Saturday, May 16, 2015

देवदास के मैं तुम में निशाँ ढूँढ रही हूँ

जाने क्या यहाँ-वहाँ ढूँढ रही हूँ 
शायद इक छोटा जहाँ ढूँढ रही हूँ 

ग़ुम हो आतिशे-नफ़रत में कहीं तुम 
आवाज़ दो मैं जाने-जहाँ ढूँढ रही हूँ 

हो गई अनबन मेरे घर में सुनो जी 
मैं प्यार का वो मेरा मकाँ ढूँढ रही हूँ 

न तो हूँ मैं पारो, न चंद्रमुखी हूँ मैं  
देवदास के मैं तुम में निशाँ ढूँढ रही हूँ 

दरकते हुए रिश्तों की झीरियों में मैं   
दीमक बने शक़-ओ-शुब्हा ढूँढ रही हूँ 

आतिशे-नफ़रत = नफ़रत की आग

13 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (18-05-2015) को "आशा है तो जीवन है" {चर्चा अंक - 1979} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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    1. आपका धन्यवाद शास्त्री जी.

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    2. उम्दा रचना भावपूर्ण |
      सुन्दर गीत सुनवाया है |

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  2. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  3. सुन्दर रचना

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  4. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  5. क्या बात है। बड़े दिनों बाद आना हुआ आपके ब्लॉग पर। अच्छा लगा। रचना लाजवाब है।

    http://chlachitra.blogspot.in
    http://cricketluverr.blogpot.com

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  6. Very nice post ...
    Welcome to my blog on my new post.

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  7. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  8. हमेशा की तरह एक अच्छी नज़्म !!!

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