Thursday, August 6, 2009
मेरी वाईफ का भईया (पैरोडी)
पैरोडी (मेरी सपनों की रानी कब आएगी तू)
VERY IMPORTANT : सबसे पहले मैं अपने भाई से हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगती हूँ, PLEASE नाराज़ नहीं होना...बस ये परोडी है कटाक्ष नहीं..
अब आप साथ-साथ गाइए, मैं इस गाने को बना नहीं पायी हूँ लेकिन एक दिन ये भी बन ही जायेगा..
फिलहाल तो असली गीत सुने और साथ साथ गाकर देखें, और बताएं कैसा लगा.....
हे हे आ आ आ .....
मेरी वाईफ का भईया कब जाएगा तू
कब तक मेरा भेजा और खायेगा तू
और कब तक मुझको रुलाएगा तू
चला जा तू चला जा
तनखा है थोड़ी, पास न कौड़ी
तुझको पकौड़ी कौन खिलाये
तनखा है थोड़ी, पास न कौड़ी
तुझको पकौड़ी कौन खिलाये
कितना क़र्जे के नीचे दबाएगा तू
जब तू जाए, चैन आ जाए
सास को मेरी संग ले जाए
जब तू जाए, चैन आ जाए
सास को मेरी संग ले जाए
मिस्ड काल जी अब मेरा पायेगा तू
मेरी वाईफ का भईया कब जाएगा तू
कब तक मेरा भेजा और खायेगा तू
और कब तक मुझको रुलाएगा तू
चला जा तू चला जा
चला जा तू चला जा
चला जा तू चला जा......
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मेरी वाईफ का भईया (पैरोडी)
Wednesday, August 5, 2009
सात जनम तक साथ निभाना
दुल्हन बन तेरे घर आना
संग-संग चलते ही जाना
क़तरा क़तरा जुड़ते जाना
चप्पे चप्पे पे छा जाना
कभी खुशबू आबशार बने तो
कभी हो कोई तेल पुराना
कभी आग का गोला हो तुम
कभी हो शबनम मोती दाना
कभी बातों से देह जलाना
नज़रों में ही कभी छुपाना
धूप-छाओं, के साए में
बस यह जीवन जीते जाना
अंत समय तेरे हाथों से
मुख में गंगाजल पा जाना
फिर दुनियाँ में दोबारा आना
फिर तुझसे जुड़ते ही जाना
फिर संग चलते ही जाना
कभी खुशबू आबशार का आना
तो कभी वही तेल पुराना
फिर वही वो आग का गोला
और कभी वही मोती दाना
फिर कभी मेरी देह जलाना
और कभी आँखों में बसाना
फिर जीवन का अंत आजाना
तेरे हाँथों एक बार फिर
मुख में गंगाजल पा जाना
बस ऐसे ही रोते गाते
तुझ संग सातों जनम निभाना
संग-संग चलते ही जाना
क़तरा क़तरा जुड़ते जाना
चप्पे चप्पे पे छा जाना
कभी खुशबू आबशार बने तो
कभी हो कोई तेल पुराना
कभी आग का गोला हो तुम
कभी हो शबनम मोती दाना
कभी बातों से देह जलाना
नज़रों में ही कभी छुपाना
धूप-छाओं, के साए में
बस यह जीवन जीते जाना
अंत समय तेरे हाथों से
मुख में गंगाजल पा जाना
फिर दुनियाँ में दोबारा आना
फिर तुझसे जुड़ते ही जाना
फिर संग चलते ही जाना
कभी खुशबू आबशार का आना
तो कभी वही तेल पुराना
फिर वही वो आग का गोला
और कभी वही मोती दाना
फिर कभी मेरी देह जलाना
और कभी आँखों में बसाना
फिर जीवन का अंत आजाना
तेरे हाँथों एक बार फिर
मुख में गंगाजल पा जाना
बस ऐसे ही रोते गाते
तुझ संग सातों जनम निभाना
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सात जनम तक साथ निभाना
Monday, August 3, 2009
देयर इज समवन हू स्टिल लव्ज यू

हाँ तो चोरी की गयी रचनाओं की श्रृंखला में मेरी दूसरी पेशकश....इस रचना के मौलिक अधिकार जिनके पास हैं वो शहर से बाहर हैं, शायद १-२ दिन के लिए...उन्हें तो पता भी नहीं है क्या हो रहा है....लेकिन शायद चोरी का मतलब भी यही होता है, जिसका सामान चोरी जाए उसे पता ही न चले....!!!!
