Tuesday, July 6, 2010

अवरुद्ध-रुद्ध हुआ कंठ मेरा आपका जो प्यार देखा...

पुनर्प्रस्तुति..
अवरुद्ध-रुद्ध हुआ कंठ मेरा आपका जो प्यार देखा
झाँझ झंकृत हो गया मन हृदयंगम जो दुलार देखा
प्रणय तूलिका से भाव रचना स्नेह अपरम्पार देखा
सजल दृष्टि छलक छलकी प्रेम गौरव अपार देखा
प्राण-प्राण बसी श्वास-सरगम यही जीवनाधार देखा
मोहपाश में है गात-गात, मन नेह नेह निहार देखा

और अब एक गीत ....

अरुण यह मधुमय देश

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।

- जयशंकर प्रसाद

शायद ..आप में से कुछ ने इस गीत को पहले भी सुना हो....मुझे नया गीत रिकॉर्ड करने का समय नहीं मिला...सोचा श्री जयशंकर प्रसाद जी की अमर कृति को भी सुन लीजिये...इस गीत को हिंद-युग्म द्वारा आयोजित संगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था....

आवाज़ : स्वप्न मंजूषा 'अदा'
संगीत : श्री संतोष शैल

Monday, July 5, 2010

बिन लोगों की ये महफ़िल है मेरा दिल घबराए ....


वहशत है हंगामों से ख़ामोशी मुझको आँख न भाये
क्या जानो क्या होता है जब भी कोई याद सताए 

इक चेहरा बे-चेहरा सा वो इक रिश्ता बे-रिश्ता सा  
चमके कभी बिजली बनकर कभी बादल सा वो उड़-उड़ जाए

आँखे घूमें आगे-पीछे, भेद की कितनी गांठें खोले 
दीवाने से हम फ़िरते हैं बात-बात पर ठोकर खाए 

दर्पण से क्या बातें करना झूठमूठ मुझको बहकाए  
बिन लोगों की महफ़िल देखूँ तभी तो मेरा मन घबराए

कोई हो दमसाज़ 'अदा' कोई तो हो मेरे संग-संग 
इस तूफ़ानी आलम में वो काश मेरी कश्ती बन जाए 

Sunday, July 4, 2010

कनाडा की राजधानी ओट्टावा में ट्यूलिप फेस्टिवल.....


कनाडियन ट्यूलिप फेस्टिवल की बात ही निराली है...कनाडा की राजधानी ओट्टावा में ट्यूलिप फेस्टिवल पिछले ५८ वर्षों से मनाया जा रहा है...ट्यूलिप फूल को अंतर्राष्ट्रीय मित्रता का प्रतीक माना जाता है तथा  ट्यूलिप फेस्टिवल को बसंत के आगमन की ख़ुशी में मनाया जाता है...ओट्टावा शहर में ट्यूलिप फेस्टिवल की धूम-धाम देखते ही बनती है...इस समय बहुत सारे  स्थानीय कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने का भरपूर मौका मिलता है...इस त्यौहार को मनाने के पीछे शांति और प्रेम की अनोखी कहानी जुडी हुई है...
दूसरे विश्वमहायुद्ध के दौरान डच राज परिवार को कनाडा ने प्रश्रय दिया था...यहीं नेदरलैंड की राजकुमारी मार्गरेट का जन्म कनाडियन सिविक हॉस्पिटल में हुआ था...आज भी हॉस्पिटल का वो कमरा नेदरलैंड की भूमि माना जाता है और वहां नेदरलैंड का ही झंडा लहराता है....इस अपनत्व को आज तक नेदरलैंड भूल नहीं पाया है और यह दोस्ती आज भी कायम है.....


१९४५ में अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए डच राज परिवार ने ओट्टावा को १,००००० ट्यूलिप बल्ब भेजे...यह उपहार था कनाडा वासियों के लिए हालैंड राज परिवार की तरफ से जिसे द्वितीय विश्वमहायुद्ध के समय, कनाडा की भूमि में सुरक्षा मिली थी ....यह प्रेम का उपहार कनाडा की जनता को बहुत -बहुत पसंद आया ...एक लाख फूलों ने ओट्टावा शहर की खूबसूरती में चार चाँद लगा दिए थे... लेकिन कृतज्ञता और प्रेम का यह सम्बन्ध वहीं ख़त्म नहीं हुआ ...तब से लेकर आज तक यह सिलसिला चलता आ रहा है लगातार ...
                      डच राजकुमारी मार्गरेट गोद में                   पहली तैयारी ट्यूलिप फेस्टिवल की

