर, गठरी बन जाती है ...



समय कभी भी 
टूट कर उससे 
अलग हो जाएगा,
आधी रात का सूरज भी
एक दिन डूब जाएगा,
हर रात 
एक काला मकड़ा 
रेंग जाता है 
उसके तन की गठरी पर, 
फिर भी हर सुबह 
पलाश के फूल खिल जाते हैं ,
मन के उगे हुए टहनियों पर,
वर्षों के जंगल अब 
सदियों में बदलने लगे हैं,
लेकिन 
भटकते हुए सपने 
खींच कर ले ही आते हैं
एक टुकड़ा आसमान,
जहाँ उम्मीद की 
उजली किरण,
नाकामी के 
स्याह शहतीरों से,
मात तो खा जाती है,
मगर, हार नहीं मानती,
हाँ ...
आधी रात का सूरज,
जब भी आता है,
वो एक बार फिर
गठरी बन जाती है ...





23 comments:

  1. हाँ ...
    आधी रात का सूरज,
    जब भी आता है,
    वो एक बार फिर
    गठरी बन जाती है ...
    Aise gazab,anoothe khayal kisi behad teekshn aur samvedansheel dilodimaagme hee aa sakte hain!

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  2. वर्षों के जंगल अब
    सदियों में बदलने लगे हैं,
    लेकिन
    भटकते हुए सपने
    खींच कर ले ही आते हैं
    एक टुकड़ा आसमान,

    अच्छी कविता !!!!!

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  3. हर रात
    एक काला मकड़ा
    रेंग जाता है
    उसके तन की गठरी पर,
    फिर भी हर सुबह
    पलाश के फूल खिल जाते हैं ,
    मन के उगे हुए टहनियों पर
    Nirasha kee rat men asha kee kiran, achchi kawita.

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  4. समय कभी भी
    टूट कर उससे
    अलग हो जाएगा,
    आधी रात का सूरज भी
    एक दिन डूब जाएगा,
    हर रात
    एक काला मकड़ा
    रेंग जाता है
    उसके तन की गठरी पर,
    फिर भी हर सुबह
    पलाश के फूल खिल जाते हैं ,
    मन के उगे हुए टहनियों पर,
    वर्षों के जंगल अब
    सदियों में बदलने लगे हैं,
    लेकिन
    भटकते हुए सपने
    खींच कर ले ही आते हैं
    एक टुकड़ा आसमान,
    जहाँ उम्मीद की
    उजली किरण,
    नाकामी के
    स्याह शहतीरों से,
    मात तो खा जाती है,
    मगर, हार नहीं मानती,
    हाँ ...
    आधी रात का सूरज,
    जब भी आता है,
    वो एक बार फिर
    गठरी बन जाती है ...

    बहुत खूब !!

    सन्दर्भ से जुडा ..एक और संवाद..

    आज़ादी की वर्षगांठ एक दर्द और गांठ का भी स्मरण कराती है ..आयें अवश्य पढ़ें
    विभाजन की ६३ वीं बरसी पर आर्तनाद :कलश से यूँ गुज़रकर जब अज़ान हैं पुकारती
    http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_12.html

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  5. बेहद खूबसूरत कविता, विशेष रूप से ये पंक्तियाँ बेहद पसंद आईं-
    "वर्षों के जंगल अब
    सदियों में बदलने लगे हैं,
    लेकिन भटकते हुए सपने
    खींच कर ले ही आते हैंएक टुकड़ा आसमान,
    जहाँ उम्मीद की उजली किरण,
    नाकामी के स्याह शहतीरों से,
    मात तो खा जाती है,
    मगर, हार नहीं मानती"
    प्रतीकों का बहुत अनूठा प्रयोग करती हैं आप।

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  6. वर्षों के जंगल अब
    सदियों में बदलने लगे हैं,
    दिल की गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना , बधाई

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  7. गज़ब!!


    अद्भुत!

    जिओ!

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  8. फिर भी हर सुबह पलाश के फूल खिल जाते हैं ....
    भटकते हुए सपने खींच कर ले ही आते हैं....
    एक उम्मीद की उजली किरण.......
    बेहद खूबसूरत कविता.....
    दिल की गहराई से लिखी गयी .....

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  9. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  10. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  11. बडे मानीखेज़ बिम्ब और उन पर बिखरी सुन्दर कविता !

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  12. आधी रात का सूरज,
    जब भी आता है,
    वो एक बार फिर
    गठरी बन जाती है ...

    adbhut..........badhiya!

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  13. नारी की वेदना को नए बिम्ब दिए हैं ....अच्छी प्रस्तुति

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  14. Hi...

    Bhav alag kavita ke teri..
    soch swatah de jaate hain...
    ek pal ko muskaate se pal...
    dard punah de jaate hain...

    Sundar Bhav...

    Deepak...

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  15. आह! कितना दर्द्……………गहन प्रस्तुति।

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  16. आधी रात का सूरज, जब भी आता है, वो एक बार फिर
    गठरी बन जाती है

    बहुत ही सुन्दर चित्रण।

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  17. आधी रात का सूरज भी
    एक दिन डूब जाएगा

    और दिन का चंदा मुस्कुराएगा :)

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  18. Girijesh ji ne kaha:

    ग़जब!
    100/100.
    वैसे मैं हूँ क्या इतना सक्षम कि मार्किंग कर सकूँ?
    कविता बहुत बहुत अच्छी लगी। बस्स।

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  19. भटकते हुए सपने
    खींच कर ले ही आते हैं
    एक टुकड़ा आसमान,

    आशाएं हैं..और अच्छी हैं.
    ख़ूबसूरत रचना..

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  20. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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