किशोर जी की कहानियों की तारीफ करना तो वैसा ही है जैसे....सूरज को घी दिखाना....न्न्न्नहीं नहीं मेरा मतलब है सूरज को दीया दिखाना...पढियेगा तो पता चल जायेगा, हम क्या कहना चाह रहे हैं..
Kishore Choudhary :
रेत का समंदर, माटी का घर, उड़ती धूल, तपते दिन, ठंडी रातें, अपनों की छावं, बिछड़े मित्रों की स्मृतियाँ, मुस्कुराते दर्द, ऊँघती खुशियाँ, लाल मिर्च की चटनी और बाजरे की रोटी के बीच इन सब से बेमेल कॉफी पीने की तलब हर समय...
ये था किशोर जी का परिचय उन्ही की ज़बानी :
और अब पढें एक ऐसी रचना जिसे आप एक साँस में ही पढ़ जायेंगे...क्यों यकीन नहीं आया....तो लगी शर्त !!!!! आप शुरू तो कीजिये.... क्या कहा जीतने पर क्या मिलेगा.....वही एक और चुराया हुआ माल .....हा हा हा हा ....
देयर इज समवन हू स्टिल लव्ज यू
मन के दौड़ते घोड़ों का रमझोल अनियंत्रित निरंकुश सा बीते दिनों के दृश्यों को इतनी तीव्र गति से बदल रहा था कि कोई स्पष्ट घटना स्थिर नहीं हो पा रही थी, डिजिटल पटल पर आ रहे संकेतों में अवरोध उत्पन्न होने पर दिखाई पड़ने वाले पिक्सल की तरह सब कुछ उलझा-उलझा गतिमान था। बस में बारह घंटे बिताने के कारण पैरों में सूजन सी दिखाई पड़ी स्पोर्ट्स शूज के तस्मों को ढीला करते हुए पांवों को अन्दर ठूँसा और सीट के ऊपर सामान रखने की रैक से ट्रोली बैग उतारा सिर्फ़ तीन सीढियां उतरने में कोई मिनट भर का समय लगा, ज़िन्दगी के उलझे तंतुओं की मानिंद रात भर सोये पैर दिशा तलाशने में समय ले रहे थे। शीशे सा पिघलता बदन होगा या फ़िर उखडी बिखरी साँसें, कितने दिन बाद मिलूँगा... दिन कहाँ अब तो वे महीनों में बदल चुके हैं दीवार पर टंगा कलेंडर न बदलने से कुछ रुकता थोड़े ही है।
प्लेटफार्म पर बैग टिकाने के बाद रात को खरीदी पानी की खाली हो चुकी बोतल को पास ही एक कूड़ेदान में फैंकते हुए स्वयं को एक बंधन से मुक्त किया और सोचने लगा अब क्या करे... यहाँ से ऑटो लेकर सीधा ही पहुँच जाए या फ़िर किसी होटल में रुक कर फ्रेश हो ले, अनिर्णय में कई ऑटो रिक्शाओं को पार करते हुए सिन्धी केम्प बस अड्डे से लगभग आधा किलोमीटर दूर निकल आया हालात अब भी वही थे क्या करे? पोलो विक्ट्री से पहले चाय नाश्ते की एक बड़ी पुरानी और मशहूर दूकान के आगे स्टूल खींच कर बैठ गया, यहाँ ग्यारह बजे तक दैनिक मजदूरों, राजधानी में अपना काम करवाने आने वालों और आस पास स्थित सरकारी कार्यालयों में काम करने वालों का जमघट लगा रहता है। मख्खन लगी ब्रेड के साथ दो चाय पीने के समय तय कर लिया कि शर्मा सदन में नहाया जाए फ़िर देखेगा।
सीलन भरे कमरे का किराया मात्र अस्सी रुपये, मात्र इसलिए कि इस तरह की यात्राओं ने सदैव उससे प्रीमियम पेमेंट वसूल किया है, रात को शायद इस कमरे में किसी ने जी भर के दारू पी होगी गंध अभी भी तारी थी दीवारों पर पान गुटके का पीक फैला था थोड़ी ताजा हवा की उम्मीद में खिड़की के पास खड़ा हुआ तो वहाँ भी जाली में बुझी हूई बीड़ियों के साथ नीले सफ़ेद पाउच फंसे थे, बाहर छतों पर कपड़े सूख रहे थे लेकिन उसने तय किया वह अपना बैग हरगिज नहीं खोलेगा कमरे की गंध को अपने साथ नहीं ले जाना चाहता था वो। बड़ी ग़लती की यहाँ आके ऐसी किसी होटल में आज तक नहीं रुका था वो।
