Friday, April 17, 2015

आ भी जाओ.....!


चलो चमक जाएँ अब सब छोड़-छाड़ के 
रख देंगे मुँह अँधेरों का तोड़-ताड़ के 

हवा भी ग़र बदनीयत हो तो रोक देंगे हम       
बनाएँगे नये आशियाँ कुछ ज़ोड़-जाड़ के 

तूफाँ भी बरख़िलाफ़ हो कर लेंगे सामना  
रख देंगे सफीनों के पाल मोड़-माड़ के 

दामन तहज़ीब का हम थामेंगे तब तक  
अस्मत को न छूए न खेले फोड़-फाड़ के

अब न होंगे कमसिन अक़्स कहीं बेआबरू 
रख देंगे आईनों को हम तोड़-ताड़ के



10 comments:

  1. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (18-04-2015) को "कुछ फर्ज निभाना बाकी है" (चर्चा - 1949) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आभारी हूँ शास्त्री जी

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  2. सुंदर अभिव्यक्ति

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    1. आपका हृदय से धन्यवाद सुमन जी।

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  3. सुन्दर रचना

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    1. ओंकार जी,
      आपने मेरा मान बढ़ाया, आभारी हूँ।

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  4. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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    1. संजू जी,
      हौसलाअफजाई के लिए दिल से शुक्रिया।

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  5. तूफाँ भी ग़र बरख़िलाफ़ हो करना है सामना
    रख देंगे सफीनों के पाल मोड़-माड़ के

    उत्तम रचना।

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    1. अँकुर जी,
      हृदय से आभारी हूँ।

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