ओट्टावा ट्यूलिप फेस्टिवल दुनिया का सबसे बड़ा ट्यूलिप फेस्टिवल माना जाता है ...अब हर साल हालैंड से ३० लाख ट्यूलिप बल्ब आते हैं...पूरा शहर देखते बनता है....इस प्रेम और शान्ति के त्यौहार ने अपना रूप और भी प्रेममय और विस्तृत बना लिया है ...लाखों सैलानी दुनिया के कोने कोने से हर साल आते हैं...अप्रैल के महीने में यह त्यौहार १८ दिनों तक चलता है....देश-विदेश के राजनीतिज्ञ यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए, प्रेम और शान्ति का पैगाम खुल कर देते हैं....जगह-जगह पर अनेक देशों के पविलियन बने होते हैं...वो अपनी संस्कृति, भोजन और कला को सैलानियों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं... जगह जगह पर स्थानीय कलाकारों के गीत संगीत का कर्यक्रम होता रहता है....सबकुछ फ्री होता....किसी तरह का कोई शुल्क नहीं होता....खूबसूरती अपनी पराकाष्ठा पर होती है...यूँ लगता है जैसे स्वर्ग धरती पर ही उतर आया है...रंगों का समन्वय देखते ही बनता है....

अगले वर्ष समीर जी भी आयेंगे इस त्यौहार में शामिल होने, मुस्कुरा कर वो हमसे वादा कर ही चुके हैं :):) ....उसवक्त और बेहतर रिपोर्ट प्रस्तुत करुँगी.... फिलहाल आप ट्यूलिप की रंगीन छटा पर मोहित होते हुए, उस शहर के दर्शन कीजिये, जहाँ मेरा भी घर है....!!

Saturday, July 3, 2010

कल जो टूटे थे रिश्ते आज वो लगते झूठे हैं ....



ये फोटो ओट्टावा में टूलिप फेस्टिवल का है....

कल जो टूटे थे रिश्ते, आज वो लगते झूठे हैं
प्रीत डगर के काँटों से, मेरे पाँव के छाले फूटे हैं

शिकवों का दस्तूर नहीं, ना है गिलों का कोई रिवाज़ 
नेह की वो सारी कोंपल, बस कागज़ के गुल-बूटे हैं

कई रतजगे काटे हैं, हर ख़्वाब को दिल से पाला है 
पल भर को मेरी आँख लगी, कोई ख़्वाब का लश्कर लूटे है

सोच लिया था तेरे नाम की, सारी निशानी मिटा देंगे
पर दिल के पत्थर पर आकर, तेरी याद के खंज़र टूटे हैं

झीनी सी वो ख़ामोशी 'अदा', और पाँव से लिपटी तन्हाई
मुझे गुमसुम से कुछ राह मिले, पर जाने क्यूँ वो रूठे हैं


फिल्म  : अभिलाषा
संगीतकार : राहुल देव बर्मन.
गीतकार : मजरूह  सुल्तानपुरी
आवाज़ : लता

लेकिन यहाँ ...स्वप्न मंजूषा 'अदा'

वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें
जाओ मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे
वादियाँ मेरा दामन ...

जब  हँसेगी कली रंग वाली कोई 2
और झुक जायेगी तुमपे डाली कोई
सर झुकाए हुए तुम मुझे पाओगे
वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें
जाओ मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे
वादियाँ मेरा दामन ...

चल रहे जहाँ इस नज़र से परे २
वो डगर तो गुज़रती है दिल से मेरे
डगमगाते हुए तुम यही आओगे
वादियाँ मेरा दामन रास्ते मेरी बाहें
जाओ मेरे सिवा तुम कहाँ जाओगे
वादियाँ मेरा दामन ...



Friday, July 2, 2010

सुन ओ हसीना काजल वाली....


समय का आभाव इतना है कि कुछ लिख पाना संभव ही नहीं हुआ आज.... मुझे ये गीत बहुत बहुत पसंद है....सोचा आज आप भी सुन लीजिये....कल हाज़िर होती हूँ एक कविता के साथ...


सुन ओ हसीना काजल वाली....

Thursday, July 1, 2010

हम वहीं तर जाते हैं.....


इक दिन में हम कई बार, देखो ना ! मर जाते हैं
क़ब्र के अन्दर, कफ़न ओढ़ कर, काहे को डर जाते हैं

राह में तेरे संग चलते हैं पर दामन भी बचाते हैं 
फ़िर आँखों में धूल झोंक कर, अपने घर आ जाते हैं

साजों की हिम्मत तो देखो, बिन पूछे बज जाते हैं
जब उनपर कोई थाप पड़े तो, गुम-सुम से हो जाते हैं

चुल्लू चुल्लू पानी लेकर, हम कश्ती से तो हटाते हैं
वो पलक झपकते सागर बन, और इसे भर जाते हैं

देखें तुझको या ना देखें, फर्क हमें क्या पड़ता है
साया भी ग़र तेरा छू ले, हम वहीं तर जाते हैं