बहुत देर प्रतीक्षा के बाद भी नल से गरम पानी नहीं आया और अब उसका सामर्थ्य भी जवाब देने लगा, तीन सिगरेट पी चुकने के कारण मुंह का स्वाद कैसेला होता हुआ आंखों तक आ गया, स्मृतियों के वातायन से झांकते दृश्यों के बीच पैताने का सूरज सर तक चढ़ आया, उसने बैग से सिर्फ़ तौलिया निकाला और बाल्टी से पानी उड़ेल कर बाहर आ गया, बदन में हरारत अब भी वैसी ही थी। सो चेक आउट... अपनी जेब पर निगाह डाली कमरे में इधर उधर देखा और कुछ अलसाये हुए मौसम के इस दिन में सड़क पर पहुँच गया।
स्नेहा से कल ही तय हुआ था आने के बारे में इसलिए ज्यादा कुछ प्लान करने की जरूरत नहीं थी फोन पर बिना किसी अनुनय विनय या फ़िर आग्रह के लगभग तय हो ही जाता था कि कब मिलें, ओटो वाले ने पूछा साब इधर ही, नहीं बाएँ अन्दर ले लो, यूनिवर्सिटी के दो नंबर गेट से सौ मीटर आगे एक बार फ़िर दायें और फ़िर बाएँ मुड़ते ही सामने एक बड़ी बिल्डिंग के सामने रुकवा लिया, पचपन रुपये का भुगतान कर खुले पड़े एक छोटे से दरवाजे को पार कर सामने बैठे निर्जीव से दो लोगों को संबोधित करते हुए कहा स्नेहा... रूम नंबर पन्द्रह... है क्या ? उन्होंने उसके सामने देखने की जगह माईक ऑन कर उसके शब्दों को दोहरा दिया।
कावेरी गर्ल्स होस्टल के भीतरी भाग से बाहर खड़ी कारों और भीतर टहल रही शोर्ट जींस अधोमुखी टी शर्ट वाली लड़कियों की जांच परख में दिल नहीं लगा, जिज्ञासावश वह मिलने आए आगंतुकों और बाउंड्री वाल की ऊँचाई को टटोलता रहा, एक होंडा सिटी एक जेन... रहने दो कई गाडियां थी। उसको लगा कि हो न हो ये ओमनी जरूर अपनी जगह पर खड़ी खड़ी हिलेगी । बाहर क्यों खड़े हो ? अन्दर आओ ना। स्नेहा का वही स्वर सुनाई दिया जो उसको बरसों से आश्वस्त करता आ रहा था, बैग लिए विजिटर रूम में सोफे पर सीधा बैठ गया, स्नेहा ने बताया मैं चेज करके आती हूँ, जाती हूई वह कुछ मोटी दिखाई पड़ी भूरे ट्राउजर पर पहने सफ़ेद अपर पर लिखा था नो वे।
वह शायद इतनी मोटी नही थी पहले, उन दिनों स्नेहा के भीतर और बाहर महत्वाकांक्षाएं सहज देखी जा सकती थी, ब्रांडेड कपडों तक उसकी पहुँच नहीं थी तो किसी मैगजीन से कॉपी कर ख़ुद अपने लिए एक ड्रेस सिलवा ली थी और दर्जी को एक ही हिदायत दी कि अगर ये इस फोटो के जैसी ना दिखी तो एक भी पैसा नहीं मिलेगा। उसी ड्रेस में कॉलेज के आगे लगे एक फव्वारे पर पाँव रख कर तीन फोटो खिंचवाए वे आज भी उसके पास रखे हैं। ब्रांडेड कपड़ों के प्रति ही नहीं वरन हर एक नाम जो स्थापित और बिकाऊ होने के साथ अभिजात्य होने का विश्वास प्रकट करता था उसे अपनी और खींच लेता था।
हेप्पी बर्थ डे कहते हुए पहली बार उसके गोल चहरे को छुआ तब स्नेहा ने एक रहस्यमयी मुस्कान से उसको देखा था ये दिन कई बोझिल दिनों के बाद आया था सहेलियों के साथ एक गुप्त पार्टी मम्मी की स्वीकृति से संपन्न हो चुकी थी कुछ गिफ्ट कुछ कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतलें और थोड़ा सा एकांत , ऐसे में भी उसको सिर्फ़ यही पूछना याद आया "तुम्हारी ये टी शर्ट ओरिजनल एडिडास की है क्या ?"
