Saturday, December 7, 2013

कुछ ख़याल !

ये रोज़-रोज़ की प्रार्थना
हर रविवार का सत्संग 
और हर दिन तम्बाखू खाना  
आदत में ही शुमार हैं 
एक रह जाए तो मन को कष्ट होता है
और दूसरे से तन को  । 
आदत कैसी भी हो 
आदत ही होती है
अगर शान्ति चाहिए तो 
आदत से बाहर निकल कर 
कुछ सृजन करो 
शब्द अपने में कुछ नहीं होते 
उनको जीवित तुम करते हो 
अगर ऐसा नहीं होता तो 
'मरा' 'मरा' कहने वाला 
भक्त क्यूँ कहाता  ?
भगवान् भी तभी तक है 
जब तक भक्त रहता है 
और 
गंगा भी तभी तक गंगा है 
जब तक वो सागर में नहीं समाती .....

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (08-12-2013) को "जब तुम नही होते हो..." (चर्चा मंच : अंक-1455) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर रचना

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  3. शब्द अपने में कुछ नहीं होते
    उनको जीवित तुम करते हो
    ..बिलकुल सच्ची बात ..गहरे अर्थ लिए रचना

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  4. भगवान् भी तभी तक है
    जब तक भक्त रहता है
    और
    गंगा भी तभी तक गंगा है
    जब तक वो सागर में नहीं समाती ..
    बहुत सुदर !
    नई पोस्ट नेता चरित्रं
    नई पोस्ट अनुभूति

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  5. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने..

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  6. शान्ति की दशा-दिशा।

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  7. भगवान् भी तभी तक है
    जब तक भक्त रहता है
    और
    गंगा भी तभी तक गंगा है
    जब तक वो सागर में नहीं समाती ....

    AKAATY SATY

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  8. बहते रहना, सहते रहना,
    सागर में जाकर मिल जाना।
    शब्द समझना, कहते रहना,
    अपना अपना धर्म निभाना।

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