Saturday, May 16, 2015

मगर ये भी तेरी शराफ़त का सिला है....

कोई ख़्वाहिश नहीं न कोई ग़िला है
चल पड़े अकेले ही न संगी मिला है

रात गुज़र गई और सुब्ह शबनमी है
दिन निकल आया आसमां खुला है

अबके हम खुल कर ख़ुद से मिल आये 
सामने ख़ुशियों का बड़ा क़ाफ़िला है

अब कैसी शिक़ायत क्यूँ करें दरियाफ़्त 
हमें सब मंजूर जो मुक़द्दर का फ़ैसला है

कुछ तो है मेरा फ़ित्नागिरी से राबता  
मगर ये भी तेरी शराफ़त का सिला है

फ़ित्नागिरी=झगड़ा
राबता = सम्बन्ध

मुझे माधुरी दीक्षित बहुत पसंद है :)
  

12 comments:

  1. क्या-क्यों करें शिकायत
    और किससे करें---?
    सभी कुछ तो मेरा ही किया है???
    सुंदर नज्म.

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    1. सही कहतीं हैं सबकुछ तो मेरा ही किया-धरा है :)
      बाकी तो देखी जायेगी :)

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  2. सुन्दर रचना

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    1. ओंकार जी,
      आपका शुक्रिया

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  3. बहुत ही बेहतरीन रचना.......दिली दाद ।

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    1. हर्ष महाजन साहेब,
      दिल से शुक्रिया।

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  4. माधुरी मुझे भी है

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    1. काजल साहेब,
      होशियार !
      एक अकेले आप ही नहीं है बीमार,
      एक से एक बढ़ कर बैठे है.... जुम्मन मियाँ की बाजार में।

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  5. माधुरी मुझे भी है

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  6. माधुरी तो जो है सो है ही, मुझे आपका अंदाज बहुत पसंद है।

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    1. का सिद्धार्थ जी,
      काहे मज़ाक करते हैं, सुबह से कोई मिला/मिली नहीं का :)
      आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !

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