कहाँ खो गए ? स्नेहा लौट आई थी हाथ में दो कप चाय और एक पोलिथीन। अब भी तुम्हारी एक आदत नहीं बदली जहाँ होते हो वहाँ रहते नहीं। वह चाय पी रहा था तब स्नेहा ने बैग खोला और उसमे पोलिथीन रख दिया।
"अब कहाँ जायेंगे ?"
"चलो बाहर देखते है"
"महारानी पेलेस चलें?"
"नहीं दोबारा वहाँ नहीं"
"फ़िर"
"यहीं पास में एक अच्छा होटल है"
"ओ के"
"ऑटो लेके चलते हैं "
"नहीं .... पैदल ठीक है ना "
"समझा करो यूनिवर्सिटी के पास ही है कोई देखेगा... ऑटो सही रहेगा"
स्वागत कक्ष में बैठा व्यक्ति ऐसे मुस्कुराया जैसे वे दोनों उसके बरसों पुराने ग्राहक हों, रेट कार्ड इस निवेदन के साथ आगे बढाया कि सिर्फ़ डीलक्स ही खाली हैं। स्नेहा ने आँख से लड़के को बैग उठाने का इशारा किया, इस अधिकार प्रदर्शन में ही दोनों की सुरक्षा थी जिसकी परवाह सिर्फ़ स्नेहा को थी।
तीसरे माले का कमरा संख्या तीन सौ आठ लम्बाई चौडाई बीस गुणा तीस, एक तरफ़ मेहमानों के लिए सोफा सेट और एक छोटी सी टेबल पास ही कालीन बिछा था और उसके पार एक आठ फीट लंबा चौडा पलंग। स्टूल को पाँव से सरकाते हुए खिड़की के पास ला कर बाहर नीचे सड़क पर दौड़ रहे वाहनों में स्नेहा की आँखें खो गई वह भी उसके पीछे कंधों पर हाथ रख कर बाहर देखने लगा। इस घड़ी में व्यंजनायें, अलंकार, रूपक, छंद, दोहे यानि सब कुछ निष्प्रभावी था। स्नेहा बाथरूम में चली गई, खिड़की से आते उदास हवा के झोंकों ने याद दिलाया की चार घंटे से उसने सिगरेट नहीं पी है। सिगरेट तो है भी नहीं उसके पास, वह कभी भी स्नेहा के सामने नहीं पीता हालाँकि ऐसा नहीं है कि वह जानती नहीं।
बाथ टब को उसने गरम पानी से भरा और लिक्विड सोप को उसमे ही घोल दिया , अभी अभी नहा कर गई स्नेहा की गंध वह इन सब सौन्दर्य प्रसाधनों के बीच पहचानने का प्रयास करने लगा। कुछ नहीं है कहीं ... सब झूठ सब फरेब... इसके सिवा कि स्नेहा है तो वह भी है। रात भर का सफ़र दिन की थकान और तम्बाकू के अभाव में मंद पडी
रक्त गति के कारण लगा शायद इसी टब में नींद आ जायेगी। वैसे बड़ी अजीब है ये देह कभी कभी तो नींद रात भर नहीं आती... टब खाली करके शोवर के नीचे कुछ देर खड़े रहने के बाद ख़ुद को पोंछता हुआ वह बाहर आ गया।
पलंग पर लेटी स्नेहा के पास जाकर वह भी लेट गया उसके हाथ को अपने हाथ में लिया और रूम की लाईट को डिम कर दिया। अचानक उसको लगा स्नेहा की कलाई पर कई स्पीड ब्रेकर उभर आए हैं, उसने फ़िर से छुआ और इस बार विश्वास होने पर हाथ को अपनी आंखों के सामने कर लिया। पूरी कलाई पर पन्द्रह बीस कटने के निशान थे किंतु उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी। कटी कलाई ने दोनों के बीच खड़े बाँध में सुराख़ कर दिया। उसने दूसरा हाथ गरदन के पास रखते हुए स्नेहा को अपने और करीब खींच लिया। वह उसकी बाहों में सिमट आई चहरे को सीने से इस तरह सटा लिया जैसे कई दिनों बाद कोई अपने घर लौट कर आया हो और अपने सर को तकिये के नीचे रख सो जाए। एक तरल स्पर्श किसी रोमांटिक पल में दर्द की बूँद की तरह टपका, स्नेहा की आंखों का पानी उसकी बांह तक पहुँचा, कुछ बूंदें सीने के बालों में अटकी रह गई।
वाट हेप्पंड...
नथिंग
टेल मी
वुड यु लाईक टू लिसन टू मी ?
वाट डू यु थिंक ... वाई आई एम हियर?
सुमित आया था। हम दोनों एक रेस्त्रां में गए। पता नहीं क्यों पर मैं उसके साथ सब कुछ बरदाश्त कर सकती हूँ उसके बिना कुछ नहीं... ये मेरी बरदाश्त ही है जिसे तुम छू रहे हो, उभरी चमड़ी के नीचे कई बरसों का प्यार सिला हुआ है। सुमित ने कहा मैं तुमसे प्यार करता हूँ तो मेरे हाथ में टूटी चूड़ी का एक टुकडा था उसे मैंने अपनी कलाई पर चला दिया और खून आ गया। उसने मुझे बीते दिनों, इस बीच आई मुश्किलों के बारे में बताया अपने कुछ दोस्तों की बातें की फ़िर कहा आई लव यू... मैंने फ़िर अपना हाथ काट दिया। सुमित ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रोकने की कोशिश की, मैंने पूछा जब इतने दिन मिलने नहीं आए क्या तब भी मुझे याद करते थे या अब भी किसी की... उसने मेरे तमाचा जड़ दिया। वह टेबल पर रखे मेरे हाथों पर अपना सर रख कर रोने लगा... आईस्क्रीम पिघल चुकी थी वेटर से कहा इसे ले जाओ दूसरी लाओ।
पिछले साल इसी रेस्त्रां में दिन कैसे बीत जाता था यह याद दिलाने लगा सुमित, ढेर सारे गिफ्ट, चोकलेट, क्रीम शेक, पिज्जा और इन्हे खाने से दिन ब दिन बढ़ते जा रहे बोडी वेट के कारण मजबूरी में बदली गयी जीन्सेज और भी बहुत कुछ याद दिलाया उसने फ़िर बोला तुम परेशां क्यों हो मैं अब भी तुमसे उतना ही प्यार करता हूँ... मैंने उसी चूड़ी से अपना हाथ काट लिया। वह बार बार चिल्लाने लगा आई लव यू... आई लव यू... उसने जितनी बार कहा मैंने उतनी बार अपने हाथ को काटा। उसकी आंखों में आंसू थे और सामने मेरे हाथ से टपकती खून की बूँदें... मैंने सुमित का रूमाल अपने हाथ में बाँध लिया क्योंकि अब मेरी हिम्मत ख़त्म हो गई थी मैं इस से ज्यादा दुखी नहीं देख सकती थी उसको।
सुमित के बारे में बताने को हज़ार अफसाने थे स्नेहा के पास पर अर्धनिंद्रा की स्थिति में सुनाई दिया " वाट काईंड ऑफ़ रिलेशन वी हेव... वेयर आर वी गोइंग... इज देयर एनी डेस्टिनेशन... "
चुप्पी पलंग तोड़ती रही बेगानी सांसों की महक बिखरती रही।
स्नेहा उठी, खुले बाल उसके चहरे पर बिखर गए होठों को इस तरह चूमा जैसे किसी दुआ पढने वाले के हाथों में सूखे गुलाब की पत्तियां आ गिरे दोनों करीब से करीब आते जा रहे थे पर दूरी बढ़ती जा रही थी इस पल में कई जनम समा गए थे विदैहिक अनुगूंज में बज रहे राग से सिर्फ वियोग के स्वर बिखर रहे थे किसी की आँखे रो रही थी किसी का दिल... दोनों में से किसी ने कहा "देयर इज समवन हू स्टिल लव्ज यू..."
कहते है उस रात स्नेहा सोयी नहीं
और स्नेहा का वह मित्र अब भी सूखे दरख्तों से, पत्थरों पर जमी काई से, मरी हूई चिडियाओं से एक ही बात दोहराता है "देयर इज समवन..."
नोट: इस पृष्ठ पर उपलब्ध सभी चीज़ें चोरी की है....अतः अनुरोध है की आप अपनी टिपण्णी रचना के रचनाकार को ही समर्पित करें...हाँ अगर दिल करे तो मेरे हाथ की सफाई या मेरी पसंद पर आप टार्च की रौशनी डाल सकते हैं....इससे मुझे प्रोत्साहन मिल सकता है और मेरी अगली चोरी के लिए प्रेरणा भी...धन्यवाद..
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देयर इज समवन हू स्टिल लव्ज यू
पुनर्जनम
सारी उम्र बड़े बुजुर्ग हमको ये ही बताये हैं
भारी पुण्य करला पर ही, मनुख जनम हम पाए हैं
ये ही बात भेजा में अपने, खूब बढ़िया से बैठाये हैं
कभी पुण्य हम नाही करेंगे, भारी कसम उठाये हैं
जे खाता में पुण्य ना होवे, तो भगवान बहुत गुसियाये हैं
कभी कुत्ता तो बिल्ली बना के, धरती पर धकियायें हैं
पूरा अटेंशन अब हम अपने खाता पर ही लगाये हैं
एक भी पुण्य का एंट्री, हम दाखिल नहीं करवाए हैं
राम राम करके बस बीत जाए ये जिंदगानी
पुनर्जनम में ना होई, कोई किसिम की परेशानी
मानुस जनम से छुट्टी मिलिहैं, ना होई शिकन पेशानी
डागी पुसी की जात होई और जीवन होई आसमानी
सुबह सवेरे गौरवर्णा हमें टहलाने ले जाई
ठुमकत लचकत हम आगे आगे, उनका पीछे पीछे दौड़ाई
हाथ में प्लास्टिक लेके मेनका, कदम से कदम मिलाई
जहाँ मर्जी हम विष्ठा त्यागे, और सुंदरी लपक के ले उठाई
हनी डार्लिंग की टेर फिर, हर पल देवे सुनाई
नयन से नयन उलझ जैहें, ज्यूँ प्रेम सागर लहराई
बात बात में हम उनका गलबहियाँ भी लगाई
गोड़ हाथ के बात ही छोडो, नाक मुंह भी चटवाई
मर्सितीज़ की अगली सीट पर मज़े में हवा हम खावें
सुबह शाम क्रिस्टल बोल में, प्युरीना ब्रांड पचावें
किंग साइज़ के बेड में सोवें, और रम्भा पीठ खुजावें
सुबह सवेरे आँख खुले तब, जब अप्सरा प्रभाती गावें
ये ही जीवन की आस में भगवन, एको पुण्य नहीं कमाए
कनाडा, इंग्लैंड या अमेरिका में बस श्वान योनी हम पाए
जबसे तेरे नैना मेरे नैनों से लागे रे...आवाज़ 'अदा' की...
Sunday, August 2, 2009
अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ निभा सकते नही..

आज वॉशिंगटन पोस्ट पर एक खबर पढ़ी के अब लन्दन के बकिंघम पैलस के आगे खड़े होंगे हमारे सिख भाई, वो खुश हैं क्योंकि उन्हें पगड़ी पहनने की आज्ञा मिल गयी है, लेकिन यही पगड़ी हिन्दुस्तान की पहचान है...जब भी यह पगड़ी नज़र आएगी हिन्दुस्तान नज़र आएगा..
चाहे यह पगड़ी किसी indian origin ब्रितानिया के सर पर ही क्यों न हो, आज अचानक ब्रिटिश सरकार इतनी कृपालु कैसे हो गयी ? क्या इसके पीछे कोई कूटनीति काम कर रही है, क्योंकि जब भारत 'सोने की चिडिया' थी तब इन्होने भारत को कहीं का नहीं छोड़ा था और आज जब भारत फिर से एक सबल राष्ट्र बन रहा है ग्रेट ब्रिटेन कहीं दुनिया को ये तो नहीं बताना चाहता है कि चाहे तुम कितने भी सक्षम हो जाओ, खड़े रहोगे हमारे ही दरवाज़े पर रखवाली करते हुए ...
रानी की और खजाने कि रक्षा करता हुआ हिंदुस्तान कैसा नज़र आएगा यह मेरे लिए कल्पना से परे हैं...
शायद यह ख़ुशी की बात हो लेकिन मेरा दीमाग तो उल्टा है न, मुझे झट से याद आ गयी हमारी गुलामी, मुझे याद आया हमारा कोहिनूर हीरा, मुझे याद आई आजादी कि जंग, मुझे याद आई हमारी आज़ादी, जिसे बहुत मुश्किल से हमारे पुरखों ने पाया था, मुझे याद आई अंग्रेजों कि दोगली नीति divide and rule जिसने आज तक भारत को पीस कर रखा हुआ है....बटवारे का दर्द मैंने नहीं भुगता है लेकिन आज भी लोग उससे उबर नहीं पाए हैं.....हमारी संस्कृति, हमारे खजाने, हमारी धरोहर सब तो छीन कर ले गए है वो और आज एक बार फिर हिन्दुस्तान खड़ा है. हमारे ही लुटेरों की हिफजात करने के लिए, उसी कोहोनूर हीरे की रखवाली करने के लिए जो सिर्फ और सिर्फ हमारा है, और उसपर से क़यामत ये कि हम खुश हैं, क्योंकि हमें एक बार फिर महारानी के दरबार में सलामी ठोकने का अवसर मिला है, इन दो सिख भाइयों को देख कर क्या लगता नहीं है कि हम आज भी गुलाम हैं महारानी एलिजाबेथ द्वीतीय के ?... क्या नहीं लगता है कि भारत एक बार फिर खड़ा है अपने घुटनों पर बकिंघम पैलस के सामने गुलामी की जंजीर पहन कर ?.....फर्क सिर्फ इतना है जजीरें नज़र नहीं आ रही हैं.....
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अब एगो दुसर बात :
बात इ है की कल्हे हम एक ठो चोरी किये रहे और उसका से बहुते फायदा रहा हमको....
१. लोगन को सुभान अल्लाह वाला कविता पढने को मिला
२. हमरा ब्लॉग में लोग टिपियाने भी आये
३. और बहुते लोगन का कलेजा में ठंढक चाहुपा है
४. लोगन का इ सिकाइत कि हम धड़ाधड़ पोस्टिंग करते हैं उ भी दूर हो गया
५. इससे हमको एक नया रोजगार मिल गया है
तो हम इ सोच रहे हैं कि रात को निकलेंगे हम खोजारी में और जिन्खा भी ब्लाग पर सही माल मिलेगा चोरी करेंगे और छापेंगे अपना ब्लॉग पर, भाई फोटो भी साथ में लगावेंगे, औ पूरा जानकारी मिलेगा छापेंगे .....
अगर किन्ही भाई-बहिन को पिरोब्लेम है तो भाई कह दीजिये, बाद में कौनो प्रकार का झिकझिक नहीं चाही हमको...
और इ हो जान लीजिये किसी का भी हो सकता है औ कुछ भी हो सकता है.... बस शामिष नहीं मिलगा काहे की हम निरामिष हैं...
अब बता दीजियेगा भाई-बहिन लोग इ ठीक बात हैं कि नहीं... जिनको मंजूर नहीं होगा तो हम उनका ब्लोग्वा के तरफ ऐसा-वैसा नज़र से एकदम नहीं देखेंगे इ हमरा वादा रहा......पक्का.........गंगा जी का जल हाथ में लेकर कीरिया खा रहे हैं.....!!!!!
Saturday, August 1, 2009
चोर के घर डाका

मेरी नज़र में हिंदी ब्लॉग जगत की एक खूबसूरत कविता.
जिसे मैं हर दिन पढ़ती हूँ.... जब भी पढ़ती हूँ तो लगता है पूरा जीवन शुरू से जी गयी हूँ...
और यह काम मैं हर रोज़ करती हूँ....चुपके से....
लेकिन अफ़सोस की बात इस कविता का मालिक एक चोर है, वो कहीं से कुछ भी चुरा लाता है और छाप भी देता है ..
उसपर से कहता भी है 'आप को बुरा भी लगा हो तब भी मैं हटाने वाला तो हूँ नहीं' ह्न्म्म्म्म्म ......
हमने भी सोचा बच्चू को कुछ सबक सिखाया ही जाए...फिर क्या था उस चोर की 'ब्रांड नेम' कविता हम चुरा लाये हैं,.....चोर के घर डाका हा...हा..हा...हा... अभी तक तो सोया हुआ है कल जब उठेगा तो कितना रोयेगा.......
उसे भी तो पता चले कि वो अगर सेर है तो मैं २ सेर हूँ उसकी दीदी....
कहते हैं चोरी की हुई हर चीज़ ज्यादा अच्छी लगती है.... आपने उस चोर के ब्लॉग पर ये कविता पढ़ी है अब मेरे ब्लॉग पर यह कविता कैसी लग रही है जारा बताइयेगा.......उसके ब्लॉग से बेहतर है न ?????
तो ये रही वो बेहद खूबसूरत कविता जो आपका भी मन मोह लेगी, मेरा विश्वास कीजिये... साथ ही यह भी बताइयेगा मेरी हाथ की सफाई आपको कैसी लगी...क्योंकि किसी दिन आपके भी ब्लॉग पर मैं हाथ साफ़ कर सकती हूँ....अगर किसी को एतराज़ हो तो अभी ही बता दीजियेगा...बाद में हमको दोष मत दीजियेगा...
कवि : दर्पण शाह 'दर्शन'
संदूक
आज फ़िर,
उस कोने में पड़े,
धूल लगे को,
हाथों से झाड़ा,
तो...
धूल आंखों में चुभ गई।
संदूक का,
कोई नाम नहीं होता...
...पर इस संदूक में,
एक खुरचा सा नाम था,
सफ़ेद पेंट से लिखा।
तुम्हारा था या मेरा,
पढ़ा नही जाता है अब।
खोल के देखा उसे,
ऊपर से ही,
बेतरतीब,
पड़ी थी...
'ज़िन्दगी'।
मुझे याद है......
...माँ ने,
'उपहार' में दी थी।
पहली बार देखी थी,
तो लगता था,
कितनी छोटी है।
पर आज भी ,
जब पहन के देखता हूँ...
बड़ी ही लगती है,
शायद...
...कभी फिट आ जाए।
नीचे उसके...
तह करके...
सलीके से...
रखा हुआ है,
...'बचपन' ।
उसकी जेबों में देखा,
अब भी,
तितलियों के पंक ,
कागज़ के रंग,
कुछ कंचे ,
उलझा हुआ मंझा,
और,
...और न जाने क्या क्या ?
कपड़े,
छोटे होते थे बचपन में,
जेब बड़ी.
कितने ज़तन से,
...मेरे पिताजी ने, मुझे,
ये 'इमानदारी' सी के दी थी ।
बिल्कुल मेरे नाप की ।
बड़े लंबे समय तक पहनी।
और कई बार...
लगाये इसमे पायबंद ,
...कभी मुफलिसी के,
और कभी बेचारगी के,
पर,
इसकी सिलाई उधड गई थी,
...एक दिन।
जब,
भूख का खूंटा लगा इसमे।
उसको हटाया,
...नीचे,
पड़ी हुई थी 'जवानी',
उसका रंग...
उड़ गया था, समय के साथ साथ।
'गुलाबी' हुआ करती थी ये....
अब पता नही...
कौनसा नया रंग हो गया है?
बगल में ही पड़ी हुई थी
'आवारगी',
....उसमें से,
अब भी,
शराब की बू आती है।
४-५ सफ़ेद,
गोल,
खुशियों की 'गोलियाँ',
डाली तो थीं,
संदूक में,
पर वो खुशियाँ...
.... उड़ गई शायद।
याद है...
जब तुम्हारे साथ,
मेले में गया था,
एक जोड़ी वफाएं,
...खरीद ली थी।
तुम्हारे ऊपर तो पता नहीं,
पर मुझपे ये अच्छी नही लगती।
और फ़िर...
इनका 'Fashion' भी,
...नहीं रहा।
'Joker' जैसा लगूंगा...
इसको लपेटकर।
...और ये शायद...
'मुस्कान' है।
तुम, कहती थी न....
जब मैं,
इसे पहनता हूँ,
अच्छा लगता हूँ।
इसमें भी,
दाग लग गए थे,
दूसरे कपडों के।
हाँ...
...इसको,
'जमाने' और 'जिम्मेदारियों'
के बीच....
रख दिया था ना ।
तब से पेहेनना छोड़ दी।
अरे...
ये रहा,
'तुम्हारा प्यार'।
'valentine day' में,
दिया था तुमने।
दो ही महीने चला था,
हर धुलाई में,
सिकुड़ जाता था।
खारा पानी...
...ख़राब होता है,
इसके लिए,
भाभी ने बताया भी था,
...पर आखें,
...आँखें ये न जानती थी।
चलोssssss....
........
बंद कर देता हूँ,
सोच के...
जैसे ही संदूक रखा,
देखा,
यादें तो,
बाहर ही छूट गई,
बिल्कुल धवल,
Fitting भी बिल्कुल सही
...लगता था,
आज के लिए ही,
खरीदी थी
us 'वक्त' के बजाज से जैसे,
कुछ लम्हों की...
कौडियाँ देकर
चलो,
आज फिर,
इसे ही...
पहन लेता हूँ !
अब जो भी टिपण्णी करें 'दर्पण शाह 'दर्शन' जी की कविता के लिए और 'मयंक शैल' की चित्रकारी के लिए करें, मैंने तो सिर्फ चोरी की है...एक बेहद खूबसूरत कविता की...
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चोर के घर डाका
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